संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और समस्त सिद्धान्तों के परम श्रेष्ठ जानने वाले हैं । आप सरीखे महापुरुषों का दर्शन तो लोकों के अभ्युदय का ही हेतु हुआ करता है ।२। महादेवी का आविर्भाव और उनके अन्य स्वरूप तथा मुख्य बिहार जो भी हैं उनको अब मेरे समक्ष में विस्तार से वर्णन कीजिए ।३। श्री हयग्रीवजी ने कहा—सत् और असत् कर्मों के रूप वाली जो पूर्ण धारा है वह अनादि है । ध्यान के ही अङ्गों वाली—विद्या ही जिसका शरीर है और उसका हृदय ही निवास का स्थल है वह ध्यान के ही द्वारा देखने के योग्य है । बहुत काल पर्यन्त अनुष्ठान के गौरव से जब अपनी आत्मा के साथ उसकी एकता हो जाती है तभी वह प्रकट हुआ करती है ।४-५। आदि काल में ब्रह्माजी के ध्यान के योग से वह शक्ति प्रादुर्भूत हुई थी । उसका प्रकृति-यह नाम विख्यात हुआ था जो देवों के इष्ट की सिद्धि देने वाली थी ।६। उसका दूसरा स्वरूप उस समय में उद्भूत हुआ था जिस समय में देवों और असुरों के द्वारा अमृत के प्राप्त करने के लिये समुद्र का मन्थन करना प्रवृत्त हुआ था । जो भगवान् शिव को भी मोह उत्पन्न करने वाला था जो कि वाणी और मन के भी अगोचर हैं ।७।
यद्दर्शनादभूदीशः सर्वज्ञोऽपि विमोहितः । विसृज्य पार्वतीं शीघ्रं तया रुद्धोऽतनोद्रतम् ॥८ तस्यां वै जनयामास शास्तारमसुरार्दनम् ॥९
अगस्त्य उवाच–
कथं वै सर्वभूतेशो वशी मन्मथशासनः । अहो विमोहितो देव्या जनयामास चात्मजम् ॥१०
हयग्रीव उवाच–
पुरामरपुराधीशो विजयश्रीसमृद्धिमान् । त्रैलोक्यं पालयामास सदेवासुरमानुषम् ॥११ कैलासशिखराकारं गजेन्द्रमधिरुह्य सः । चचाराखिललोकेषु पूज्यमानोऽखिलैरपि । तं प्रमत्तं विदित्वाथ भवानीपतिरव्ययः ॥१२