संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअगस्त्य यात्राजनार्दन आविर्भाव ] [ १३६
अगस्त्य यात्रा जनार्दन आविर्भाव
श्रीगणेशाय नमः— अथ श्रीललितोपाख्यान प्रारभ्यते । चतुर्भुंजे चन्द्रकलावर्तंसे कुचोन्नने कुङ्कुमरागशोणे । पुण्ड्रेक्षुपाशांकुशपुष्पवाणहस्ते नमस्ते जगदेकमातः ॥१ अस्तु नः श्रेयसे नित्यं वस्तु वामाङ्गसुन्दरम् । यतस्तृतीयो विदुषां तृतीयस्तु परं महः ॥२ अगस्त्यो नाम देवर्षिर्वेदवेदाङ्गपारगः । सर्वसिद्धान्तसारज्ञो ब्रह्मानन्दरसात्मकः ॥३ चचाराद्भुतहेतूनि तीर्थान्यायतननि च । शैलारण्यापगामुख्यान्सर्वाञ्जनपदानपि ॥४ तेषु तेष्वखिलाञ्जंतूनज्ञानतिमिगवृतान् । शिश्नोदरपरान्दृष्ट्वा चिन्तयामास तान्प्रति ॥५ तस्य चिन्तयमानस्य चरतो वसुधामिमाम् । प्राप्तमासीन्महापुण्यं कांचीनगरमुत्तमम् ॥६ तत्र वारणशैलेन्द्रमेकाग्रनिलयं शिवम् । कामाक्षीं कलिदोषघ्नीमपूजयदथात्मवान् ॥७
हे इस जगत् की एक ही जननि ! आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित हैं । आप चार भुजाओं वाली हैं आपके मस्तक में चन्द्रमा की कला का भूषण विद्यमान है—आपके अत्यन्त उन्नत उरोज हैं-आपका वर्ण कुंकुम के राग के सदृश रक्त है—पुण्ड्र-इक्षु, पाश-अंकुश और पुष्पों का वाण आपके करों में सुशोभित है ।१। आपके वाम अङ्ग में परम सुन्दर वस्तु हमारे नित्य ही कल्याण के लिए होवे । जिससे विद्वानों में तीसरे और तृतीय परम तेज विद्यमान है ।२। वह अगस्त्य नाम वाले देवर्षि हैं जो वेदों और वेदाङ्ग शास्त्रों के पारगामी विद्वान् हैं । वे सब सिद्धान्तों के सार के ज्ञाता हैं और ब्रह्मानन्द के रस के ही स्वरूप वाले हैं ।३। अद्भुतता के हेतु स्वरूप तीर्थों का और पवित्र आयतनों का जिन्होंने सञ्चरण किया था