संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० ] [ कालिका पुराण
तथा समस्त शैल-अरण्य-नदियाँ आदि प्रमुख स्थलों का एवं जनपदों का भी जिन्होंने परिभ्रमण किया है ।४। उन-उन स्थलों में जहाँ-जहाँ पर उन्होंने परिभ्रमण किया था वहाँ पर सभी जन्तुओं को ज्ञान से शून्य तथा अत्यन्त ही अन्धकार से समन्वित एक केवल उदर पूर्ति तथा काम वासना में परायण देखा था। उन्होंने यह बुरो दशा देखकर उनके विषय में चिन्तन किया था ।५। वे इसी प्रकार से चिन्तन करते हुए संचरण कर रहे थे और इस भूमि पर विचर रहे थे कि उन्हें काञ्ची नगर मिला था जो महान् पुण्यमय और अत्युत्तम था ।६। वहाँ पर इन आत्मवान् अगस्त्यजी ने वारण शैल के स्वामी और एकाग्र ध्यान में तल्लीन भगवान् शिव का तथा कलियुग के दोषों का हनन करने वाली देवी कामाक्षी का अर्चन किया था ।७।
लोकहेतोर्दयार्द्रस्य धीममश्चिन्तनो मुहुः ।
चिरकालेन तपसा तोषितोऽभूज्जनार्दन ॥८
हयग्रीवां तनुं कृत्वा साक्षाच्चिन्मात्रविग्रहाम् ।
शङ्खचक्राक्षवलयपुस्तकोज्ज्वलबाहुकाम् ॥६
पूरयित्रीं जगत्कृत्स्नं प्रभया देहजातया ।
प्रादुर्बभूव पुरतो मुनेरमिततेजसा ॥१०
तं दृष्ट्वानन्दभरितः प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ।
विनयावनतो भूत्वा सन्तुष्टाव जगत्पतिम् ॥११
अथोवाच जगन्नाथस्तुष्टोऽस्मि तपसा तव ।
वरं वरय भद्रं ते भविता भूसुरोत्तम ॥१२
इति पृष्टो भगवता प्रोवाच मुनिसत्तमः ।
यदि तुष्टोऽसि भगवन्निमे पामरजन्तवः ॥१३
केनोपायेन मुक्ताः स्युरेतन्मे वक्तुमर्हसि ।
इति पृष्टो द्विजेनाथ देवदेवो जनार्दनः ॥१४
लोकों के कारण से दया से आर्द्र (पसीजे हुए हृदय वाले)—परमधीमान् और बारम्बार चिन्तन करने वाले उन अगस्त्य मुनि के अधिक समय तक किये हुए तप से भगवान् प्रसन्न हो गये थे ।८। हयग्रीव के शरीर को