भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 551

धारण करके साक्षात् चिद् (ज्ञान) ही के विग्रह वाली और शंख, चक्र, वलय और पुस्तक के धारण करने से समुज्ज्वल बाहुओं वाली तथा अपने देह से समुत्पन्न प्रभा से सम्पूर्ण जगत् जगत् को पूरित करने वाली अपने अपरिमित तेज से मुनि के आगे प्रादुर्भूत हुई थी ।९-१०। उनका दर्शन प्राप्त करके आनन्द से भरे हुए ऋषि ने उनको बारम्बार प्रणाम किया था और विनय से अवनत होकर जगत् के पति की भली भाँति स्तुति की थी ।११। इसके अनन्तर जगन्नाथ प्रभु ने कहा था—हे भूसुरों में श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से सन्तुष्ट हो गया हूं आप किसी भी वरदान का वरण करो। तुम्हारा कल्याण होगा ।१२। जब भगवान् के द्वारा इस रीति से पूछा गया तो श्रेष्ठ मुनि ने कहा—हे भगवन् ! यदि परम सन्तुष्ट है तो यही मुझे बतलाइए कि ये पामर जन्तुगण किस उपाय से मुक्त होगे। जब इस रीति से द्विज के द्वारा पूछा गया था तो देवों के भी देव जनार्दन ने कहा था—।१३-१४।

एष एव पुरा प्रश्नः शिवेन चरितो मम ।
अयमेव कृतः प्रश्नो ब्रह्मणा तु ततः परम् ॥१५॥
कृतो दुर्वाससा पश्चाद्भवता तु ततः परम् ॥१६॥
भवद्भिः सर्वभूतानां गुरुभूतैर्महात्मभिः ।
ममोपदेशो लोकेषु प्रथितोऽस्तु वरो मम ॥१७॥
अहमादिर्हि भूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
सृष्टिस्थितिलयानां तु सर्वेषामपि कारकः ॥१८॥
त्रिमूर्तिस्त्रिगुणातीतो गुणहीनो गुणाश्रयः ॥१९॥
इच्छाविहारो भूतात्मा प्रधानपुरुषात्मकः ।
एवं भूतस्य मे ब्रह्मंस्त्रिजगद्रूपधारिणः ॥२०॥
द्विधाकृतमभूद्रूपं प्रधानपुरुषात्मकम् ।
मम प्रधानं यद्रूपं सर्वलोकगुणात्मकम् ॥२१॥

यह ही प्रश्न बहुत पहिले शिवजी ने मुझसे किया था। इसके पीछे ऐसा ही प्रश्न ब्रह्माजी ने भी किया था ।१५। इसके अनन्तर दुर्वासा मुनि ने यह प्रश्न किया था। इसके बाद में अब आपने भी यह प्रश्न मुझ से किया