भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 548

१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वैपायन मुनि से इस महापुराण को मैंने प्राप्त किया था। ६६। फिर मैंने अमित बुद्धि पुत्र को दिया था। यह इतना वाक्य ब्रह्मा से आदि लेकर गुरु वर्गों का मैंने बता दिया है । ६७। मनीषियों को प्रयत्न से इन गुरु वर्गों के लिए नमस्कार करना चाहिए। यह पुराण यशस्य—आयुष्य—पुण्य और सब अर्थों का साधक है । ६८। यह पापों के हनन करने वाला है। ब्राह्मणों को सदा ही इसका श्रवण करना चाहिए। इस पुराण को जो अशुचि हो—पापी हो तथा जो एक वर्ष से भी कम वास करने वाला हो उसको नहीं बताना चाहिए । ६९। जिसमें इसके प्रति श्रद्धा न हो उसको—अविद्वान् को और पुत्रहीन को भी कभी नहीं बताना चाहिए। यह परम पवित्र तथा उत्तम है अतः जो अपना हित न हो उसको भी नहीं देना चाहिए । ७०।

अव्यक्तं वै यस्य योनिं वदंति व्यक्तं देहं कालमेतं गतिं च । वह्निर्वक्त्रं चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे दिशः श्रोत्रे घ्राणमाहुश्च वायुम् ॥७१

वाचो वेदा अंतरिक्षं शरीरं क्षितिः पादास्तारका रोमकूपाः। सर्वाणि द्यौर्मस्तकानि त्वथो वै विद्याश्चैवोपनिषदद्यस्य पुच्छम् ॥७२

तं देवदेवं जननं जनानां यज्ञात्मकं सत्यलोकप्रतिष्ठम् । वरं वराणां वरदं महेश्वरं ब्रह्माणमादिं प्रयतो नमस्ये ॥७३

जिसकी योनि अव्यक्त है—व्यक्त जिसका देह है—यह काल ही गति है—अग्नि मुख हैं—चन्द्र और सूर्य ही नेत्र हैं—दिशायें जिसके श्रोत्र हैं और वायु घ्राण है ।७१। वाणी जिसकी वेद हैं—अन्तरिक्ष ही शरीर है—क्षितिहो पाद हैं—तारे रोम कय हैं—द्यौ मस्तक है—विद्या अधोभाग है और उपनिषद् जिसकी कूप है ।७२। उस देवों के भी देव को और जनों के जन्म स्थल को—यज्ञ स्वरूप तथा सत्यलोक में प्रतिष्ठित को—वरों के देने वालों के श्रेष्ठ वर को आदि महेश्वर ब्रह्माजी को प्रणत होकर नमस्कार करता हूँ ।७३।