भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 553

अगस्त्य यात्रा-जनार्दन आविर्भाव ] [ १४३

नियम तथा त्याग से दुष्कर्मों के विनाश होने के अन्त में बहुत ही शीघ्र मुक्ति प्राप्ति हो जाया करती है ।२३। जो रूप जिस गुण से युक्त होता है उन गुणों की एकता से प्राप्त किया जाता है । अन्य समस्त जगत् के स्वरूप वाला है जो कर्म—भोग और पराक्रम से संयुक्त होता है ।२४। जो कर्मों के द्वारा प्राप्त किया जाता है वह कर्मों के त्याग से भी पाया जाया करता है । हे तपस्विन् ! सभी के द्वारा उन दोनों का त्याग करना बड़ा ही कठिन होता है ।२५। सत् और असत् कर्मों को प्रत्यक्ष रूप से जान लेना निर्विघ्न और सुगम होता है ।२६। आत्मा में स्थित गुण से जो सत् हो या असत् हो । आत्मा के साथ एकता से जो भी ज्ञान है वह समस्त सिद्धियों के देने वाला होता है ।२७। तीन वर्णों से जो हीन हैं और महान् पापी हैं ऐसे मनुष्यों को भी जिसके केवल ध्यान से ही दुष्कृत भी सुकृत के स्वरूप में परिणत हो जाया करता है ।२८।

येऽर्चयंति परां शक्तिं विधिनाऽविधिनापि वा । न ते संसारिणो नूनं मुक्ता एव न संशयः ॥२९ शिवो वा यां समाराध्य ध्यानयोगबलेन च । ईश्वरः सर्वसिद्धानामर्द्धनारीश्वरोऽभवत् ॥३० अन्येऽब्जप्रमुखा देवाः सिद्धास्तद्ध्यानवैभवात् । तस्मादशेषलोकानां त्रिपुराराधनं विना ॥३१ न स्तो भोगापवर्गौ तु यौगपद्येन कुत्रचित् । तन्मनास्तद्गतप्राणस्तद्याजी तद्गतेहकः ॥३२ तादात्म्येनैव कर्माणि कुर्वन्मुक्तिमवाप्स्यसि । एतद्रहस्यमाख्यातं सर्वेषां हितकाम्यया ॥३३ सन्तुष्टेनैव तपसा भवतो मुनिसत्तम । देवाश्च मुनयः सिद्धा मानुषाश्च तथापरे । त्वन्मुखांभोजतोऽवाप्य सिद्धिं यांतु परात्पराम् ॥३४ इति तस्य वचः श्रुत्वा हयग्रीवस्य शार्ङ्गिणः । प्रणिपत्य पुनर्वाक्यमुवाच मधुसूदनम् ॥३५