संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जो मानव पराशक्ति का अर्चन किया करते हैं चाहे वे विधि के साथ करें या बिना ही विधि से करें वे संसारी नहीं होते हैं अर्थात् बारम्बार जीवन—मरण की घोर यातनाएँ सहन करने वाले नहीं रहते हैं और निश्चय ही वे मुक्त हो जाया करते हैं—इसमें लेशमात्र भी जिसकी आराधना करके और ध्यान तथा योग के बल से अर्चना करके ईश्वर भी जो सभी सिद्धों के स्वामी हैं अर्धनारीश्वर हो गये थे ।२६-३०। अन्य देव भी जिनमें अब्ज प्रमुख हैं उसके ध्यान के ही वैभव से ही सिद्ध हो गये हैं । इस कारण से यह सिद्ध होता है कि समस्त लोगों को त्रिपुरदेव का ही आराधन मुख्य है । इसके बिना कुछ भी नहीं होता है ।३१। सुखों का उपभोग और मोक्ष दोनों ही एक साथ किसी भी प्रकार से नहीं प्राप्त हुआ करते हैं । उनमें ही मन के लगाने वाला—उसमें अपने प्राणों को संलग्न रखने वाला—उसका ही यजन करने वाला तथा अपनी इच्छा को उसमें ही केन्द्रित करने वाला मानव तादात्म्य भाव से अर्थात् उसमें ही सर्वतोभाव से एकता धारण करने वाला पुरुष कर्मों को करता हुआ मुक्ति को प्राप्त कर लेगा । यही रहस्य मैंने सबके हित की कामना से कह दिया है ।३२-३३। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से परम सन्तुष्ट हो गया हूँ । इसी से मैंने आपको यह बतला दिया है । देवगण—मुनिमण्डल—सिद्धसमुदाय—मनुष्य तथा दूसरे लोग आपके मुख कमल से भी पर से भी पर सिद्धि को प्राप्त कर लेवें ।३४। भगवान् हयग्रीव शाङ्ग के इस वचन का श्रवण करके अगस्त्य मुनि ने उनको प्रणिपात किया था और फिर मधुसूदन प्रभु से कहा था ।३५।
भगवन्कीदृशं रूपं भवता यत्पुरोदितम् । किंविहारं किंप्रभावमेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥३६
हयग्रीव उवाच– एषोऽशभूतो देवर्षे हयग्रीवो ममापरः । श्रोतुमिच्छसि यद्यत्त्वं तत्सर्वं वक्तुमर्हति ॥३७
इत्यादिश्य जगन्नाथो हयग्रीवं तपोधनम् । पुरतः कुम्भजातस्य मुनेरंतरधाद्धरिः ॥३८
ततस्तु विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा तपोधनः । हयग्रीवेण मुनिना स्वाश्रमं प्रत्यपद्यत ॥३६