संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणे
जो मानव पराशक्ति का अर्चन किया करते हैं चाहे वे विधि के साथ करें या बिना ही विधि से करें वे संसारी नहीं होते हैं अर्थात् बारम्बार जीवन—मरण की घोर यातनाएँ सहन करने वाले नहीं रहते हैं और निश्चय ही वे मुक्त हो जाया करते हैं—इसमें लेशमात्र भी जिसकी आराधना करके और ध्यान तथा योग के बल से अर्चना करके ईश्वर भी जो सभी सिद्धों के स्वामी हैं अर्धनारीश्वर हो गये थे ।२६-३०। अन्य देव भी जिनमें अब्ज प्रमुख हैं उसके ध्यान के ही वैभव से ही सिद्ध हो गये हैं । इस कारण से यह सिद्ध होता है कि समस्त लोगों को त्रिपुरदेव का ही आराधन मुख्य है । इसके बिना कुछ भी नहीं होता है ।३१। सुखों का उपभोग और मोक्ष दोनों ही एक साथ किसी भी प्रकार से नहीं प्राप्त हुआ करते हैं । उनमें ही मन के लगाने वाला—उसमें अपने प्राणों को संलग्न रखने वाला—उसका ही यजन करने वाला तथा अपनी इच्छा को उसमें ही केन्द्रित करने वाला मानव तादात्म्य भाव से अर्थात् उसमें ही सर्वतोभाव से एकता धारण करने वाला पुरुष कर्मों को करता हुआ मुक्ति को प्राप्त कर लेगा । यही रहस्य मैंने सबके हित की कामना से कह दिया है ।३२-३३। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से परम सन्तुष्ट हो गया हूँ । इसी से मैंने आपको यह बतला दिया है । देवगण—मुनिमण्डल—सिद्धसमुदाय—मनुष्य तथा दूसरे लोग आपके मुख कमल से भी पर से भी पर सिद्धि को प्राप्त कर लेवें ।३४। भगवान् हयग्रीव शाङ्ग के इस वचन का श्रवण करके अगस्त्य मुनि ने उनको प्रणिपात किया था और फिर मधुसूदन प्रभु से कहा था ।३५।
भगवन्कीदृशं रूपं भवता यत्पुरोदितम् । किंविहारं किंप्रभावमेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥३६
हयग्रीव उवाच– एषोऽशभूतो देवर्षे हयग्रीवो ममापरः । श्रोतुमिच्छसि यद्यत्त्वं तत्सर्वं वक्तुमर्हति ॥३७
इत्यादिश्य जगन्नाथो हयग्रीवं तपोधनम् । पुरतः कुम्भजातस्य मुनेरंतरधाद्धरिः ॥३८
ततस्तु विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा तपोधनः । हयग्रीवेण मुनिना स्वाश्रमं प्रत्यपद्यत ॥३६
आप मुझको बतलाइए। ३६। हयग्रीव जी ने कहा—हे देवर्षे ! यह अंशभूत मेरा अपर हयग्रीव है। आप जो-जो भी श्रवण करना चाहते हैं वही यह कहने के योग्य होता है। जगन्नाथ प्रभु इतना ही तपोधन हयग्रीव को आदेश देकर अगस्त्य मुनि के ही आगे अन्तर्हित हो गये थे। ३७-३८। इसके पश्चात् अगस्त्य मुनि बड़े ही विस्मित हुए और उनके रोम-रोम प्रसन्नता से उद्गत हो गये थे। फिर वे तप के ही मन वाले मुनि हयग्रीव मुनि के साथ अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे। ३६।
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॥ हयग्रीव अगस्त्य संवाद ॥
अथोपवेश्य चैवैनमासने परमाद्भुते ।
हयाननमुपागत्यागस्त्यो वाक्यं समब्रवीत् ॥१
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वसिद्धान्तवित्तम ।
लोकाभ्युदयहेतुर्हि दर्शनं हि भवादृशाम् ॥२
आविर्भावं महादेब्यास्तस्या रूपान्तराणि च ।
विहारांश्चैव मुख्या ये तान्नो विस्तरतो वद ॥३
हयग्रीव उवाच-
अनादिरखिलाधारा सदसत्कर्मरूपिणी ।
ध्यानैकदृश्या ध्यानांगी विद्यांगी हृदयास्पदा ॥४
आत्मैक्याद्व्यक्तिमायाति चिरानुष्ठानगौरवात् ॥५
आदौ पादुरभूच्छक्तिर्ब्रह्मणो ध्यानयोगतः ।
प्रकृतिर्नाम सा ख्याता देवानामिष्टसिद्धिदा ॥६
द्वितीयमुद्भूद्रूपं प्रवृत्तेऽमृतमंथने ।
सर्वसंमोहजनकमवाङ्मनसगोचरम् ॥७
इसके अनन्तर उनको परम अद्भुत आसन पर बिठाकर फिर हयानन के समीप में उपस्थित होकर अगस्त्य जी ने यह वाक्य कहा था।
१४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और समस्त सिद्धान्तों के परम श्रेष्ठ जानने वाले हैं । आप सरीखे महापुरुषों का दर्शन तो लोकों के अभ्युदय का ही हेतु हुआ करता है ।२। महादेवी का आविर्भाव और उनके अन्य स्वरूप तथा मुख्य बिहार जो भी हैं उनको अब मेरे समक्ष में विस्तार से वर्णन कीजिए ।३। श्री हयग्रीवजी ने कहा—सत् और असत् कर्मों के रूप वाली जो पूर्ण धारा है वह अनादि है । ध्यान के ही अङ्गों वाली—विद्या ही जिसका शरीर है और उसका हृदय ही निवास का स्थल है वह ध्यान के ही द्वारा देखने के योग्य है । बहुत काल पर्यन्त अनुष्ठान के गौरव से जब अपनी आत्मा के साथ उसकी एकता हो जाती है तभी वह प्रकट हुआ करती है ।४-५। आदि काल में ब्रह्माजी के ध्यान के योग से वह शक्ति प्रादुर्भूत हुई थी । उसका प्रकृति-यह नाम विख्यात हुआ था जो देवों के इष्ट की सिद्धि देने वाली थी ।६। उसका दूसरा स्वरूप उस समय में उद्भूत हुआ था जिस समय में देवों और असुरों के द्वारा अमृत के प्राप्त करने के लिये समुद्र का मन्थन करना प्रवृत्त हुआ था । जो भगवान् शिव को भी मोह उत्पन्न करने वाला था जो कि वाणी और मन के भी अगोचर हैं ।७।
यद्दर्शनादभूदीशः सर्वज्ञोऽपि विमोहितः । विसृज्य पार्वतीं शीघ्रं तया रुद्धोऽतनोद्रतम् ॥८ तस्यां वै जनयामास शास्तारमसुरार्दनम् ॥९
अगस्त्य उवाच–
कथं वै सर्वभूतेशो वशी मन्मथशासनः । अहो विमोहितो देव्या जनयामास चात्मजम् ॥१०
हयग्रीव उवाच–
पुरामरपुराधीशो विजयश्रीसमृद्धिमान् । त्रैलोक्यं पालयामास सदेवासुरमानुषम् ॥११ कैलासशिखराकारं गजेन्द्रमधिरुह्य सः । चचाराखिललोकेषु पूज्यमानोऽखिलैरपि । तं प्रमत्तं विदित्वाथ भवानीपतिरव्ययः ॥१२
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४७
दुर्वाससमथाहूय प्रजिघाय तदंतिकम् । खण्डाजिनधरो दंडी धूलिधूसरविग्रहः । उन्मत्तरूपधारी च ययौ विद्याधराध्वना ॥१३ एतस्मिन्नन्तरे काले काचिद्विद्याधरांगना । यदृच्छया गता तस्य पुरश्चारुतराकृतिः ॥१४
जिसके दर्शन करने से ईश्वर जो सर्वज्ञ हैं वे भी विमोहित हो गये थे। उन्होंने पार्वती जी को भी त्याग करके शीघ्रता से उसके द्वारा रुद्ध होकर रति का विस्तार किया था।८। उसमें असुरों के अर्दन करने वाले एक शासक को उसने उत्पन्न किया था।६। अगस्त्यजी ने कहा—शिव तो समस्त प्राणियों के स्वामी हैं तथा वशी और कामदेव को भी भस्मीभूत कर देने वाले हैं फिर वे कैसे देवी के द्वारा विमोहित हो गये थे और उन्होंने उसमें एक पुत्र को भी जन्म ग्रहण करा दिया था ? ।१०। हयग्रीव ने कहा—पहिले समय में अमर पुर का स्वामी विजय की श्री तथा समृद्धि से समन्वित था और देव-असुर और मनुष्यों के समुदाय से युक्त त्रैलोक्य का पालन किया करता था।११। वह कैलास के शिखर के समान समुच्च आकार वाले गजेन्द्र पर समारूढ़ होकर सभी लोकों में विचरण करने लग गया था और सबके द्वारा उसकी पूजा की जाती थी। भवानी को पति ने उसको प्रमत्त जानकर जो कि अविनाशी हैं उसके मद का हनन करने की इच्छा की थी। फिर दुर्वासा मुनि को बुलाकर उसके समीप में भेजा था। जो खण्ड मृगचर्म के धारण करने वाले थे और दण्डधारी थे। उनका सब शरीर धूल से मटीला हो रहा था। उनका स्वरूप उन्मत्त जैसा था। वे विद्याधरों के मार्ग से गये थे।१२-१३। इसी बीच में उस समय में कोई विद्याधर की अङ्गना वहाँ पर यदृच्छा से उसके ही आगे समागत हो गयी थी। जिसकी आकृति अधिक सुन्दर थी।१४।
चिरकालेव तपसा तोषयित्वा परांबिकाम् । तत्सर्मार्पितमाल्यं च लब्ध्वा संतुष्टमानसा ॥१५ तां दृष्ट्वा मृगशावाक्षीमुवाच मुनिपुङ्गवः । कुत्र वा गम्यते भीरु कुतो लब्धमिदं त्वया ॥१६ प्रणम्य सा महात्मानमुवाच विनयान्विता ।
१४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चिरेण तपसा ब्रह्मन्देव्य दत्तं प्रसन्नया ।।१७ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः सोऽपृच्छन्माल्यमुत्तमम् । पृष्टमात्रेण सा तुष्टा ददौ तस्मै महात्मने ।।१८ कराभ्यां तत्समादाय कृतार्थोऽस्मीति सत्वरम् । दधौ स्वशिरसा भक्त्या तामुवाचातिहर्षितः ।।१९ ब्रह्मादीनामलभ्यं यत्तल्लब्धं भाग्यतो मया । भक्तिरस्तु पदांभोजे देव्यास्तव समुज्ज्वला ।।२० भविष्यच्छोभनाकारे गच्छ सौम्ये यथासुखम् । सा तं प्रणम्य शिरसा ययौ तुष्टा यथागतम् ।।२१
उस अंगना ने बहुत लम्बे समय तक तप करके परा अम्बिका को प्रसन्न कर लिया था ओर उस अम्बिका के द्वारा अर्पित एक माला को प्राप्त किया था तथा उससे वह परम सन्तुष्ट मन वाली सुप्रसन्न थी ।१५। उस हिरन के समीप सुन्दर नेत्रों वाली को देखकर मुनिश्रेष्ठ ने उससे कहा था—हे भीरु ! आप कहाँ जा रही हो ? और आपने यह कहाँ से प्राप्त की है ? ।१६। उसने महात्माजी को प्रणाम करके नम्रता से कहा—हे ब्राह्मण ! बहुत समय तक तपश्चर्या करने से देवी ने प्रसन्न होकर मुझे यह दी है ।१७। उसके वचन को सुनकर फिर उसने उस उत्तम माला के बावत पूछा था । केवल पूछने ही से परम प्रसन्न हो गयी थी और फिर उस माला को उस महात्मा को दिया था ।१८। उस महात्मा ने उसको अपने दोनों हाथों से लेकर यह कहते हुए कि मैं कृतार्थ हो गया उसको भक्तिभाव अपने शिर में धारण कर लिया था और फिर अति हर्षित होकर उससे कहा था ।१९। जो ब्रह्मादिक के लिए भी अलभ्य है वह आज मैंने भाग्य से प्राप्त की है । आपकी देवी के चरण कमलों में समुज्ज्वल भक्ति होवे ।२०। हे सौम्ये ! परम शोभन आकार वाली आप हैं अब सुख पूर्वक गमन करें । उस अंगना ने भी मुनि को प्रणाम करके और चरणों में शिर रखकर वह जैसे आई थी प्रसन्न होती हुई चली गई थी ।२१।
प्रेषयित्वा स तां भूयो ययौ विद्याधराध्वना । विद्याधरवधूहस्तात्प्रतिजग्राह वल्लकीम् ।।२२
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४६
दिव्यस्रगनुलेपांश्च दिव्यान्याभरणानि च । क्वचिद्दधौ क्वचिद्गृह्णन्क्वचिद्गायन्व्वचिद्धसन् ॥२३ स्वेच्छाविहारी स मुनिर्ययौ यत्र पुरंदरः । स्वकरस्थां ततो मालां शक्राय प्रददौ मुनिः ॥२४ तां गृहीत्वा गजस्कन्धे स्थापयामास देवराट् । गजस्तु तां गृहीत्वाथ क्षेपयामास भूतले ॥२५ तां दृष्ट्वा क्षेपितां मालां तदा क्रोधेन तापसः । उवाच न धृता माला शिरसा तु मयार्पिता ॥२६ त्रैलोक्यैश्वर्यमत्तेन भवता ह्यवमानिता । महादेव्या धृता या तु ब्रह्माद्यैः पूज्यते हि सा ॥२७ त्वया यच्छासितो लोकः सदेवासुरमानुषः । अशोभनो ह्यतेजस्को मम शापाद्भविष्यति ॥२८
उस अङ्गना को वहाँ से विदा करके वह मुनि फिर विद्याधरों के मार्ग से गये थे । विद्याधर की वधू के हाथ से वल्लकी का प्रतिग्रहण किया था ।२२। और दिव्य स्रक्-अनुलेप और गन्ध तथा परम दिव्य आभरण भी ग्रहण किये थे । कहीं पर तो इनको धारण कर लेते थे और कहीं पर हाथों में ही ग्रहण करते थे—कहीं पर गान करते जाते थे और कभी हँसते जाते थे ।२३। अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले वह मुनि वहाँ पर पहुँचे थे जहाँ पुरन्दर विराजमान थे । फिर उस मुनि ने अपने करों में स्थित उस माला को इन्द्रदेव को समर्पित कर दी थी ।२४। उसको ग्रहण करके देवराज ने उस माला को हाथी के कन्धे पर स्थापित कर दिया । उस गज ने उसको लेकर भूतल में भेज दिया था ।२५। उस समय में उस माला को भूतल में प्रेषित की हुई देखकर तपस्वी को बड़ा क्रोध आ गया था और उसने कहा था कि मेरे द्वारा समर्पित की हुई माला को इन्द्र देव ने शिर पर धारण किया है ।२६। त्रैलोक्य के ऐश्वर्य से प्रमत्त आपने मेरी दी हुई माला का अपमान किया है । जिस माला को महादेवी ने धारण किया था और वह ब्रह्मा आदि के द्वारा पूजी जाया करती है ।२७। तूने देव असुर और मनुष्यों का लोक शासित किया है वह अब मेरे शाप से अशोभन तेज से रहित हो जायगा ।२८।
१५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इति शप्त्वा विनीतेन तेन संपूजितोऽपि सः । तूष्णीमेव ययौ ब्रह्मन्भाविकार्यमनुस्मरन् ॥२६ विजयश्रीस्ततस्तस्य दैत्यं तु बलिमन्वगात् । नित्यश्रीर्नित्यपुरुषं वासुदेवमथान्वगात् ॥३० इन्द्रोऽपि स्वपुरं गत्वा सर्वदेवसमन्वितः । विषण्णचेता निःश्रीकश्चिन्तयामास देवराट् ॥३१ अथामरपुरे दृष्ट्वा निमित्तान्यशुभानि च । बृहस्पतिं समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ॥३२ भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानकोविद । दृश्यतेऽदृष्टपूर्वाणि निमित्तान्यशुभानि च ॥३३ किंफलानि च तानि स्युरुपायो वाऽथ कीदृशः । इति तद्वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रस्य बृहस्पतिः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं शुभम् ॥३४ कृतस्य कर्मणो राजन्कल्पकोटिशतैरपि । प्रायश्चित्तोपभोगाभ्यां विना नाशो न जायते ॥३५
इस रीति से शाप देकर जब वह शान्त हुए तो विनीत उस इन्द्र ने उनका पूजन भी किया था किन्तु हे ब्रह्मन् ! आगे होने वाले कार्य का अनुस्मरण करते हुए वह चुपचाप चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर उस इन्द्र की जो विजय की श्री थी वह असुरराज बलि का अनुगमन कर गयी थी और और जो नित्य श्री थी वह नित्य पुरुष वासुदेव के समीप में चली गयी थी ।३०। इन्द्र भी अपने पुर में पहुँच कर सब देवगणों से युक्त होता हुआ श्री से विहीन होकर ही विषाद से युक्त चित्त वाला हो गया था और वह चिन्ता करने लगा था ।३१। इसके पश्चात् उस देवों के पुर में परमाशुभ निमित्तों को उसने देखा था । फिर अपने गुरु बृहस्पतिजी को बुलाकर यह वाक्य उनसे कहा—।३२। हे भगवान् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और तीनों कालों के ज्ञान के महान् पंडित हैं । अब तो ऐसे अशुभ निमित्त दिखलाई दे रहे हैं जो पहिले कभी भी नहीं देखे गये थे । इन सबका क्या
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५१
फल होगा और इनका क्या कैसा भी कोई उपाय भी है ? बृहस्पतिजी ने देवराज के इस वाक्य का श्रवण कर फिर उन्होंने धर्मार्थ के सहित परम शुभ वाक्य में उत्तर दिया था ।३३-३४। हे राजन् ! किये हुए कर्मों का फल सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी बिना प्रायश्चित्त और उपभोगों के कभी भी विनाश नहीं होता है ।३५।
इन्द्र उवाच- कर्म वा कीदृशं ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं च कीदृशम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥३६
बृहस्पतिरुवाच- हननस्तेयहिंसाश्च पानमन्यांगनारतिः । कर्म पंचविधं प्राहुर्दुष्कृतं धरणीपतेः ॥३७ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रगोतुरंगखरोष्ट्रकाः । चतुष्पदोऽण्डजाब्जाश्च तिर्यंचोऽनस्थिकास्तथा ॥३८ अयुतं च सहस्रं च शतं दश तथा दश । दशपंचत्रिरेकार्धमानुपूर्व्यादिदं भवेत् ॥३६ ब्रह्मक्षत्रविशां स्त्रीणामुक्तार्थे पापमादिशेत् । पितृमातृगुरुस्वामिपुत्राणां चैव निष्कृतिः ॥४० गुर्वाज्ञया कृतं पापं तदाज्ञालंघनेऽर्थकम् । दशब्राह्मणभृत्यर्थमेकं हन्याद्द्विजं नृपः ॥४१ शतब्राह्मणभृत्यर्थं ब्राह्मणो ब्राह्मणं तु वा । पंचब्रह्मविदामर्थे वैश्यमेकं तु दंडयेत् ॥४२
इन्द्रदेव ने कहा—हे ब्रह्मन् ! वह कर्म किस प्रकार का है और प्रायश्चित्त कैसा है ? वह सब मैं सुनने का इच्छुक हूँ । वह मुझे विस्तार के साथ बतलाइए ।३६। बृहस्पति जी ने कहा—राजा के लिये पाँच तरह के दुष्कृत कहे गये हैं—किसी का हनन करना—स्तेय (चोरी)—हिंसा—मदिरा पान और अन्य अङ्गना के साथ में रति करना ।३७। ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, गौ--अश्व, गधा, ऊँट, चतुष्पद--अण्डज--अब्ज—तिर्यक्—
१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अनास्थिक ये योनियां हैं-इनमें अयुत, सहस्र-शत-दश-दश, पाँच, तीन, एक और आधा क्रम से आरम्भ से अन्त से अन्त तक जन्म धारण करना पड़ता है ।३८-३९। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और स्त्रियों का ऊपर में कहे हुए अर्थ में पाप समादिष्ट होता है । पिता-माता-गुरु-स्वामी और पुत्रों की निष्कृति होती है ।४०। गुरु की आज्ञा से कृत पाप उसकी आज्ञालंघन में अर्थ पाता है । राजा को दश ब्राह्मणों की भृति (भरण) के लिए चाहिए कि एक द्विजका हनन कर देवे । तात्पर्य यह है कि यदि दश ब्राह्मणों की जीविका की रक्षा होती है तो एक द्विज का हनन कर देना चाहिए ।४१। सौ ब्राह्मणों की भृति के लिए अथवा ब्राह्मण को ब्राह्मण तथा पाँच ब्रह्म (वेद) के ज्ञाताओं के लिए एक वैश्य को दण्ड राजा को दे देना चाहिए ।४२।
वैश्यं दशविशामर्थे विशां वा दंडयेत्तथा । तथा शतविशामर्थे द्विजमेकं तु दंडयेत् ॥४३
शूद्राणां तु सहस्राणां दंडयेद्ब्राह्मणं तु वा । तच्छतार्थं तु वा वैश्यं तद्दशांशं तु शूद्रकम् ॥४४
बंधूनां चैव मित्राणामिष्टार्थे तु त्रिपादकम् । अर्थकलत्रपुत्रार्थे स्वात्मार्थे न तु किंचन ॥४५
आत्मानं हन्तुमारब्धं ब्राह्मणं क्षत्रियं विशम् । गां वा तुरगमन्यं वा हत्वा दोषैर्न लिप्यते ॥४६
आत्मदारात्मजभ्रातृबंधूनां च द्विजोत्तम । क्रमाद्दशगुणो दोषो रक्षणे च तथा फलम् ॥४७
भूपद्विजश्रोत्रियवेदविद्व्रतोवेदान्तविद्वेदविदां विनाशे । एकद्विपंचाशदथायुतं च स्यान्निष्कृतिश्चेति वदंति संतः ॥४८
तेषां च रक्षणविधौ हि कृते च दाने पूर्वोदितोत्तरगुणं प्रवदन्ति पुण्यम् । तेषां च दर्शनविधौ नमने च कार्ये शुश्रूषणेऽपि चरतां सदृशांश्च तेषाम् ॥४९
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५३
दस वैश्यों की सुरक्षा के लिये एक वैश्य अथवा वैश्यों को दण्ड दे देना चाहिए। अथवा शत (सौ) वैश्यों का हित सम्पादन होता हो तो एक द्विज को दण्ड दे देना चाहिए ॥४३॥ सहस्त्र शूद्रों के लिए अथवा ब्राह्मण को दण्डित करे। उसके शतार्ध वैश्य को या उसका दशार्ध शूद्र को दण्ड देवे ॥४४॥ बन्धुओं के और मित्रों के अभीष्ट अर्थ में त्रिपाद अर्थात् तीन भाग में और कलत्र तथा पुत्र के लिए भी तीन भाग अर्थ का करे अपनी आत्मा के लिए कुछ भी न करे ॥४५॥ जो आत्मा को अर्थात् अपने को हनन करना आरम्भ करे वह चाहे ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य कोई भी हो अथवा अश्व—गो या अन्य को मारता हो तो उसका हनन करके भी दोषों से लिप्त नहीं होता है ॥४६॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! अपनी स्त्री-पुत्र-भाई और बन्धु का हनन करने में दशगुना दोष होता है और रक्षा करने में उतना ही फल भी होता है ॥४७॥ राजा—द्विज—श्रोत्रिय—वेदवेत्ता—व्रती—वेदान्त ज्ञाता और वेदों के मनीषी के विनाश करने में एक-दो-पचास और अयुत गुनी निष्कृति (प्रायश्चित्त) होता है—ऐसा सन्त पुरुष कहते हैं ॥४८॥ और इनकी रक्षा करने की विधि में और दान करने में पूर्व में जो कहा है उससे उत्तर गुना पुण्य कहते हैं। उनके दर्शन की विधि में तथा नमन करने में तथा इनकी सुश्रूषा करने में और इनके सदृश समाचरण करने वालों की भी शुश्रूषा आदि करने में भी वैसा ही फल होता है ॥४९॥
सिंहव्याघ्रमृगादीनि लोकहिंसाकराणि तु ।
नृपो हन्याच्च सततं देवार्थे ब्राह्मणार्थके ॥५०
आपत्स्वात्मार्थके चापि हत्वा मेध्यानि भक्षयेत् ॥५१
नात्मार्थे पाचयेदन्नं नात्मार्थे पाचयेत्पशून् ।
देवार्थे ब्राह्मणार्थे वा पचमानो न लिप्यते ॥५२
पुरा भगवती माया जगदुज्जीवनोन्मुखी ।
ससर्ज सर्वदेवांश्च तथैवासुरमानुषान् ॥५३
तेषां संरक्षणार्थाय पशूनपि चतुर्दश ।
यज्ञांश्च तद्विधानानि कृत्वा चैनानुवाच ह ॥५४
सिंह-व्याघ्र और मृग आदि जो लोगों की हिंसा करने वाले हैं उनको राजा देवों के तथा ब्राह्मणों के लिए निरन्तर हनन कर सकता है ॥५०॥
१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आवृत्ति के समय में अपने लिए भी हनन करके मेघों (पवित्रों) का भक्षण कर लेवे ।५१। अपने अन्न का पाचन न करे और पशुओं का भी पाचन नहीं करना चाहिए। देवों तथा ब्राह्मणों के लिये यदि पकाया भी जावे तो शेष से लिप्त नहीं होता है ।५२। पहिले इस जगत् के उज्जीवन की ओर प्रवृत्ति वाली भगवती माया ने देवों—असुरों और मानवों का सृजन किया था । उनकी रक्षा के लिए चौदह पशुओं की भी रचना की थी उसी भाँति यज्ञों की तथा उनके विधानों की भी रचना करके इनको बताया था ।५३-५४।
स्तेयपान वर्णन
इन्द्र उवाच—
भगवन्सर्वमाख्यातं हिंसाद्यस्य तु लक्षणम् ।
स्तेयस्य लक्षणं किं वा तन्मे विस्तरतो वद ॥१
बृहस्पतिरुवाच—
पापानामधिकं पापं हननं जीवजातिनाम् ।
एतस्मादधिकं पापं विश्वस्ते शरणं गते ॥२
विश्वस्य हत्वा पापिष्ठं शूद्रं वाप्यंत्यजातिजम् ।
ब्रह्महत्याधिकं पापं तस्मान्नास्त्यस्य निष्कृतिः ॥३
ब्रह्मज्ञस्य दरिद्रस्य कृच्छ्रार्जितधनस्य च ।
बहुपुत्रकलत्रस्य तेन जीवितुमिच्छतः ।
तद्द्रव्यस्तेयदोषस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४
विश्वस्तद्रव्यहरणं तस्याप्यधिकमुच्यते ।
विश्वस्ते वाप्यविश्वस्ते न दरिद्रधनं हरेत् ॥५
ततो देवद्विजातीनां हेमरत्नापहारकम् ।
यो हन्यादविचारेण सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥६
गुरुदेवद्विजसुहृत्पुत्रस्वात्मसुखेषु च ।
स्तेयादधः क्रमेणैव दशोत्तरगुणं त्वघम् ॥७
स्तेयपान वर्णन ] [ १५५
इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आपने हिंसादि का सम्पूर्ण लक्षण बता दिया है। अब स्तेय का क्या लक्षण है—यह भी आप मेरे सामने विस्तार के साथ वर्णन कीजिए ।१। समस्त पापों में अधिक पाप जीव जातियों का हनन करना ही होता है। इससे भी अधिक पाप उसके हनन करने का होता है जो विश्वस्त होवे तथा शरण में समागत हो गया हो ।२। विश्वास देकर पापिष्ठ शूद्र वा अन्त्य जातिज हो जो उसका हनन करता है वह ब्रह्म हत्या से भी अधिक पाप होता है जिसका कोई भी प्रायश्चित्त ही नहीं होता है ।३। जो ब्रह्मज्ञ हो—दरिद्र हो और बड़ी ही कठिनाई से जिसने धन का अर्जन किया हो तथा बहुत पुत्रों और कलत्र वाला हो एवं उसी धन से जो जीवित रहने की इच्छा रखता हो उसके द्रव्य की चोरी इतना महान दोष होता है कि फिर उसका कोई भी प्रायश्चित्त नहीं होता है ।४। जो विश्वस्त हो उसके द्रव्य के हरण करने का पाप उससे भी अधिक होता है। विश्वस्त हो अथवा अविश्वस्त हो दरिद्र के धन का हरण कभी नहीं करना चाहिए ।५। देवों और द्विजातियों के सुवर्ण तथा रत्नों के अपहरण करने वाले को जो बिना ही विचार किये मार डालता है उसको अश्वमेध यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त होता है ।६। गुरु-देव-द्विज-पुत्र-और आत्म सुख के धन की चोरी करता है उसका अधःक्रम से ही दश गुना उत्तर अघ होता है ।७।
अन्त्यजात्पादजाद्वैश्यात्क्षत्रियाद्ब्राह्मणादपि । दशोत्तरगुणैः पापैर्लिप्यते धनहारकः ॥८ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । रहस्यातिरहस्यं च सर्वपापप्रणाशनम् ॥९ पुरा कांचीपुरे जातो वज्राख्यो नाम चोरकः । तस्मिन्पुरवरे रम्ये सर्वैश्वर्यसमन्विताः । सर्वे नीरोगिणो दांताः सुखिनो दययांचिताः ॥१० सर्वैश्वर्यसमृद्धेऽस्मिन्नगरे स तु तस्करः । स्तोकास्तोकक्रमेणैव बहुद्रव्यमपाहरत् ॥११ तदरण्येऽवटं कृत्वा स्थापयामास लोभतः । तद्गोपनं निशार्धायं तस्मिन्दूरं गते सति ॥१२ किरातः कश्चिदागत्य तं दृष्ट्वा तु दशांशतः । जहाराविदितस्तेन काष्ठभारं वहन्ययौ ॥१३
१५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सोऽपि तच्छिलयाच्छाद्य मृद्भिरामूर्य यत्नतः । पुनश्च तत्पुरं प्रायाद्वज्रोऽपि धनतृष्णया ॥१४
अन्त्यज-शूद्र-वैश्य-क्षत्रिय और ब्राह्मण से भी दश गुणोत्तर पापों से धन के हरण करने वाला लिप्त हुआ करता है ।८। इस विषय में एक पुराना इतिहास उदाहृत करते हैं। यह रहस्यों का भी अधिक रहस्य है और पापों का विनाश कर देने वाला है ।६। प्राचीन काल में काञ्चीपुर में एक वज्र नाम वाला चोर उत्पन्न हुआ था। वह पुर ऐसा था कि वहाँ पर बड़ी रम्यता थी और वहाँ के निवासी जन सभी प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त—नीरोग—दान्त—सुखी—और दयान्वित थे ।१०। यह नगर सब तरह के ऐश्वर्य से समन्वित था उससे वह तस्कर ने स्तोकास्तोक अर्थात् न्यूनाधिक क्रम से बहुत से धन का अपहरण किया था ।११। उसको वह जङ्गल में एक गड्ढा बनाकर लोभ से रख दिया करता था । उसका गोपन आधी रात में किया करता था । जब धन रख चला गया था तब किसी किरात ने वहाँ आकर उसको देखा था उसका दशम भाग उसमें से किरात ने ले लिया था। वह तस्कर इसको नहीं जान पाया था। वह किरात तो काष्ठ का भार लेकर चला गया था ।१२-१३। वह तस्कर भी एक शिला से उस गड्ढे को ढक कर और मिट्टी से भरकर फिर उसी नगर में धन की तृष्णा से चला गया था ।१४।
एवं बहुधनं हृत्वा निश्चिक्षेप महीतले ।
किरातोऽपि गृहं प्राप्य बभाषे मुदितः प्रियां ॥१५
मया काष्ठं समाहर्तुं गच्छता पथि निर्जने ।
लब्धं धनमिदं भीरु समाधत्स्व धनार्थिनि ॥१६
तच्छ्रुत्वा तत्समादाय निधायाभ्यंतरे ततः ।
चिंतयंती ततो वाक्यमिदं स्वपतिमब्रवीत् ॥१७
नित्यं संचरते विप्रो मामकानां गृहेषु यः ।
मां विलोक्यैवमचिराद् बहुभाग्यवती भवेत् ॥१८
चातुर्वर्ण्यासु नारीषु स्थेयं चेद्राजवल्लभा ।
किं तु भिल्ले किराते च शैलूषे चांत्यजातिजे ।
लक्ष्मीर्न तिष्ठति चिरं शाताद्वल्मीकजन्मनः ॥१९॥
स्तेयपान वर्णन ] [ १५७
तथापि बहुभाग्यानां पुण्यानामपि पात्रिणे । दृष्टपूर्वं तु तद्वाक्यं न कदाचिद्वृथा भवेत् ॥२० अथ वात्मप्रयासेन कृच्छ्राद्यल्लभ्यते धनम् । तदेव तिष्ठति चिरादन्यद्गच्छति कालतः ॥२१
इस रीति से बहुत सा धन चोर कर वज्र ने भूमि में रख दिया उस किरात ने भी घर में आकर प्रसन्न होते हुए अपनी पत्नी से कहा था ।१५। मैंने काष्ठ का समाहरण करने के लिए वन में गमन करते हुए मार्ग में यह धन प्राप्त किया है । हे भीरु ! आपको तो धन की इच्छा है इसे अब अपने पास रक्खो ।१६। यह श्रवण करके उसने उस धन को ले लिया था और घर में अन्दर रख दिया था । फिर मन में कुछ चिन्तन करती हुई उसने अपने पति से यह वाक्य कहा था ।१७। जो यह विप्र हमारे घरों में नित्य ही सञ्चरण किया करता है । वह मुझ को देखकर कि यह थोड़े ही समय में बहुत भाग्य वाली हो गई है । चारों वर्णों की नारियों में यह यदि राज वल्लभा हो-ऐसा ही कहेंगे । किन्तु भील-किरात-शैलूष और अन्त्य जातीय पुरुष में वाल्मीकि के शापसे यह लक्ष्मी अधिक समय तक नहीं स्थित रहा करती है ।१८-१६। तो भी बहुत भाग्य वाले पुण्यों के पात्र के लिए यह वाक्य पूर्व में देखा गया है और यह कभी भी वृथा नहीं होता ।२०। अथवा जो धन अपने प्रयास से कष्ट के साथ प्राप्त किया जाता है वह ही धन स्थिर होता है और अधिक समय पर्यन्त ठहरता है । इसके अतिरिक्त जो अनायास मिल जाता है वह कुछ ही समय में चला जाया करता है ।२१।
स्वयमागतवित्तं तु धर्मार्थेविनियोजयेत् । कुरुष्वैतेन तस्मात्त्वं वापीकूपादिकाञ्छुभान् ॥२२ इति तद्वचनं श्रुत्वा भाविभाग्यप्रबोधितम् । बहूदकसमं देशं तत्रकव्यलोथयत् ॥२३ निर्ममेऽथ महेंद्रस्य दिग्भागे विमलोदकम् । सुबहुद्रव्यसंसाध्यं तटाकं चाक्षयोदकम् ॥२४ दत्तेषु कर्मकारिभ्यो निखिलेषु धनेषु च । असंपूर्ण तु तत्कर्म दृष्ट्वा चिंताकुलोऽभवत् ॥२५
१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तं चौरं वज्रनामानमज्ञातोऽनुचराम्यहम् । तेनैव बहुधा क्षिप्तं धनं भूरि महीतले ॥२६ स्तोकं स्तोकं हरिष्यामि तत्र तत्र धनं बहु । इति निश्चित्य मनसा तेनाज्ञातस्तमन्वगात् ॥२७ तथैवाहृत्य तद्द्रव्यं तेन सेतुमपूरयत् । मध्ये जलावृतस्तेन प्रसादश्चापि शाङ्गिणः ॥२८
यह धन तो बिना ही श्रम के आपके पास आगया है। इसका तो धर्मार्थ आपको विनियोग करना चाहिए। अतः आप इस धन से शुभ कर्म बावड़ी—कूप और तालाब आदि के निर्माण करने में व्यय कर दीजिए ।२२। अपनी पत्नी के इस वचन का श्रवण करके जो कि आगे होने वाले भाग्य को सुबोधित करने वाला था उस किरात ने जहाँ-तहाँ पर देखा या कि सभी स्थल अधिक जल वाले थे ।२३। फिर ऐन्द्री दिशा में उसने एक विमल उदक वाला तलाब जो बहुत अधिक धन से बनाये जाने वाला था बनवाया था जिसमें जल कभी भी क्षीण नहीं होता था ।२४। सम्पूर्ण धन काम करने बालों को दे देने पर भी वह काम अपूर्ण देखकर वह चिन्ता से बेचैन हो गया था ।२५। उसने सोचा कि उस वज्र नामक चोर के पीछे उसके बिना जाने हुए मैं गमन करूँ । उसने ही प्रायः भूमि में अधिक धन डाला ही होगा ।२६। वहाँ-वहाँ से ही थोड़ा-थोड़ा करके बहुत-सा धन हरण करूँगा । ऐसा ही मन में निश्चय करके वह उसके बिना जाने हुए उसी के पीछे गया था ।२७। उसी भाँति से उसने उस धन का आहरण किया था और उस सेतु को पूर्ण कर दिया था। उस तालाब के मध्य में जिसके चारों ओर जल था, एक भगवान् विष्णु का प्रासाद भी बनवाया था ।२८।
अमृत मन्थन वर्णन
इन्द्र उवाच- भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानवित्तम । दुष्कृतं तत्प्रतीकारो भवता सम्यगीरितः ॥१ केन कर्मविपाकेन ममापदियमागता । प्रायश्चित्तं च किं तस्य गदस्व वदतां वर ॥२
अमृत मंथन वर्णन ] [ १५६
बृहस्पतिरुवाच- काश्यपस्य ततो जज्ञे दित्यां दनुरिति स्मृतः । कन्या रूपवती नाम धात्रे तां प्रददौ पिता ॥३ तस्याः पुत्रस्ततो जातो विश्वरूपो महाद्युतिः । नारायणपरो नित्यं वेदवेदांगपारगः ॥४ ततो दैत्येश्वरो वव्रे भृगुपुत्रं पुरोहितम् । भवानधिकृतो राज्ये देवानामिव वासवः ॥५ ततः पूर्वे च काले तु सुधर्मायां त्वयि स्थिते । त्वया कश्चित्कृतः प्रश्नः ऋषीणां सन्निधौ तदा ॥६ संसारस्तीर्थयात्रा वा कोऽधिकोऽस्ति तयोर्गुणः । वदंतु तद्विनिश्चित्य भवन्तो मदनुग्रहात् ॥७
इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और भूत वर्त्तमान और भविष्य के ज्ञान वाले हैं । आपने दुष्कृत और उसका प्रतीकार भली भांति से वर्णित कर दिया है ।१। अब आप मुझे यही बताने की कृपा करें मुझे यह आपत्ति किस कर्म के विपाक से प्राप्त हुई है और इसका प्रायश्चित्त क्या हो सकता है ? आप तो बोलने वालों में भी परम श्रेष्ठ हैं ।२। बृहस्पतिजी ने कहा—काश्यप मुनि की पत्नी दिति में दनु नाम वाली कन्या ने जन्म ग्रहण किया था । वह कन्या रूपवती थी । पिता ने उसको धाता को दी थी ।३। उसका पुत्र फिर महती द्युति वाला विश्व-रूप उत्पन्न हुआ था वह भगवान् नारायण में ही परायण था तथा वेद वेदाङ्गों का पारगामी विद्वान था ।४। इसके उपरान्त उस दैत्येश्वर ने भृगु के पुत्र पुरोहितजी से कहा था कि आप देवों में वासव की ही भांति राज्य में अधिकृत हैं ।५। फिर पूर्वकाल में देवों की सभा में आप जब स्थित थे तब आपने ऋषियों की सन्निधि में कोई प्रश्न किया था ।६। संसार अथवा तीर्थ यात्रा इन दोनों में कौन अधिक गुण वाला है । अब आप मेरे पर अनुग्रह करके उसका निश्चय करके मुझे बतलाइए ।७।
तत्प्रश्नस्योत्तरं वक्तुं ते सर्व उपचक्रिरे । तत्पूर्वमेव कथितं मया विधिबलेन वै ॥८
१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तीर्थयात्रा समधिका संसारादिति च द्रुतम् ।
तच्छ्रुत्वा ते प्रकुपिताः शेपुर्मामृषयोऽखिलाः ॥६
कर्मभूमिं व्रजेः शीघ्रं दारिद्र्येण मितैः सुतैः ।
एवं प्रकुपितैः शप्तः खिन्नः कांचीं समाविशम् ॥१०
पुरीं पुरोधसा हीनां वीक्ष्य चिंताकुलात्मना ।
भवता सह देवैस्तु पौरोहित्यार्थमादरात् ॥११
प्राथितो विश्वरूपस्तु बभूव तपतां वरः ।
स्वस्त्रीयो दानवानां तु देवानां च पुरोहितः ॥१२
नात्यर्थमकरोद्वैरं दैत्येष्वपि महातपाः ।
बभूवतूस्तुल्यबलौ तदा दैत्येन्द्रवासवौ ॥१३
ततस्त्वं कुपितो राजन्स्वस्त्रीयं दानवेशितुः ।
हंतुमिच्छन्नगाश्चाशु तपसः साधनं वनम् ॥१४
उस प्रश्न का उत्तर बताने के लिए उनने सबने उपक्रम किया था। उसके पूर्व ही मैंने विधाता के बल से पूर्व में ही शीघ्र कहा था कि तीर्थयात्रा संसार से समधिक है। यह सुनकर वे सब ऋषिगण बहुत प्रकुपित हो गये थे और उन्होंने मुझको शाप दे दिया था ।८-६। कर्म भूमि में मित सुतों के सहित दरिद्रता से युक्त होकर गमन कर जाओ। इस तरह कुपित ऋषियों के द्वारा शाप दिया हुआ मैं काञ्ची में प्रवेश कर गया था ।१०। चिन्ता से विकल पुरोहितजी ने हीन पुरी का अवलोकन करके आपके द्वारा देवों के सहित बड़े ही आदर से पौरोहित्य कर्म के लिए उनसे प्रार्थना की गयी थी ।११। तापसों में श्रेष्ठ विश्व रूप से जब प्रार्थना की गयी थी तो वह दानवों का तो बहिन का पुत्र था और देवों का पुरोहित था ।१२। उस महान् तपस्वी ने दैत्यों में भी अत्यधिक वैर नहीं किया था। उस समय में दैत्येन्द्र और इन्द्र दोनों तुल्य बल वाले हुए थे ।१३। इसके पश्चात् हे राजन् ! दानवेश्वर के स्वस्रीय पर आप कुपित हो गये थे और उसका हनन करने की इच्छा रखते हुए शीघ्र ही तप के साधन वन में चला गया था ।१४।
तमासनस्थं मुनिभिस्त्रिशृंगमिव पर्वतम् ।
त्रयी मुखरदिग्भागं ब्रह्मानन्दैकनिष्ठितम् ॥१५
अमृत मंथन वर्णन ] [ १६१
सर्वभूतहितं तं तु मत्वा चेशानुकूलितः । शिरांसि यौगपद्येन छिन्नान्यासस्तवैव तु ॥१६ तेन पापेन संयुक्तः पीडितश्च मुहुर्मुहुः । ततो मेरुगुहां नीत्वा बहूनब्दान्हि संस्थितः ॥१७ ततस्तस्य वचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तु मुनिवाक्यतः । पुत्रशोकेन संतप्तस्त्वां शशाप रुषान्वितः ॥१८ निः श्रीको भवतु क्षिप्रं मम शापेन वासवः । अनाथकास्ततो देवा विषण्णा दैत्यपीडिताः ॥१९ त्वया मया च रहिताः सर्वे देवाः पलायिताः । गत्वा तु ब्रह्मसदनं नत्वा तद्वृत्तमूचिरे ॥२० ततस्तु चितयामास तदघस्य प्रतिकियाम् । तस्य प्रतिक्रियां वेत्तुं न शशाकात्मभूस्तदा ॥२१
मुनियों के साथ आसन पर स्थित उसको तीन शिखरों वाले पर्वत के समान वेदत्रयी से दिशाओं का भाग मुखरित हो रहा था और वह ब्रह्मानन्द में एकनिष्ठ था तथा सब भूतों का हितकर था उसको ऐसा मान कर ईशानुकूलित था। आपने ही एक साथ उसके शिरों को काट दिया था ।१५-१६। उस पाप से संयुत बार-बार पीड़ित हैं। फिर मेरु की गुहा में जाकर बहुत वर्षों तक रहा था।१७। इसके अनन्तर उसके वचन का श्रवण करके और मुनि के वाक्य से ज्ञान प्राप्त करके पुत्र शोक से सन्तप्त होकर क्रोध से समन्वित उसने आपको शाप दे दिया था ।१८। इन्द्र मेरे शाप से शीघ्र ही श्री से विहीन हो जावे। फिर सभी देवगण बिना नाथ वाले हो गये थे और विषाद से युक्त हो गये थे तथा दैत्यों के द्वारा उत्पीड़ित हो गये थे ।१९। तुम्हारे द्वारा और मेरे द्वारा रहित सभी देव भाग गये थे। वे सब देवगण ब्रह्माजी के निवास स्थान में जाकर प्रणाम करके सम्पूर्ण वृत्त उनसे कह दिया था ।२०। इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने उसके पाप की प्रतिक्रिया का चिन्तन किया था किन्तु उस समय में ब्रह्माजी उसकी कोई भी प्रतिक्रिया न जान सके थे ।२१।
ततो देवैः परिवृतो नारायणमुपागमन् ॥२२
१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
नत्वा स्तुत्वा चतुर्वक्त्रस्तद्वृत्तांतं व्यजिज्ञपत् । विचिंत्य सोऽपि बहुधा कृपया लोकनायकः ॥२३ तदघं तु त्रिधा भित्वा त्रिषु स्थानेष्वथार्पयत् । स्त्रीषु भूम्यां च वृक्षेषु तेषामपि वरं ददौ ॥२४ तदा भर्तृ समायोगं पुत्रावाप्तिमृतुष्वपि । छेदे पुनर्भवत्वं तु सर्वेषामपि शाखिनाम् ॥२५ खातपूर्ति धरण्याश्च प्रददौ मधुसूदनः । तेष्वघं प्रबभूवाशु रजोनियांसमूषरम् ॥२६ निर्गतो गह्वरात्तस्मात्त्वमिन्द्रो देवनायकः । राज्यश्रियं च संप्राप्तः प्रसादात्परमेष्ठिनः ॥२७ तेनैव सांत्वितो धाता जगाद च जनार्दनम् । मम शापो वृथा न स्यादस्तु कालांतरे मुने ॥२८
इसके अनन्तर जब कोई भी प्रतिक्रिया समझ में नहीं आयी तो ब्रह्माजी देवों से घिरे हुए ही भगवान् नारायण के समीप में पहुँचे थे ।२२। सर्व प्रथम उन्होंने नारायण को प्रणाम किया था फिर स्तुति की थी ओर इसके उपरान्त यह वृत्तान्त उनकी सेवा में कहा था । उन लोकों के नायक प्रभु ने कृपाकर बहुत विचिन्तिन करके विचार किया था ।२३। उसके अघ को तीन भागों में विभक्त करने तीन स्थानों में अर्पित कर दिया था । स्त्रियों में—वृक्षा में और भूमि में उसको रख दिया था और उनको वरदान भी दिया था । उस अघ के देने के बदले में ही तीनों को तीन वरदान दिये थे । ।२४। उस समय में जब ऋतुकाल हो तो स्वामी के साथ संयोग से पुत्र की प्राप्ति हो जायगी । वृक्षों का छेदन में पुनः जन्म धारण कर लेना हो जायग। ।२५। भूमि में गर्त्त कर दिया जाये तो वह अपने आप ही कुछ समय में भर जायग।—ये तीनों को तीन वरदान मधुसूदन प्रभु ने दिये थे । उसका अघ शीघ्र ही तीनों में प्रभूत हो गया था—स्त्रियों ये रजोधर्शन-वृक्षों में गोद और भूमि में ऊपर में उसी अघ के कारण हुआ था ।२६। तुम इन्द्र उस गहन अघ से निकल गये थे और देव नायक के फिर परमेष्ठी के प्रसाद से राज्य की श्री को प्राप्त करने वाले हो गये थे ।२७। उसके द्वारा धाता को इस प्रकार सान्त्वना दी थी और जनार्दन प्रभु से कहा था । हे मुने ! मेरा शाप वृथा नहीं होगा और अन्य काल में होगा ।२८।
अमृत मंथन वर्णन ] [ १६३
भगवांस्तद्वचः श्रुत्वा मुनेरमिततेजसः ।
प्रहृष्टो भाविकार्यज्ञस्तूष्णीमेव तदा ययौ ॥२६
एतावंतमिमं कालं त्रिलोकीं पालयन्भवान् ।
ऐश्वर्यमदमत्तत्वात्कैलासाद्रिमपीडयत् ॥३०
सर्वज्ञेन शिवेनाथ प्रेषितो भगवान्मुनिः ।
दुर्वासास्त्वन्मदभ्रंशं कर्त्तुकामा शशाप ह ॥३१
एकमेव फलं जातमुभयोः शापयोरपि ।
अधुना पश्यनिःश्रीकं त्रैलोक्यं समजायत ॥३२
न यज्ञाः संप्रवर्त्तंते न दानानि च वासव ।
न यमा नापि नियमा न तपांसि च कुत्रचित् ॥३३
विप्राः सर्वेऽपि निःश्रीका लोभोपहतचेतसः ।
निःसत्वा धैर्यहीनाश्च नास्तिकाः प्रायशोऽभवन् ॥३४
निरोषधिरसा भूमिर्निीवीर्या जायतेतराम् ।
भास्करो धूसराकारश्चन्द्रमाः कांतिवर्जितः ॥३५
उन अपरिमित तेज वाले मुनि के इस वचन का श्रवण करके भगवान उस समय में चुप चाप ही वहाँ से चले गये थे क्योंकि ये तो आगे होने वाले कार्य का ज्ञान रखने वाले थे।२६। आप इतने समय तक त्रिलोकी का पालन करते हुए ऐश्वर्य के मद से मत्तता होने के कारण से आपने कैलाश पर्वत को पीड़ित किया था।३०। इसके अनन्तर सर्वज्ञ भगवान शिव ने भगवान मुनि को भेजा था। दुर्वासा जी ने आपके मद को भ्रंश करने की ही इच्छा से शाप दिया था।३१। इन दोनों शापों का एक फल हुआ है। अब देखिए यह त्रैलोक्य श्री से रहित हो गया।३२। हे वासव ! न तो अब यज्ञ संप्रवृत्त हो हो रहे हैं और न दान ही दिये जा रहे हैं और इस समय में तो कहीं पर भी यम-नियम और तपश्चर्या कुछ भी नहीं हैं।३३। सभी विप्र श्री से रहित हैं और इनके हृदय में लोभ ऐसा बैठ गया है कि इनका चित्त उपहत सा हो गया है। इनमें सत्व नाम मात्र को भी नहीं है—ये धैर्य से हीन हो गये हैं तथा बहुधा ये सब नास्तिक हो गये हैं। जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते हैं वे नास्तिक होते हैं।३४। यह