संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अनास्थिक ये योनियां हैं-इनमें अयुत, सहस्र-शत-दश-दश, पाँच, तीन, एक और आधा क्रम से आरम्भ से अन्त से अन्त तक जन्म धारण करना पड़ता है ।३८-३९। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और स्त्रियों का ऊपर में कहे हुए अर्थ में पाप समादिष्ट होता है । पिता-माता-गुरु-स्वामी और पुत्रों की निष्कृति होती है ।४०। गुरु की आज्ञा से कृत पाप उसकी आज्ञालंघन में अर्थ पाता है । राजा को दश ब्राह्मणों की भृति (भरण) के लिए चाहिए कि एक द्विजका हनन कर देवे । तात्पर्य यह है कि यदि दश ब्राह्मणों की जीविका की रक्षा होती है तो एक द्विज का हनन कर देना चाहिए ।४१। सौ ब्राह्मणों की भृति के लिए अथवा ब्राह्मण को ब्राह्मण तथा पाँच ब्रह्म (वेद) के ज्ञाताओं के लिए एक वैश्य को दण्ड राजा को दे देना चाहिए ।४२।
वैश्यं दशविशामर्थे विशां वा दंडयेत्तथा । तथा शतविशामर्थे द्विजमेकं तु दंडयेत् ॥४३
शूद्राणां तु सहस्राणां दंडयेद्ब्राह्मणं तु वा । तच्छतार्थं तु वा वैश्यं तद्दशांशं तु शूद्रकम् ॥४४
बंधूनां चैव मित्राणामिष्टार्थे तु त्रिपादकम् । अर्थकलत्रपुत्रार्थे स्वात्मार्थे न तु किंचन ॥४५
आत्मानं हन्तुमारब्धं ब्राह्मणं क्षत्रियं विशम् । गां वा तुरगमन्यं वा हत्वा दोषैर्न लिप्यते ॥४६
आत्मदारात्मजभ्रातृबंधूनां च द्विजोत्तम । क्रमाद्दशगुणो दोषो रक्षणे च तथा फलम् ॥४७
भूपद्विजश्रोत्रियवेदविद्व्रतोवेदान्तविद्वेदविदां विनाशे । एकद्विपंचाशदथायुतं च स्यान्निष्कृतिश्चेति वदंति संतः ॥४८
तेषां च रक्षणविधौ हि कृते च दाने पूर्वोदितोत्तरगुणं प्रवदन्ति पुण्यम् । तेषां च दर्शनविधौ नमने च कार्ये शुश्रूषणेऽपि चरतां सदृशांश्च तेषाम् ॥४९