संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५३
दस वैश्यों की सुरक्षा के लिये एक वैश्य अथवा वैश्यों को दण्ड दे देना चाहिए। अथवा शत (सौ) वैश्यों का हित सम्पादन होता हो तो एक द्विज को दण्ड दे देना चाहिए ॥४३॥ सहस्त्र शूद्रों के लिए अथवा ब्राह्मण को दण्डित करे। उसके शतार्ध वैश्य को या उसका दशार्ध शूद्र को दण्ड देवे ॥४४॥ बन्धुओं के और मित्रों के अभीष्ट अर्थ में त्रिपाद अर्थात् तीन भाग में और कलत्र तथा पुत्र के लिए भी तीन भाग अर्थ का करे अपनी आत्मा के लिए कुछ भी न करे ॥४५॥ जो आत्मा को अर्थात् अपने को हनन करना आरम्भ करे वह चाहे ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य कोई भी हो अथवा अश्व—गो या अन्य को मारता हो तो उसका हनन करके भी दोषों से लिप्त नहीं होता है ॥४६॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! अपनी स्त्री-पुत्र-भाई और बन्धु का हनन करने में दशगुना दोष होता है और रक्षा करने में उतना ही फल भी होता है ॥४७॥ राजा—द्विज—श्रोत्रिय—वेदवेत्ता—व्रती—वेदान्त ज्ञाता और वेदों के मनीषी के विनाश करने में एक-दो-पचास और अयुत गुनी निष्कृति (प्रायश्चित्त) होता है—ऐसा सन्त पुरुष कहते हैं ॥४८॥ और इनकी रक्षा करने की विधि में और दान करने में पूर्व में जो कहा है उससे उत्तर गुना पुण्य कहते हैं। उनके दर्शन की विधि में तथा नमन करने में तथा इनकी सुश्रूषा करने में और इनके सदृश समाचरण करने वालों की भी शुश्रूषा आदि करने में भी वैसा ही फल होता है ॥४९॥
सिंहव्याघ्रमृगादीनि लोकहिंसाकराणि तु ।
नृपो हन्याच्च सततं देवार्थे ब्राह्मणार्थके ॥५०
आपत्स्वात्मार्थके चापि हत्वा मेध्यानि भक्षयेत् ॥५१
नात्मार्थे पाचयेदन्नं नात्मार्थे पाचयेत्पशून् ।
देवार्थे ब्राह्मणार्थे वा पचमानो न लिप्यते ॥५२
पुरा भगवती माया जगदुज्जीवनोन्मुखी ।
ससर्ज सर्वदेवांश्च तथैवासुरमानुषान् ॥५३
तेषां संरक्षणार्थाय पशूनपि चतुर्दश ।
यज्ञांश्च तद्विधानानि कृत्वा चैनानुवाच ह ॥५४
सिंह-व्याघ्र और मृग आदि जो लोगों की हिंसा करने वाले हैं उनको राजा देवों के तथा ब्राह्मणों के लिए निरन्तर हनन कर सकता है ॥५०॥