संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तीर्थयात्रा समधिका संसारादिति च द्रुतम् ।
तच्छ्रुत्वा ते प्रकुपिताः शेपुर्मामृषयोऽखिलाः ॥६
कर्मभूमिं व्रजेः शीघ्रं दारिद्र्येण मितैः सुतैः ।
एवं प्रकुपितैः शप्तः खिन्नः कांचीं समाविशम् ॥१०
पुरीं पुरोधसा हीनां वीक्ष्य चिंताकुलात्मना ।
भवता सह देवैस्तु पौरोहित्यार्थमादरात् ॥११
प्राथितो विश्वरूपस्तु बभूव तपतां वरः ।
स्वस्त्रीयो दानवानां तु देवानां च पुरोहितः ॥१२
नात्यर्थमकरोद्वैरं दैत्येष्वपि महातपाः ।
बभूवतूस्तुल्यबलौ तदा दैत्येन्द्रवासवौ ॥१३
ततस्त्वं कुपितो राजन्स्वस्त्रीयं दानवेशितुः ।
हंतुमिच्छन्नगाश्चाशु तपसः साधनं वनम् ॥१४
उस प्रश्न का उत्तर बताने के लिए उनने सबने उपक्रम किया था। उसके पूर्व ही मैंने विधाता के बल से पूर्व में ही शीघ्र कहा था कि तीर्थयात्रा संसार से समधिक है। यह सुनकर वे सब ऋषिगण बहुत प्रकुपित हो गये थे और उन्होंने मुझको शाप दे दिया था ।८-६। कर्म भूमि में मित सुतों के सहित दरिद्रता से युक्त होकर गमन कर जाओ। इस तरह कुपित ऋषियों के द्वारा शाप दिया हुआ मैं काञ्ची में प्रवेश कर गया था ।१०। चिन्ता से विकल पुरोहितजी ने हीन पुरी का अवलोकन करके आपके द्वारा देवों के सहित बड़े ही आदर से पौरोहित्य कर्म के लिए उनसे प्रार्थना की गयी थी ।११। तापसों में श्रेष्ठ विश्व रूप से जब प्रार्थना की गयी थी तो वह दानवों का तो बहिन का पुत्र था और देवों का पुरोहित था ।१२। उस महान् तपस्वी ने दैत्यों में भी अत्यधिक वैर नहीं किया था। उस समय में दैत्येन्द्र और इन्द्र दोनों तुल्य बल वाले हुए थे ।१३। इसके पश्चात् हे राजन् ! दानवेश्वर के स्वस्रीय पर आप कुपित हो गये थे और उसका हनन करने की इच्छा रखते हुए शीघ्र ही तप के साधन वन में चला गया था ।१४।
तमासनस्थं मुनिभिस्त्रिशृंगमिव पर्वतम् ।
त्रयी मुखरदिग्भागं ब्रह्मानन्दैकनिष्ठितम् ॥१५