भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अमृत मंथन वर्णन ] [ १५६

बृहस्पतिरुवाच- काश्यपस्य ततो जज्ञे दित्यां दनुरिति स्मृतः । कन्या रूपवती नाम धात्रे तां प्रददौ पिता ॥३ तस्याः पुत्रस्ततो जातो विश्वरूपो महाद्युतिः । नारायणपरो नित्यं वेदवेदांगपारगः ॥४ ततो दैत्येश्वरो वव्रे भृगुपुत्रं पुरोहितम् । भवानधिकृतो राज्ये देवानामिव वासवः ॥५ ततः पूर्वे च काले तु सुधर्मायां त्वयि स्थिते । त्वया कश्चित्कृतः प्रश्नः ऋषीणां सन्निधौ तदा ॥६ संसारस्तीर्थयात्रा वा कोऽधिकोऽस्ति तयोर्गुणः । वदंतु तद्विनिश्चित्य भवन्तो मदनुग्रहात् ॥७

इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञान रखने वाले हैं और भूत वर्त्तमान और भविष्य के ज्ञान वाले हैं । आपने दुष्कृत और उसका प्रतीकार भली भांति से वर्णित कर दिया है ।१। अब आप मुझे यही बताने की कृपा करें मुझे यह आपत्ति किस कर्म के विपाक से प्राप्त हुई है और इसका प्रायश्चित्त क्या हो सकता है ? आप तो बोलने वालों में भी परम श्रेष्ठ हैं ।२। बृहस्पतिजी ने कहा—काश्यप मुनि की पत्नी दिति में दनु नाम वाली कन्या ने जन्म ग्रहण किया था । वह कन्या रूपवती थी । पिता ने उसको धाता को दी थी ।३। उसका पुत्र फिर महती द्युति वाला विश्व-रूप उत्पन्न हुआ था वह भगवान् नारायण में ही परायण था तथा वेद वेदाङ्गों का पारगामी विद्वान था ।४। इसके उपरान्त उस दैत्येश्वर ने भृगु के पुत्र पुरोहितजी से कहा था कि आप देवों में वासव की ही भांति राज्य में अधिकृत हैं ।५। फिर पूर्वकाल में देवों की सभा में आप जब स्थित थे तब आपने ऋषियों की सन्निधि में कोई प्रश्न किया था ।६। संसार अथवा तीर्थ यात्रा इन दोनों में कौन अधिक गुण वाला है । अब आप मेरे पर अनुग्रह करके उसका निश्चय करके मुझे बतलाइए ।७।

तत्प्रश्नस्योत्तरं वक्तुं ते सर्व उपचक्रिरे । तत्पूर्वमेव कथितं मया विधिबलेन वै ॥८