भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 571

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६१

सर्वभूतहितं तं तु मत्वा चेशानुकूलितः । शिरांसि यौगपद्येन छिन्नान्यासस्तवैव तु ॥१६ तेन पापेन संयुक्तः पीडितश्च मुहुर्मुहुः । ततो मेरुगुहां नीत्वा बहूनब्दान्हि संस्थितः ॥१७ ततस्तस्य वचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तु मुनिवाक्यतः । पुत्रशोकेन संतप्तस्त्वां शशाप रुषान्वितः ॥१८ निः श्रीको भवतु क्षिप्रं मम शापेन वासवः । अनाथकास्ततो देवा विषण्णा दैत्यपीडिताः ॥१९ त्वया मया च रहिताः सर्वे देवाः पलायिताः । गत्वा तु ब्रह्मसदनं नत्वा तद्वृत्तमूचिरे ॥२० ततस्तु चितयामास तदघस्य प्रतिकियाम् । तस्य प्रतिक्रियां वेत्तुं न शशाकात्मभूस्तदा ॥२१

मुनियों के साथ आसन पर स्थित उसको तीन शिखरों वाले पर्वत के समान वेदत्रयी से दिशाओं का भाग मुखरित हो रहा था और वह ब्रह्मानन्द में एकनिष्ठ था तथा सब भूतों का हितकर था उसको ऐसा मान कर ईशानुकूलित था। आपने ही एक साथ उसके शिरों को काट दिया था ।१५-१६। उस पाप से संयुत बार-बार पीड़ित हैं। फिर मेरु की गुहा में जाकर बहुत वर्षों तक रहा था।१७। इसके अनन्तर उसके वचन का श्रवण करके और मुनि के वाक्य से ज्ञान प्राप्त करके पुत्र शोक से सन्तप्त होकर क्रोध से समन्वित उसने आपको शाप दे दिया था ।१८। इन्द्र मेरे शाप से शीघ्र ही श्री से विहीन हो जावे। फिर सभी देवगण बिना नाथ वाले हो गये थे और विषाद से युक्त हो गये थे तथा दैत्यों के द्वारा उत्पीड़ित हो गये थे ।१९। तुम्हारे द्वारा और मेरे द्वारा रहित सभी देव भाग गये थे। वे सब देवगण ब्रह्माजी के निवास स्थान में जाकर प्रणाम करके सम्पूर्ण वृत्त उनसे कह दिया था ।२०। इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने उसके पाप की प्रतिक्रिया का चिन्तन किया था किन्तु उस समय में ब्रह्माजी उसकी कोई भी प्रतिक्रिया न जान सके थे ।२१।

ततो देवैः परिवृतो नारायणमुपागमन् ॥२२