संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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एक तो यही कारण है और दूसरा कारण यह है कि क्षत का त्राणत्व वाला है । यह भोज्यत्व वाला है तथा इसमें विषय भी होता है । इसी लिये क्षेत्र के ज्ञाता इसको क्षेत्र कहा करते हैं ।५९। महत् तत्त्व से आरम्भ करके अर्थात् महत् तत्त्व जिसमें आदि है और विशेष के अन्त पर्यन्त में एक परम विल- क्षण विरूपता रहा करती है । वह विकार का लक्षण है किन्तु वह अक्षर होता है और क्षरता को प्राप्त हो जाता है ।६०। कारण यह है कि उसी अनुविकार को फिर क्षरित करता है और उसी कारण से यह क्षर—इस नाम से पुकारा जाया करता है ।६१।
संसारे नरकेभ्यश्च त्रायते पुरुषं च यत् । दुःखात्राणात्पुनश्चापि क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥६२
सुखदुःखमहंभावाद्भोज्यमित्यभिधीयते । अचेतनत्वाद्दिषयस्तद्विधर्मा विभुः स्मृतः ॥६३
न क्षीयते न क्षरति विकारप्रसृतं तु तत् । अक्षरं तेन वाप्युक्तमक्षीणत्वात्तथैव च ॥६४
यस्मात्पुर्य्यनुशेते च तस्मात्पुरुष उच्यते । पुरप्रत्ययिको यस्मात्पुरुषेत्यभिधीयते ॥६५
पुरुषं कथयस्वाथ कथितोऽज्ञैर्विभाष्यते । शुद्धो निरंजनाभासो ज्ञाता ज्ञानविवर्जितः ॥६६
अस्तिनास्तीति सोऽन्यो वा बद्धो मुक्तो गतः स्थितः । नैर्हेतुकात्वनिर्देश्यादहस्तस्मिन्न विद्यते ॥६७
शुद्धत्वान्न तु दृश्यो वै द्रष्टृत्वात्समदर्शनः । आत्मप्रत्ययकारित्वादन्यूनं वाप्यहेतुकम् ॥६८
जो इस परमाधिक दुःखमय संसार में नरकों से पुरुष का परित्राण किया करता है और फिर भी दुःखों के त्राण से इसका नाम क्षेत्र यह कहा जाता है ।६२। इसमें सुख-दुःख और अहंभाव विद्यमान रहता है अतएव इसको भोज्य—इस नाम से भी पुकारा जाया करता है । इसमें अचेतना होती है इसीलिए यह विषय है और उससे विधर्मा होता है अतएव यह न तो क्षीण होता है और न इसका क्षरण ही होता है और विकार से प्रसूत