संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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के द्वारा उस प्रकार से आत्मा को दिया करता है। वहाँ पर प्रकृति में कारण में अपनी आत्मा में ही उपस्थित होता है ।१०१। अस्ति—नास्ति—इससे वह अन्य है अथवा यहाँ पर अथवा परलोक में फिर होता है। एकत्व है अथवा पृथक्त्व है—क्षेत्रज्ञ है अथवा पुरुष है ।१०२। वह आत्मा है या निरात्मा है। चेतन है या अचेतन है। वह कर्त्ता है या अकर्त्ता है—वह भोक्ता है या भोज्य ही है ।१०३। जहाँ पर पहुँच कर फिर वहाँ से वापिस नहीं लौटता है क्षेत्रज्ञ निरञ्जन है। उसका कोई भी आख्यान नहीं होता है इसलिये वह अवाच्य है ओर वाद के हेतुओं के द्वारा अग्राह्य है ।१०४। चिन्तन न करने के योग्य होने से वह प्रतर्क के योग्य नहीं है। अवार्य योग्य नहीं है और मन के साथ भी अप्राप्त है ।१०५।
क्षेत्रज्ञे निर्गुणे शुद्धे शान्ते क्षीणे निरंजने । व्यपेतसुखदुःखे च निरुद्धे शान्तिमागते ॥१०६ निरात्मके पुनस्तस्मिन्वाच्यावाच्यं न विद्यते । एतौ संहारविस्तारौ व्यक्ताव्यक्तौ ततः पुनः ॥१०७ सृज्यते ग्रसते चैव व्यक्तौ पर्यवतिष्ठते । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सर्वं पुनः सर्गे प्रवर्त्तते ॥१०८ अधिष्ठानं प्रपद्येत तस्यान्ते बुद्धिपूर्वकम् । साधर्म्यवैधर्म्यकृतः संयोगो विदितस्तयोः । अनादिमांश्च संयोगो महापुरुषजः स्मृतः ॥१०९ यावच्च सर्गंप्रति सर्गकालस्तावज्जगत्तिष्ठति संनिरुध्य । पूर्वं हि तस्यैव च बुद्धिपूर्वं प्रवर्त्तते तत्पुरुषार्थमेव ॥११० एषा निसर्गप्रतिसर्गपूर्वा प्राधानिकी चेश्वरकारिता वा । अनाद्यनंता ह्यभिमानपूर्वकं वित्रासयन्ती जगदभ्युपैति ॥१११ इत्येष प्राकृतः सर्गस्तृतीयो हेतुलक्षणः । उक्तो ह्यस्मिंस्तदात्यंतं कालं ज्ञात्वा प्रमुच्यते ॥११२ इत्येष प्रतिसर्गो वस्त्रिविधः कीर्त्तितो मया । विस्तरेणानुपूर्व्या च भूयः किं वर्त्तयाम्यहम् ॥११३