भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

के द्वारा उस प्रकार से आत्मा को दिया करता है। वहाँ पर प्रकृति में कारण में अपनी आत्मा में ही उपस्थित होता है ।१०१। अस्ति—नास्ति—इससे वह अन्य है अथवा यहाँ पर अथवा परलोक में फिर होता है। एकत्व है अथवा पृथक्त्व है—क्षेत्रज्ञ है अथवा पुरुष है ।१०२। वह आत्मा है या निरात्मा है। चेतन है या अचेतन है। वह कर्त्ता है या अकर्त्ता है—वह भोक्ता है या भोज्य ही है ।१०३। जहाँ पर पहुँच कर फिर वहाँ से वापिस नहीं लौटता है क्षेत्रज्ञ निरञ्जन है। उसका कोई भी आख्यान नहीं होता है इसलिये वह अवाच्य है ओर वाद के हेतुओं के द्वारा अग्राह्य है ।१०४। चिन्तन न करने के योग्य होने से वह प्रतर्क के योग्य नहीं है। अवार्य योग्य नहीं है और मन के साथ भी अप्राप्त है ।१०५।

क्षेत्रज्ञे निर्गुणे शुद्धे शान्ते क्षीणे निरंजने । व्यपेतसुखदुःखे च निरुद्धे शान्तिमागते ॥१०६ निरात्मके पुनस्तस्मिन्वाच्यावाच्यं न विद्यते । एतौ संहारविस्तारौ व्यक्ताव्यक्तौ ततः पुनः ॥१०७ सृज्यते ग्रसते चैव व्यक्तौ पर्यवतिष्ठते । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सर्वं पुनः सर्गे प्रवर्त्तते ॥१०८ अधिष्ठानं प्रपद्येत तस्यान्ते बुद्धिपूर्वकम् । साधर्म्यवैधर्म्यकृतः संयोगो विदितस्तयोः । अनादिमांश्च संयोगो महापुरुषजः स्मृतः ॥१०९ यावच्च सर्गंप्रति सर्गकालस्तावज्जगत्तिष्ठति संनिरुध्य । पूर्वं हि तस्यैव च बुद्धिपूर्वं प्रवर्त्तते तत्पुरुषार्थमेव ॥११० एषा निसर्गप्रतिसर्गपूर्वा प्राधानिकी चेश्वरकारिता वा । अनाद्यनंता ह्यभिमानपूर्वकं वित्रासयन्ती जगदभ्युपैति ॥१११ इत्येष प्राकृतः सर्गस्तृतीयो हेतुलक्षणः । उक्तो ह्यस्मिंस्तदात्यंतं कालं ज्ञात्वा प्रमुच्यते ॥११२ इत्येष प्रतिसर्गो वस्त्रिविधः कीर्त्तितो मया । विस्तरेणानुपूर्व्या च भूयः किं वर्त्तयाम्यहम् ॥११३

ब्रह्माण्डवर्ते वर्णन ] ,। १२७

क्षेत्रज्ञ के निर्गुण-शुद्ध-शान्त-क्षीण-निरञ्जन-अपेत अर्थात् रहित सुख दुःख वाले-निरुद्ध और शान्ति को प्राप्त होने वाले और निरात्मक होने पर फिर उसमें वाच्य और अवाच्य नहीं रहता है। ये दो संहार और विस्तार और फिर व्यक्त और अव्यक्त होते हैं ।१०६-१०७। सृजन किया जाता है ग्रसन होता है और व्यक्त पर्यवस्थित होते हैं। सब क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित फिर सर्ग में प्रवृत्त हुआ करता है ।१०८। उसके अन्त में बुद्धि पूर्वक अधिष्ठान को प्रपन्न हो जाता है। उन दोनों का संयोग साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा किया हुआ विदित होता है। महापुरुष से समुत्पन्न संयोग अनादिमान् कहा गया है ।१०९। और जबतक सर्ग और प्रतिसर्ग काल होता है तब तक जगत संनिरुद्ध होकर स्थित रहा करता है और उसके पूर्व में ही बुद्धिपूर्वक उसका पुरुषार्थ ही प्रवृत्त होता है ।११०। यह विसर्ग और प्रतिसर्ग पूर्व वाली प्राधानिकी अर्थात् प्रधान (प्रकृति) के द्वारा की हुई या ईश्वर की कराई हुई है। यह ऐसी है जिसका न आदि है और न अन्त ही है और यह अभिमान के साथ इस जगत को निग्रस्त करती हुई ही प्राप्त हुआ करती है ।१११। यही प्राकृत तीसरा सर्ग है जो हेतु के लक्षण वाला है। जो इसमें कहा गया है तब अत्यन्त काल का ज्ञान प्राप्त करके ही प्राणी प्रसक्त हुआ करता है ।११२। यही प्रतिसर्ग है जो तीन प्रकार का होता है जिसका वर्णन मैंने आपके सामने किया है। मैंने इसका विस्तार से और आनुपूर्वी से अर्थात् क्रम से आदि से अन्त पर्यन्त कह दिया है। अब फिर मैं क्या बताऊँ—यह बतलाइये ।११३।

—x—

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन

ऋषय ऊचुः-
श्रुतं सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
प्रजानां मनुभिः सार्द्धं देवानाम्ऋषिभिः सह ॥१
पितृगन्धर्वभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् ।
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणामेव पक्षिणाम् ॥२
अप्यद्भुतानि कर्माणि विविधा धर्मनिश्चयाः ।
विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम् ॥३

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १२६

पूर्ववत्स तु विज्ञेयः समासात्तन्निबोधत ।
दृष्टेनैवानुमेयं च तर्कं वक्ष्यामि युक्तितः ॥१०
यस्माद्वाचो निवर्त्तन्ते त्वप्राप्य मनसा सह ।
अव्यक्तवत्परोक्षत्वाद़गहनं तद्दुरासदम् ॥११
विकारैः प्रतिसंसृष्टो गुणः साम्येन वर्त्तते ।
प्रधानं पुरुषाणां च साधर्म्येणैव तिष्ठति ॥१२
धर्माधमौ प्रलीयेते ह्यव्यक्ते प्राणिनां सदा ।
सत्वमात्रात्मको धर्मो गुणे सत्वे प्रतिष्ठितः ॥१३
तमोमात्रात्मको धर्मो गुणे तमसि तिष्ठति ।
अविभागेन तावेतो गुणसाम्ये स्थितावुभौ ॥१४

इस सर्ग की प्रवृत्ति होने की क्या रीति होती है—यही अब हम पूछते हैं उसको आप कृपा करके हमको बतला दीजिए इस तरह से जब लोमहर्षण सूतजी से पूछा गया था तो फिर उन्होंने पुनः उस सर्ग की जैसे प्रकृति हुआ करती है उसकी व्याख्या करने का उपक्रम किया था और उन्होंने कहा था कि यहाँ पर जैसे यह सर्ग प्रवृत्त होगा—उसको मैं आप लोगों को बतलाऊँगा ।८-६। हे वत्स ! यह सब पूर्व की ही भाँति समझ लेना चाहिए । और संक्षेप से अब भी समझ लो । जो भी दृष्ट है उसी से अनुमान कर लेना चाहिए । मैं युक्ति से तर्क बतलाऊँगा ।१०। वह ऐसा विषय है जहाँ पर वाणी की पहुँच नहीं हैं और मन भी वहाँ तक नहीं पहुँचता है । वह अव्यक्त के ही समान परोक्ष है अतएव बहुत ही गहन और दुरासद है ।११। विकारों के साथ प्रति संसृष्ट होता हुआ गुण समता से रहता है । प्रधान पुरुषों के साधर्म्य से ही स्थित रहा करता है ।१२। प्राणियों के सदा धर्म और अधर्म अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं । उस समय में सत्व मात्रात्मक अर्थात् केवल सत्व स्वरूप वाला धर्म सत्वगुण में प्रतिष्ठित होता है ।१३। तमो मात्रात्मक धर्म तमोगुण में प्रतिष्ठित होता है । ये दोनों ही बिना ही विभाग के गुणों की समता में स्थित रहते हैं ।१४।

सर्वं कार्यं बुद्धिपूर्वं प्रधानस्य प्रपत्स्यते ।
अबुद्धिपूर्वं क्षेत्रज्ञ अधिष्ठास्यति तान्गुणान् ॥१५

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्कथ्यमानमस्माकं भवता श्लक्ष्णया गिरा । मनः कर्णसुखं सूते प्रीणात्यमृतसन्निभम् ॥४ एवमाराध्य ते सूतं सत्कृत्य च महर्षयः । पप्रच्छुः सत्त्रिणः सर्वे पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् ॥५ कथं सूत महाप्राज्ञ पुनः सर्गः प्रपत्स्यते । बन्धेषु संप्रलीनेषु गुणसाम्ये तमोमये ॥६ विकारेष्वविसृष्टेषु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते । अप्रवृत्ते ब्रह्मणा तु सहसा योज्यगैस्तदा ॥७

ऋषियों ने कहा—आपके द्वारा वर्णित यह महान आख्यान हमने सुन लिया है। इसमें मनुओं के साथ प्रजाओं का तथा ऋषियों के सहित देवों का—पितरों का—गन्धर्वों का—भूतों का—पिशाच—उरग और राक्षसों का—दैत्यों का—दानवों का—यक्षों का और पक्षियों का वर्णन है। इन सबके अत्यन्त अद्भुत कर्म हैं तथा धर्म आदि का भी निश्चय है और बहुत ही विचित्र कथा के योग हैं और अत्युत्तम तथा श्रेष्ठजन्म हैं। यह सभी का हमने भली श्रवण कर लिया है ।१-३। आपने जो भी वर्णन किया है वह बहुत ही श्रुति प्रिय सुन्दर वाणी के द्वारा किया है और हमारे मन और कानों को सुख देने वाला है तथा अमृत के ही समान प्रीणन करने वाला है ।४। उन सब महर्षियों ने सूतजी की इस रीति से आराधना करके उनका बड़ा ही सत्कार किया था। फिर उन सत्र करने वालों ने सबने पुनः सर्ग के प्रवर्त्तन के विषय में उनसे प्रश्न किया था ।५। उन्होंने कहा था—हे सूतजी ! आप तो महान् पण्डित हैं। अब हमको यही बतलाइये कि फिर इस सर्ग का प्रवर्त्तन किस प्रकार से होगा। जब ये सभी बन्धन प्रलीन हो जाते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों में साम्यावस्था होती है और यह सर्वत्र अन्धकार से परिपूर्ण होता है। समस्त विकार अविसृष्ट होते हैं तथा अव्यक्त आत्मा में स्थित होता है। उस समय में योज्यगों के द्वारा सहसा ब्रह्माजी के अप्रवृत्त होने पर यह सर्ग कैसे होता है ।६-७।

कथं प्रपत्स्यते सर्गस्तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम् । एवमुक्तस्ततः सूतस्तदाऽसौ लोमहर्षणः ॥८ व्याख्यातुमुपचक्राम पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् । अत्र वो वर्त्तयिष्यामि यथा सर्ग प्रपत्स्यते ॥६

१३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एवं तानभिमानेन प्रपत्स्यति पुनस्तदा । यदा प्रवर्त्तितव्यं तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१६ भोज्यभोक्तृत्वसंबंधाः प्रपत्स्यंते च तावुभौ । तस्मादक्षरमव्यक्तं साम्ये स्थित्वा गुणात्मकम् ॥१७ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं तत्र वैषम्यं भजते तु तत् । ततः प्रपत्स्यते व्यक्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१८ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सत्त्वं विकारं जनयिष्यति । महदाद्यं विशेषांतं चतुर्विंशगुणात्मकम् ॥१६ क्षेत्रज्ञस्य प्रधानस्य पुरुषस्य प्रवर्त्स्यतः । आदिदेवः प्रधानस्यानुग्रहाय प्रचक्षते ॥२० अनाद्यौ बपमुत्पादौ उभौ सूक्ष्मौ तु तौ स्मृतौ । अनादिसंयोगयुक्तौ सर्वं क्षेत्रज्ञमेव च ॥२१

यह सभी कार्य बुद्धिपूर्वक प्रधान का ही होगा। यह क्षेत्रज्ञ अबुद्धिपूर्वक उन गुणों में अधिष्ठित होगा ।१५। इस प्रकार से उस समय में फिर अभिमान के साथ उनको प्राप्त होगा । जिस समय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दोनों का प्रवृत्त होना चाहिए ।१६। वे दोनों ही को भोज्य और भोक्तृत्व के सम्बन्ध प्राप्त होंगे । इससे गुणात्मक अक्षर अव्यक्त समता में स्थित होता है ।१७। वहाँ पर वह क्षेत्रत्र में अधिष्ठित विषमता को प्राप्त होता है । फिर दोनों क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को व्यक्त प्राप्त होगा ।१८। क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित सत्व विकार को उत्पन्न कर देगा । वह विकार महत् तत्व से लेकर विशेष के अन्त तक चौबीस गुणों के स्वरूप वाला है ।१६। क्षेत्रज्ञ का प्रधान का और पुरुष का प्रवृत्त होंगे । जो आदि देव हैं वे प्रधान के ही ऊपर अनुग्रह करने वाले कहे जाते हैं । वे दोनों अनादि और श्रेष्ठ उत्पाद तथा सूक्ष्म कहे गये हैं ।२०-२१।

अबुद्धिपूर्वकं युक्तमशक्तौ तु वरौ तदा । अप्रत्ययममोघं च स्थितावुदकमत्स्यवत् ॥२२ प्रवृत्तपूर्वौ तौ पूर्वं पुनः सर्वं प्रपत्स्यते । अज्ञा गुणैः प्रवर्त्तन्ते रजःसत्त्वतमोऽभिधैः ॥२३

ब्रह्माण्डवर्तं वर्णन ] [ १३१

प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नो महत्वभूतादिविशेषतां च ।
विशेषतां चेंद्रियतां च याति गुणावसानौषधिभिर्मनुष्यः ॥२४
सत्याभिध्यायिनस्तस्य ध्यायिनः सन्निमित्तकम् ।
रजः सत्त्वतमौव्यक्ता विधुर्माणः परस्परम् ॥२५
आद्यंतं वै प्रपत्स्यंते क्षेत्रमज्ञाम्बु सर्वशः ।
संसिद्धकार्यकरणा उत्पद्यंतेऽभिमानिनः ॥२६
सर्वे सत्त्वाः प्रपद्यंते ह्यव्यक्तात्पूर्वमेव च ।
प्राक्सृतौ ये त्वसुवहाः साधकाश्चाप्यसाधकाः ॥२७
असंशांतास्तु ते सर्वे स्थानप्रकरणैः सह ।
कार्याणि प्रतित्स्यंते उत्पत्स्यन्ते पुनः पुनः ॥२८

उस समय में अबुद्धि पूर्वक युक्त है और अशक्त पर हैं यह प्रत्यय रहित और अमोघ हैं और जल में मछली के ही समान स्थित हैं ।२२। पूर्व में वे दोनों ही पूर्व की प्रवृत्ति वाले हैं फिर सर्व को प्राप्त हो जायगा । जो अज्ञ हैं वे रज-सत्व और तम नामों वाले गुणों से प्रवृत्त हुआ करते हैं ।२३। यह मनुष्य प्रवृत्ति के समय से रजोगुण से अभिपन्न होता है और महत्वभूत आदि की विशेषता और इन्द्रियतता की विशेषता को गुणामुखी के और निमित्तों के साथ ध्यायी के ये रज-सत्व और तम पर स्वर में विधर्मी होते हुए व्यक्त होते हैं ।२४-२५। आद्यन्त सभी ओर अज्ञाम्बु क्षेत्र में प्राप्त हो जायँगे । फिर संसिद्ध कार्य और करण वाले अभिमानी उत्पन्न हुआ करते हैं ।२६। सभी सत्व अव्यक्त से पूर्व ही प्रसन्न होते हैं । पूर्व में होने वाली सृत्ति में जो भी प्राणधारी हैं वे चाहे साधक होवे या असाधक होवे ।२७। वे सभी स्थान प्रकरणों के साथ असंशान्त हैं । वे सब कार्यों को प्राप्त करेंगे और बार-बार उत्पन्न होंगे ।२८।

गुणमात्रात्मकावेव धर्माधमौ परस्परम् ।
आरप्सेते हि चान्योन्यं वरेणानुग्रहेण वा ॥२९
शवस्तुल्यप्रसृष्टश्च सर्गादौ याति विक्रियाम् ।
गुणास्तं प्रतिधीर्यते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३०

१३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गुणास्ते यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।
तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥३१
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३२
महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्त्तिषु ।
विप्रयोगश्च भूतानां गुणेभ्यः संप्रवर्त्तते ॥३३
इत्येष वो मया ख्यातः पुनः सर्गः समासतः ।
समासादेव वक्ष्यामि ब्रह्मणोऽथ समुद्भवम् ॥३४
अव्यक्तात्कारणात्तस्मान्नित्यात्सदसदात्मकात् ।
प्रधानपुरुषाभ्यां तु जायते च महेश्वरः ॥३५

धर्म और अधर्म परस्पर में केवल गुण के ही स्वरूप वाले होते हैं और वे एक दूसरे के वर के द्वारा या अनुग्रह के द्वारा आरम्भ हुआ करते हैं ।२६। इसके उपरान्त तुल्य प्रसूष्टि शव सर्ग के आदि काल में विक्रिया को प्राप्त होता है । गुण इस कारण से उसका प्रतिधान किया करते हैं वह उसको अच्छा लगता है ।३०। वे गुण जो भी कर्म कर्म पूर्व की सृष्टि में प्रतिपन्न हुए थे वे ही बार-बार सृज्यमान होते हुए प्रतिपन्न हुआ करते हैं ।३१। हिंस्र-अहिंस्र, मृदु-क्रूर, धर्म-अधर्म, ऋत-अनृत ये सब जो भी जिसको प्रिय लगता है उसी भाव से भावित होते हुए प्रसन्न हुआ करते हैं ।३२। महाभूतों में अनेक रूपता-इन्द्रियों के विषयों में तथा मूर्त्तियों में अनेक रूपता-इन्द्रियों के विषयों में तथा मूर्त्तियों में अनेकता होती है और प्राणियों के विप्रयोग गुणों से ही प्रवृत्त हुआ करते हैं ।३३। मैंने यह सर्ग आपको बहुत ही संक्षेप से बता दिया है । अब ब्रह्माजी का उद्भव भी मैं बहुत संक्षेप से वर्णन करूंगा ।३४। उसी अव्यक्त कारण से जो सत् और असत् स्वरूप वाला है । प्रधान से और पुरुष से महेश्वर जन्म ग्रहण किया करते हैं ।३५।

स पुनः संभावयिता जायते ब्रह्मसंज्ञितः ।
सृजते स पुनर्लोकानभिमानगुणात्मकान् ॥३६
अहंकारस्तु महतस्तस्माद्भूतानि चात्मनः ।

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १३३

युगपत्संप्रवर्त्तन्ते भूतान्येवेंद्रियाणि च ॥३७
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः प्रवर्त्तते ।
विस्तरावयबस्तेषां यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्तितो वा यथापूर्वं तथैवाप्युपधार्यताम् ॥३८
एतच्छ्रुत्वा नैमिषेयास्तदानीं लोकोत्पत्ति सुस्थितिं
चाप्ययं च ।
तस्मिन्सत्रेऽवभृथं प्राप्य शुद्धाः पुण्यं लोकमृषयः
प्राप्नुवंति ॥३९
यथा यूयं विधिना देवतादीनिष्ट्वा चैवावभृथं प्राप्य शुद्धाः ।
त्यक्त्वा देहानायुषोऽन्ते कृतार्थाः पुण्यं लोकं प्राप्य
मोदध्वमेवम् ॥४०
एते ते नैमिषेया वै दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च वै तदा ।
जग्मुश्चावभृथस्नाताः स्वर्गं सर्वे तु सत्त्रिणः ॥४१
विप्रास्तथा यूयमपि इष्ट्वा बहुविधैर्मखैः ।
आयुषोऽन्ते ततः स्वर्गं गंतारः स्थ द्विजोत्तमाः ॥४२

वे ही फिर सम्मान करने वाला ब्रह्म के नाम वाले हो जाते हैं । और फिर यही ब्रह्माजी अभिमान और गुणात्मक लोकों का सृजन करते हैं ।३६। महत् तत्व से अहंकार की उत्पत्ति होती है और फिर अहंकार से भूतों का उद्भव हुआ करता है । ये भूत और इन्द्रियां एक ही साथ सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।३७। इन भूतों से अन्य भूतों के भेद होते हैं—इस तरह से सर्ग प्रवृत्त हुआ करता है । उनका विस्तार और अवयव जैसी प्रज्ञा है और जैसा भी सुना है मैंने आपको पूर्व में बता दिया है उसी प्रकार से इनका अवधारण आप कर लीजिये ।३८। इसको नैमिष क्षेत्र में रहने वालों ने श्रवण करके जो उस समय में लोकों की उत्पत्ति और संहार कहा गया था उस सबमें अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए ऋषिगण—पुण्य लोक को प्राप्त हो जाते हैं ।३९। जिस रीति से आप लोग विधि पूर्वक यजन करके और देव आदि का अर्चन करके तथा अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए हो । फिर आयु के समाप्त होने पर शरीरों का त्याग करके कृतार्थ हुई हैं और

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परम पुण्यलोक को प्राप्त करके इस प्रकार से आनन्दित हो रहे हैं ।४०। ये वे भी नैमिषेय अर्थात् नैमिष क्षेत्र में रहने वाले सभी देखकर को और स्पर्श करके उस समय में अवभृथ स्नान किये हुए सबके सब स्वर्गलोक को गमन कर गये थे ।४१। हे विप्रो ! उसी प्रकार से आप लोगों ने भी बहुत प्रकार के यज्ञों के द्वारा यजन किया है। हे उत्तम द्विजगणो ! फिर जब आपकी आयु का अवसान होगा तब आप भी सब स्वर्ग में गमन कर जांयगे ।४२।

प्रक्रिया प्रथमः पादः कथायास्तु परिग्रहः । अनुषंग उपोद्घात उपसंहार एव च ॥४३ एवमेव चतुः पादं पुराणं लोकसम्मतम् । उवाच भगवात्साक्षाद्वायुर्लोकहिते रतः ॥४४ नैमिषे सत्रमासाद्य मुनिभ्यो मुनिसत्तम । तत्प्रसादं च संसिद्धं भूतोत्पत्तिलयान्वितम् ॥४५ प्राधानिकीमिमां सृष्टिं तथैवेश्वरकारिताम् । सम्यग्विदित्वा मेधावी न मोहमधिगच्छति ॥४६ इदं यो ब्राह्मणो विद्वानितिहासं पुरातनम् । शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि तथाऽध्यापयतेऽपि च ॥४७ स्थानेषु स महैंद्रस्य मोदते शाश्वतीः समाः । ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा ब्रह्मणा सह मोदते ॥४८ तेषां कीर्तिमतां कीर्ति प्रजेशानां महात्मनाम् । प्रथयन्पृथिवीशानां ब्रह्मभूयाय गच्छति ॥४९

इस महा पुराण में चार पाद हैं—सर्व प्रथम प्रक्रिया है जो कि प्रथम पाद है—फिर कथा का परिग्रह है । फिर अनुष्वंग है और अन्त में उपो- द्घात तथा उपसंहार है ।४३। इसी रीति से चार पादों वाला यह पुराण लोक सम्मत है । इस पुराण को लोकों के हित में रति रखने वाले भगवान् वायु देव ने ही साक्षात् रूप से इसको कहा है ।४४। हे श्रेष्ठतम मुने ! नैमिष क्षेत्र में एक सत्र (यज्ञ) को प्राप्त करके मुनिगण एकत्रित हुए थे तभी उनसे कहा उसका प्रसाद संसिद्ध हो गया जो भूतों की उत्पत्ति और तप से संयुत है ।४५। इस प्राधिनिकी अर्थात् प्रधान के द्वारा की हुई तथा ईश्वर के द्वारा

ब्रह्माण्डवतं वर्णन ] [ १३५

करायी हुई सृष्टि को भली भाँति जानकर मेधावी पुरुष कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता है ।४६। जो भी कोई विद्वान विप्र इस ब्रह्माजी के परम पुरातन इतिहास का श्रवण करता है अथवा श्रवण कराता है और इसका ध्यान भी करता है वह महेन्द्र देव के स्थानों में अनन्त वर्षों पर्यन्त आनन्द प्राप्त किया करता है और ब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त करके ब्रह्म के साथ आनन्दित होता है ।४७-४८। उन प्रजाओं के स्वामी महात्माओं तथा कीर्त्ति-मानों की कीर्त्ति को जो कि इस पृथिवी के ईश हैं संसार में प्रथित करके ब्रह्म के ही समान हो जाता है ।४६।

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च संमितम् ।
कृष्णद्वैपायनेनोक्तं पुराणं ब्रह्मवादिना ॥५०
मन्वन्तरेश्वराणां च यः कीर्त्ति प्रथयेदिमाम् ।
देवतानामृषीणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥५१
स सर्वैर्मुच्यते पापै पुण्यं च महदाप्नुयात् ।
यश्चेदं श्रावयेद्विद्वान्सदा पर्वणि पर्वणि ॥५२
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
अक्षयं सर्वकामीयं पितृ स्तञ्चोपतिष्ठते ।
यस्मात्पुरा ह्यणंतीदं पुराणं तेन चोच्यते ॥५४
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
तथैव त्रिषु वर्णेषु ये मनुष्या अधीयते ॥५५
इतिहासमिमं श्रुत्वा धर्माय विदधे मतिम् ।
यावंत्यस्य शरीरेषु रोमकूपानि सर्वशः ॥५६

यह पुराण परम धन्य है—यश की वृद्धि करने वाला है—आयु के बढ़ाने वाला—परम स्मरूप और वेदों की समानता रखने वाला है । यह पुराण ब्रह्मवादी श्रीकृष्ण द्वैपायन ने ही कहा है ।५६। जो मनुष्य इस मन्वन्तरों की कीर्त्ति को प्रथित करता है तथा देवों की और भूरि द्रविण तेज वाले ऋषियों की कीर्त्ति को फैलाता है वह सभी प्रकार के पापों से छूट जाता है और महान पुण्य का लाभ प्राप्त किया करता है और जो विद्वान प्रत्येक पर्व पर इसका श्रवण कराता है और इस अन्तिम पाद को श्राद्ध में ब्राह्मणों को सुनाता है वह अक्षय और सर्वकामनाओं की पूर्ति करने वाला

१३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पितृगणों के समीप में उपस्थित होता है । कारण यही है कि पहिले यह उसी के द्वारा कहा जाता है ।५१-५४। जो पुरुष इसकी निरुक्ति को जानता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है । उसी भाँति तीनों वर्षों में जो मनुष्य इसको पढ़ते हैं इस इतिहास का श्रवण करके धर्म की बुद्धि हो जाती है और शरीर में जितने भी करोड़ रोमों के छिद्र हैं उतने ही वर्ष वह स्वर्ग में निवास करता है ।५५-५६।

तावत्कोटिसहस्राणि वर्षाणि दिवि मोदते ।
ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा दैवतैः सह मोदते ॥५७
सर्वपापहरं पुण्यं पवित्रं च यशस्वि च ।
ब्रह्मा ददौ शास्त्रमिदं पुराणं मातरिश्वने ॥५८
तस्माच्चोशनसा प्राप्तं तस्माच्चापि बृहस्पतिः ।
बृहस्पतिस्तु प्रोवाच सवित्रे तदनंतरम् ॥५९
सविता मृत्यवे प्राह मृत्युश्चेंद्राय वै पुनः ।
इन्द्रश्चापि वसिष्ठाय सोऽपि सारस्वताय च ॥६०
सारस्वतस्त्रिधाम्नेऽथ त्रिधामा च शरद्वते ।
शरद्वांस्तु त्रिविष्टाय सोऽंतरिक्षाय दत्तवान् ॥६१
चर्षिणे चांतरिक्षो वै सोऽपि त्रय्यारुणाय च ।
त्रय्यारुणाद्धनंजयः स वै प्रादात्कृतंजये ॥६२
कृतंजयात्तृणंजयो भरद्वाजाय सोऽप्यथ ।
गौतमाय भरद्वाजः सोऽपि निर्य्यंतरे पुनः ॥६३

शरीर में स्थित रोम कूपों के समान उतने ही सहस्र वर्षों तक स्वर्ग में आनन्द प्राप्त किया करता है । फिर ब्रह्मा के सायुज्य में गमन करने वाला होकर देवों के साथ में परमानन्दित हुआ करता है ।५७। यह महापुराण सभी पापों के हरण करने वाला—पुण्य स्वरूप—पवित्र और यश वाला है । ब्रह्माजी ने ही इस शास्त्र पुराण को वायु देव के लिये दिया था ।५८। उस वासुदेव से इसकी प्राप्ति उशना ने की थी । उशना से देव गुरु बृहस्पति

ब्रह्माणवतं वर्णन ] [ १३७

जी ने प्राप्त किया था । बृहस्पति ने फिर सविता को बताया था ।५६। सविता ने मृत्यु को दिया था और मृत्यु ने फिर इन्द्र को दिया था । इन्द्र ने वसिष्ठ मुनि को बताया था और वसिष्ठजी सारस्वत को दिया था ।५९-६०। सारस्वत ने त्रिधामा को दिया था और त्रिधामा ने शरद्वान् को दिया था । शरद्वान् ने त्रिविष्ट को दिया और उसने अन्तरिक्ष को दिया था ।६१। अन्तरिक्ष ने चर्ची को बतलाया और उसने त्रय्यारुण को दिया था । त्रय्यारुण ने धनञ्जय को दिया था उसने कृतञ्जय को दिया था ।६२। कृतञ्जय से तृणञ्जय को मिला था और इससे भरद्वाज को प्राप्त हुआ था । भरद्वाज ने गौतम को दिया था ओर उसने फिर नियंन्तर को दिया था ।६३।

नियन्तरस्तु प्रोवाच तथा वाजश्रवाय वै ।
स ददौ सोमशुष्माय स चादात्तृणबिन्दवे ॥६४
तृणबिन्दुस्तु दक्षाय दक्षः प्रोवाच शक्तये ।
शक्तेः पराशरश्चापि गर्भस्थः श्रुतवानिदम् ॥६५
पराशराज्जातुकर्ण्यस्तस्माद्द्वैपायनः प्रभुः ।
द्वैपायनात्पुनश्चापि मया प्राप्तं द्विजोत्तम ॥६६
मया चैतत्पुनः प्रोक्तं पुत्रायामितबुद्धये ।
इत्येव वाक्यं ब्रह्मादिकगुरूणां समुदाहृतम् ॥६७
नमस्कार्याश्च गुरवः प्रयत्नेन मनीषिभिः ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं सर्वार्थसाधकम् ॥६८
पापघ्नं नियमेनेदं श्रोतव्यं ब्राह्मणैः सदा ।
नाशुचौ नापि पापाय नाप्यसंवत्सरोषिते ॥६९
नाश्रद्दधानेऽविदुषे नापुत्राय कथंचन ।
नाहिताय प्रदातव्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥७०

नियन्तर ने वाजश्रव को यह बताया था ओर उसने सोम शुष्म को दिया था फिर उसने तृण बिन्दु के लिए दिया था ।६४। तृण बिन्दु ने दक्ष को दिया था ओर उसने फिर शक्ति को बताया था । शक्ति से गर्भ में ही स्थित पराशर मुनि ने इसका श्रवण किया था ।६५। पराशर से जातुकर्ण्य ने प्राप्त किया था फिर उससे प्रभु द्वैपायन ने प्राप्त किया था । हे द्विजोत्तम !

१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वैपायन मुनि से इस महापुराण को मैंने प्राप्त किया था। ६६। फिर मैंने अमित बुद्धि पुत्र को दिया था। यह इतना वाक्य ब्रह्मा से आदि लेकर गुरु वर्गों का मैंने बता दिया है । ६७। मनीषियों को प्रयत्न से इन गुरु वर्गों के लिए नमस्कार करना चाहिए। यह पुराण यशस्य—आयुष्य—पुण्य और सब अर्थों का साधक है । ६८। यह पापों के हनन करने वाला है। ब्राह्मणों को सदा ही इसका श्रवण करना चाहिए। इस पुराण को जो अशुचि हो—पापी हो तथा जो एक वर्ष से भी कम वास करने वाला हो उसको नहीं बताना चाहिए । ६९। जिसमें इसके प्रति श्रद्धा न हो उसको—अविद्वान् को और पुत्रहीन को भी कभी नहीं बताना चाहिए। यह परम पवित्र तथा उत्तम है अतः जो अपना हित न हो उसको भी नहीं देना चाहिए । ७०।

अव्यक्तं वै यस्य योनिं वदंति व्यक्तं देहं कालमेतं गतिं च । वह्निर्वक्त्रं चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे दिशः श्रोत्रे घ्राणमाहुश्च वायुम् ॥७१

वाचो वेदा अंतरिक्षं शरीरं क्षितिः पादास्तारका रोमकूपाः। सर्वाणि द्यौर्मस्तकानि त्वथो वै विद्याश्चैवोपनिषदद्यस्य पुच्छम् ॥७२

तं देवदेवं जननं जनानां यज्ञात्मकं सत्यलोकप्रतिष्ठम् । वरं वराणां वरदं महेश्वरं ब्रह्माणमादिं प्रयतो नमस्ये ॥७३

जिसकी योनि अव्यक्त है—व्यक्त जिसका देह है—यह काल ही गति है—अग्नि मुख हैं—चन्द्र और सूर्य ही नेत्र हैं—दिशायें जिसके श्रोत्र हैं और वायु घ्राण है ।७१। वाणी जिसकी वेद हैं—अन्तरिक्ष ही शरीर है—क्षितिहो पाद हैं—तारे रोम कय हैं—द्यौ मस्तक है—विद्या अधोभाग है और उपनिषद् जिसकी कूप है ।७२। उस देवों के भी देव को और जनों के जन्म स्थल को—यज्ञ स्वरूप तथा सत्यलोक में प्रतिष्ठित को—वरों के देने वालों के श्रेष्ठ वर को आदि महेश्वर ब्रह्माजी को प्रणत होकर नमस्कार करता हूँ ।७३।

अगस्त्य यात्राजनार्दन आविर्भाव ] [ १३६

अगस्त्य यात्रा जनार्दन आविर्भाव

श्रीगणेशाय नमः— अथ श्रीललितोपाख्यान प्रारभ्यते । चतुर्भुंजे चन्द्रकलावर्तंसे कुचोन्नने कुङ्कुमरागशोणे । पुण्ड्रेक्षुपाशांकुशपुष्पवाणहस्ते नमस्ते जगदेकमातः ॥१ अस्तु नः श्रेयसे नित्यं वस्तु वामाङ्गसुन्दरम् । यतस्तृतीयो विदुषां तृतीयस्तु परं महः ॥२ अगस्त्यो नाम देवर्षिर्वेदवेदाङ्गपारगः । सर्वसिद्धान्तसारज्ञो ब्रह्मानन्दरसात्मकः ॥३ चचाराद्भुतहेतूनि तीर्थान्यायतननि च । शैलारण्यापगामुख्यान्सर्वाञ्जनपदानपि ॥४ तेषु तेष्वखिलाञ्जंतूनज्ञानतिमिगवृतान् । शिश्नोदरपरान्दृष्ट्वा चिन्तयामास तान्प्रति ॥५ तस्य चिन्तयमानस्य चरतो वसुधामिमाम् । प्राप्तमासीन्महापुण्यं कांचीनगरमुत्तमम् ॥६ तत्र वारणशैलेन्द्रमेकाग्रनिलयं शिवम् । कामाक्षीं कलिदोषघ्नीमपूजयदथात्मवान् ॥७

हे इस जगत् की एक ही जननि ! आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित हैं । आप चार भुजाओं वाली हैं आपके मस्तक में चन्द्रमा की कला का भूषण विद्यमान है—आपके अत्यन्त उन्नत उरोज हैं-आपका वर्ण कुंकुम के राग के सदृश रक्त है—पुण्ड्र-इक्षु, पाश-अंकुश और पुष्पों का वाण आपके करों में सुशोभित है ।१। आपके वाम अङ्ग में परम सुन्दर वस्तु हमारे नित्य ही कल्याण के लिए होवे । जिससे विद्वानों में तीसरे और तृतीय परम तेज विद्यमान है ।२। वह अगस्त्य नाम वाले देवर्षि हैं जो वेदों और वेदाङ्ग शास्त्रों के पारगामी विद्वान् हैं । वे सब सिद्धान्तों के सार के ज्ञाता हैं और ब्रह्मानन्द के रस के ही स्वरूप वाले हैं ।३। अद्भुतता के हेतु स्वरूप तीर्थों का और पवित्र आयतनों का जिन्होंने सञ्चरण किया था

१४० ] [ कालिका पुराण

तथा समस्त शैल-अरण्य-नदियाँ आदि प्रमुख स्थलों का एवं जनपदों का भी जिन्होंने परिभ्रमण किया है ।४। उन-उन स्थलों में जहाँ-जहाँ पर उन्होंने परिभ्रमण किया था वहाँ पर सभी जन्तुओं को ज्ञान से शून्य तथा अत्यन्त ही अन्धकार से समन्वित एक केवल उदर पूर्ति तथा काम वासना में परायण देखा था। उन्होंने यह बुरो दशा देखकर उनके विषय में चिन्तन किया था ।५। वे इसी प्रकार से चिन्तन करते हुए संचरण कर रहे थे और इस भूमि पर विचर रहे थे कि उन्हें काञ्ची नगर मिला था जो महान् पुण्यमय और अत्युत्तम था ।६। वहाँ पर इन आत्मवान् अगस्त्यजी ने वारण शैल के स्वामी और एकाग्र ध्यान में तल्लीन भगवान् शिव का तथा कलियुग के दोषों का हनन करने वाली देवी कामाक्षी का अर्चन किया था ।७।

लोकहेतोर्दयार्द्रस्य धीममश्चिन्तनो मुहुः ।
चिरकालेन तपसा तोषितोऽभूज्जनार्दन ॥८
हयग्रीवां तनुं कृत्वा साक्षाच्चिन्मात्रविग्रहाम् ।
शङ्खचक्राक्षवलयपुस्तकोज्ज्वलबाहुकाम् ॥६
पूरयित्रीं जगत्कृत्स्नं प्रभया देहजातया ।
प्रादुर्बभूव पुरतो मुनेरमिततेजसा ॥१०
तं दृष्ट्‌वानन्दभरितः प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ।
विनयावनतो भूत्वा सन्तुष्टाव जगत्पतिम् ॥११
अथोवाच जगन्नाथस्तुष्टोऽस्मि तपसा तव ।
वरं वरय भद्रं ते भविता भूसुरोत्तम ॥१२
इति पृष्टो भगवता प्रोवाच मुनिसत्तमः ।
यदि तुष्टोऽसि भगवन्निमे पामरजन्तवः ॥१३
केनोपायेन मुक्ताः स्युरेतन्मे वक्तुमर्हसि ।
इति पृष्टो द्विजेनाथ देवदेवो जनार्दनः ॥१४

लोकों के कारण से दया से आर्द्र (पसीजे हुए हृदय वाले)—परमधीमान् और बारम्बार चिन्तन करने वाले उन अगस्त्य मुनि के अधिक समय तक किये हुए तप से भगवान् प्रसन्न हो गये थे ।८। हयग्रीव के शरीर को

५. द्वितीय खण्ड — उपसंहारपाद (प्रलय, कालमान व योगविवरण)

धारण करके साक्षात् चिद् (ज्ञान) ही के विग्रह वाली और शंख, चक्र, वलय और पुस्तक के धारण करने से समुज्ज्वल बाहुओं वाली तथा अपने देह से समुत्पन्न प्रभा से सम्पूर्ण जगत् जगत् को पूरित करने वाली अपने अपरिमित तेज से मुनि के आगे प्रादुर्भूत हुई थी ।९-१०। उनका दर्शन प्राप्त करके आनन्द से भरे हुए ऋषि ने उनको बारम्बार प्रणाम किया था और विनय से अवनत होकर जगत् के पति की भली भाँति स्तुति की थी ।११। इसके अनन्तर जगन्नाथ प्रभु ने कहा था—हे भूसुरों में श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से सन्तुष्ट हो गया हूं आप किसी भी वरदान का वरण करो। तुम्हारा कल्याण होगा ।१२। जब भगवान् के द्वारा इस रीति से पूछा गया तो श्रेष्ठ मुनि ने कहा—हे भगवन् ! यदि परम सन्तुष्ट है तो यही मुझे बतलाइए कि ये पामर जन्तुगण किस उपाय से मुक्त होगे। जब इस रीति से द्विज के द्वारा पूछा गया था तो देवों के भी देव जनार्दन ने कहा था—।१३-१४।

एष एव पुरा प्रश्नः शिवेन चरितो मम ।
अयमेव कृतः प्रश्नो ब्रह्मणा तु ततः परम् ॥१५॥
कृतो दुर्वाससा पश्चाद्भवता तु ततः परम् ॥१६॥
भवद्भिः सर्वभूतानां गुरुभूतैर्महात्मभिः ।
ममोपदेशो लोकेषु प्रथितोऽस्तु वरो मम ॥१७॥
अहमादिर्हि भूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
सृष्टिस्थितिलयानां तु सर्वेषामपि कारकः ॥१८॥
त्रिमूर्तिस्त्रिगुणातीतो गुणहीनो गुणाश्रयः ॥१९॥
इच्छाविहारो भूतात्मा प्रधानपुरुषात्मकः ।
एवं भूतस्य मे ब्रह्मंस्त्रिजगद्रूपधारिणः ॥२०॥
द्विधाकृतमभूद्रूपं प्रधानपुरुषात्मकम् ।
मम प्रधानं यद्रूपं सर्वलोकगुणात्मकम् ॥२१॥

यह ही प्रश्न बहुत पहिले शिवजी ने मुझसे किया था। इसके पीछे ऐसा ही प्रश्न ब्रह्माजी ने भी किया था ।१५। इसके अनन्तर दुर्वासा मुनि ने यह प्रश्न किया था। इसके बाद में अब आपने भी यह प्रश्न मुझ से किया

१४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

है ।१६। यह प्रश्न जो आपने किया है इसका कारण यही है कि आप महान् आत्मा वाले हैं और समस्त प्राणियों के गुरु के ही समान है । लोकों में मेरा उपदेश ही परम प्रसिद्ध वर है ।१७। मैं समस्त प्राणियों में आदि हूँ और मैं ही आदि कर्त्ता प्रभु हूँ जो स्वयं ही हुआ हूँ । इस लोक की सृष्टि-स्थिति और संहार के करने वाला भी सबका मैं ही हूँ ।१८। मैं ही तीन मूर्त्तियाँ वाला हूँ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु और महादेव-ये तीन मूर्त्तियां मेरी ही हैं जो कि मैं गुणों से पर-गुणों से रहित और गुणों का समाश्रय भी हूँ ।१९। मैं समस्त भूतों की आत्मा हूँ और मैं अपनी ही इच्छा से बिहार करने वाला हूँ । हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार के जगत् में तीन रूप धारण करने वाला हूँ ।२०। मेरा ही रूप दो प्रकार का है एक पुरुष और दूसरा प्रधान मेरा जो प्रधान नामक रूप है वह सब (सत्व-रज-तम) गुणों के ही स्वरूप वाला है ।२१।

अपरं यद्गुणातीतं परात्परतरं महत् ।
एवमेव तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते ते उभे किमु ॥२२

तपोभिश्चिरकालोत्थैर्यमैश्च नियमैरपि ।
त्यागैर्दुष्कर्मनाशांते मुक्तिराश्वेव लभ्यते ॥२३

यद्रूपं यद्गुणयुतं तद्गुणैक्येन लभ्यते ।
अन्यत्सर्वं जगद्रूपं कर्मभोगपराक्रमम् ॥२४

कर्मभिर्लभ्यते तच्च तत्त्यागेनापि लभ्यते ।
दुस्तरस्तु तयोस्त्यागः सकलैरपि तापसैः ॥२५

अनपायं च सुगमं सदसत्कर्मगोचरम् ॥२६

आत्मस्थेन गुणेनैव सतां चाप्यसतापि वा ।
आत्मैक्येनैव यज्ज्ञानं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥२७

वर्णत्रयविहीनीनां पापिष्ठानां नृणामपि ।
यद्रूपध्यानमात्रेण दुष्कृतं सुकृतायते ॥२८

दूसरा मेरा स्वरूप सब गुणों से परे है और पर से भी अधिक पर हैं तथा महान् है । इस रीति से उन दोनों के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके वे दोनों ही मुक्त हो जाते हैं ।२२। चिरकाल पर्यन्त किये हुए तप-यम और

अगस्त्य यात्रा-जनार्दन आविर्भाव ] [ १४३

नियम तथा त्याग से दुष्कर्मों के विनाश होने के अन्त में बहुत ही शीघ्र मुक्ति प्राप्ति हो जाया करती है ।२३। जो रूप जिस गुण से युक्त होता है उन गुणों की एकता से प्राप्त किया जाता है । अन्य समस्त जगत् के स्वरूप वाला है जो कर्म—भोग और पराक्रम से संयुक्त होता है ।२४। जो कर्मों के द्वारा प्राप्त किया जाता है वह कर्मों के त्याग से भी पाया जाया करता है । हे तपस्विन् ! सभी के द्वारा उन दोनों का त्याग करना बड़ा ही कठिन होता है ।२५। सत् और असत् कर्मों को प्रत्यक्ष रूप से जान लेना निर्विघ्न और सुगम होता है ।२६। आत्मा में स्थित गुण से जो सत् हो या असत् हो । आत्मा के साथ एकता से जो भी ज्ञान है वह समस्त सिद्धियों के देने वाला होता है ।२७। तीन वर्णों से जो हीन हैं और महान् पापी हैं ऐसे मनुष्यों को भी जिसके केवल ध्यान से ही दुष्कृत भी सुकृत के स्वरूप में परिणत हो जाया करता है ।२८।

येऽर्चयंति परां शक्तिं विधिनाऽविधिनापि वा । न ते संसारिणो नूनं मुक्ता एव न संशयः ॥२९ शिवो वा यां समाराध्य ध्यानयोगबलेन च । ईश्वरः सर्वसिद्धानामर्द्धनारीश्वरोऽभवत् ॥३० अन्येऽब्जप्रमुखा देवाः सिद्धास्तद्ध्यानवैभवात् । तस्मादशेषलोकानां त्रिपुराराधनं विना ॥३१ न स्तो भोगापवर्गौ तु यौगपद्येन कुत्रचित् । तन्मनास्तद्गतप्राणस्तद्याजी तद्गतेहकः ॥३२ तादात्म्येनैव कर्माणि कुर्वन्मुक्तिमवाप्स्यसि । एतद्रहस्यमाख्यातं सर्वेषां हितकाम्यया ॥३३ सन्तुष्टेनैव तपसा भवतो मुनिसत्तम । देवाश्च मुनयः सिद्धा मानुषाश्च तथापरे । त्वन्मुखांभोजतोऽवाप्य सिद्धिं यांतु परात्पराम् ॥३४ इति तस्य वचः श्रुत्वा हयग्रीवस्य शार्ङ्गिणः । प्रणिपत्य पुनर्वाक्यमुवाच मधुसूदनम् ॥३५

१४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणे

जो मानव पराशक्ति का अर्चन किया करते हैं चाहे वे विधि के साथ करें या बिना ही विधि से करें वे संसारी नहीं होते हैं अर्थात् बारम्बार जीवन—मरण की घोर यातनाएँ सहन करने वाले नहीं रहते हैं और निश्चय ही वे मुक्त हो जाया करते हैं—इसमें लेशमात्र भी जिसकी आराधना करके और ध्यान तथा योग के बल से अर्चना करके ईश्वर भी जो सभी सिद्धों के स्वामी हैं अर्धनारीश्वर हो गये थे ।२६-३०। अन्य देव भी जिनमें अब्ज प्रमुख हैं उसके ध्यान के ही वैभव से ही सिद्ध हो गये हैं । इस कारण से यह सिद्ध होता है कि समस्त लोगों को त्रिपुरदेव का ही आराधन मुख्य है । इसके बिना कुछ भी नहीं होता है ।३१। सुखों का उपभोग और मोक्ष दोनों ही एक साथ किसी भी प्रकार से नहीं प्राप्त हुआ करते हैं । उनमें ही मन के लगाने वाला—उसमें अपने प्राणों को संलग्न रखने वाला—उसका ही यजन करने वाला तथा अपनी इच्छा को उसमें ही केन्द्रित करने वाला मानव तादात्म्य भाव से अर्थात् उसमें ही सर्वतोभाव से एकता धारण करने वाला पुरुष कर्मों को करता हुआ मुक्ति को प्राप्त कर लेगा । यही रहस्य मैंने सबके हित की कामना से कह दिया है ।३२-३३। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से परम सन्तुष्ट हो गया हूँ । इसी से मैंने आपको यह बतला दिया है । देवगण—मुनिमण्डल—सिद्धसमुदाय—मनुष्य तथा दूसरे लोग आपके मुख कमल से भी पर से भी पर सिद्धि को प्राप्त कर लेवें ।३४। भगवान् हयग्रीव शाङ्ग के इस वचन का श्रवण करके अगस्त्य मुनि ने उनको प्रणिपात किया था और फिर मधुसूदन प्रभु से कहा था ।३५।

भगवन्कीदृशं रूपं भवता यत्पुरोदितम् । किंविहारं किंप्रभावमेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥३६

हयग्रीव उवाच– एषोऽशभूतो देवर्षे हयग्रीवो ममापरः । श्रोतुमिच्छसि यद्यत्त्वं तत्सर्वं वक्तुमर्हति ॥३७

इत्यादिश्य जगन्नाथो हयग्रीवं तपोधनम् । पुरतः कुम्भजातस्य मुनेरंतरधाद्धरिः ॥३८

ततस्तु विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा तपोधनः । हयग्रीवेण मुनिना स्वाश्रमं प्रत्यपद्यत ॥३६

आप मुझको बतलाइए। ३६। हयग्रीव जी ने कहा—हे देवर्षे ! यह अंशभूत मेरा अपर हयग्रीव है। आप जो-जो भी श्रवण करना चाहते हैं वही यह कहने के योग्य होता है। जगन्नाथ प्रभु इतना ही तपोधन हयग्रीव को आदेश देकर अगस्त्य मुनि के ही आगे अन्तर्हित हो गये थे। ३७-३८। इसके पश्चात् अगस्त्य मुनि बड़े ही विस्मित हुए और उनके रोम-रोम प्रसन्नता से उद्गत हो गये थे। फिर वे तप के ही मन वाले मुनि हयग्रीव मुनि के साथ अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे। ३६।

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॥ हयग्रीव अगस्त्य संवाद ॥

अथोपवेश्य चैवैनमासने परमाद्भुते ।
हयाननमुपागत्यागस्त्यो वाक्यं समब्रवीत् ॥१
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वसिद्धान्तवित्तम ।
लोकाभ्युदयहेतुर्हि दर्शनं हि भवादृशाम् ॥२
आविर्भावं महादेब्यास्तस्या रूपान्तराणि च ।
विहारांश्चैव मुख्या ये तान्नो विस्तरतो वद ॥३
हयग्रीव उवाच-
अनादिरखिलाधारा सदसत्कर्मरूपिणी ।
ध्यानैकदृश्या ध्यानांगी विद्यांगी हृदयास्पदा ॥४
आत्मैक्याद्व्यक्तिमायाति चिरानुष्ठानगौरवात् ॥५
आदौ पादुरभूच्छक्तिर्ब्रह्मणो ध्यानयोगतः ।
प्रकृतिर्नाम सा ख्याता देवानामिष्टसिद्धिदा ॥६
द्वितीयमुद्भूद्रूपं प्रवृत्तेऽमृतमंथने ।
सर्वसंमोहजनकमवाङ्मनसगोचरम् ॥७

इसके अनन्तर उनको परम अद्भुत आसन पर बिठाकर फिर हयानन के समीप में उपस्थित होकर अगस्त्य जी ने यह वाक्य कहा था।