संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १२६
पूर्ववत्स तु विज्ञेयः समासात्तन्निबोधत ।
दृष्टेनैवानुमेयं च तर्कं वक्ष्यामि युक्तितः ॥१०
यस्माद्वाचो निवर्त्तन्ते त्वप्राप्य मनसा सह ।
अव्यक्तवत्परोक्षत्वाद़गहनं तद्दुरासदम् ॥११
विकारैः प्रतिसंसृष्टो गुणः साम्येन वर्त्तते ।
प्रधानं पुरुषाणां च साधर्म्येणैव तिष्ठति ॥१२
धर्माधमौ प्रलीयेते ह्यव्यक्ते प्राणिनां सदा ।
सत्वमात्रात्मको धर्मो गुणे सत्वे प्रतिष्ठितः ॥१३
तमोमात्रात्मको धर्मो गुणे तमसि तिष्ठति ।
अविभागेन तावेतो गुणसाम्ये स्थितावुभौ ॥१४
इस सर्ग की प्रवृत्ति होने की क्या रीति होती है—यही अब हम पूछते हैं उसको आप कृपा करके हमको बतला दीजिए इस तरह से जब लोमहर्षण सूतजी से पूछा गया था तो फिर उन्होंने पुनः उस सर्ग की जैसे प्रकृति हुआ करती है उसकी व्याख्या करने का उपक्रम किया था और उन्होंने कहा था कि यहाँ पर जैसे यह सर्ग प्रवृत्त होगा—उसको मैं आप लोगों को बतलाऊँगा ।८-६। हे वत्स ! यह सब पूर्व की ही भाँति समझ लेना चाहिए । और संक्षेप से अब भी समझ लो । जो भी दृष्ट है उसी से अनुमान कर लेना चाहिए । मैं युक्ति से तर्क बतलाऊँगा ।१०। वह ऐसा विषय है जहाँ पर वाणी की पहुँच नहीं हैं और मन भी वहाँ तक नहीं पहुँचता है । वह अव्यक्त के ही समान परोक्ष है अतएव बहुत ही गहन और दुरासद है ।११। विकारों के साथ प्रति संसृष्ट होता हुआ गुण समता से रहता है । प्रधान पुरुषों के साधर्म्य से ही स्थित रहा करता है ।१२। प्राणियों के सदा धर्म और अधर्म अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं । उस समय में सत्व मात्रात्मक अर्थात् केवल सत्व स्वरूप वाला धर्म सत्वगुण में प्रतिष्ठित होता है ।१३। तमो मात्रात्मक धर्म तमोगुण में प्रतिष्ठित होता है । ये दोनों ही बिना ही विभाग के गुणों की समता में स्थित रहते हैं ।१४।
सर्वं कार्यं बुद्धिपूर्वं प्रधानस्य प्रपत्स्यते ।
अबुद्धिपूर्वं क्षेत्रज्ञ अधिष्ठास्यति तान्गुणान् ॥१५