भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 539

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्कथ्यमानमस्माकं भवता श्लक्ष्णया गिरा । मनः कर्णसुखं सूते प्रीणात्यमृतसन्निभम् ॥४ एवमाराध्य ते सूतं सत्कृत्य च महर्षयः । पप्रच्छुः सत्त्रिणः सर्वे पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् ॥५ कथं सूत महाप्राज्ञ पुनः सर्गः प्रपत्स्यते । बन्धेषु संप्रलीनेषु गुणसाम्ये तमोमये ॥६ विकारेष्वविसृष्टेषु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते । अप्रवृत्ते ब्रह्मणा तु सहसा योज्यगैस्तदा ॥७

ऋषियों ने कहा—आपके द्वारा वर्णित यह महान आख्यान हमने सुन लिया है। इसमें मनुओं के साथ प्रजाओं का तथा ऋषियों के सहित देवों का—पितरों का—गन्धर्वों का—भूतों का—पिशाच—उरग और राक्षसों का—दैत्यों का—दानवों का—यक्षों का और पक्षियों का वर्णन है। इन सबके अत्यन्त अद्भुत कर्म हैं तथा धर्म आदि का भी निश्चय है और बहुत ही विचित्र कथा के योग हैं और अत्युत्तम तथा श्रेष्ठजन्म हैं। यह सभी का हमने भली श्रवण कर लिया है ।१-३। आपने जो भी वर्णन किया है वह बहुत ही श्रुति प्रिय सुन्दर वाणी के द्वारा किया है और हमारे मन और कानों को सुख देने वाला है तथा अमृत के ही समान प्रीणन करने वाला है ।४। उन सब महर्षियों ने सूतजी की इस रीति से आराधना करके उनका बड़ा ही सत्कार किया था। फिर उन सत्र करने वालों ने सबने पुनः सर्ग के प्रवर्त्तन के विषय में उनसे प्रश्न किया था ।५। उन्होंने कहा था—हे सूतजी ! आप तो महान् पण्डित हैं। अब हमको यही बतलाइये कि फिर इस सर्ग का प्रवर्त्तन किस प्रकार से होगा। जब ये सभी बन्धन प्रलीन हो जाते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों में साम्यावस्था होती है और यह सर्वत्र अन्धकार से परिपूर्ण होता है। समस्त विकार अविसृष्ट होते हैं तथा अव्यक्त आत्मा में स्थित होता है। उस समय में योज्यगों के द्वारा सहसा ब्रह्माजी के अप्रवृत्त होने पर यह सर्ग कैसे होता है ।६-७।

कथं प्रपत्स्यते सर्गस्तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम् । एवमुक्तस्ततः सूतस्तदाऽसौ लोमहर्षणः ॥८ व्याख्यातुमुपचक्राम पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् । अत्र वो वर्त्तयिष्यामि यथा सर्ग प्रपत्स्यते ॥६

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