संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तो बीजांकुर भी समाप्त हो जाया करता है और ज्ञानी जो है वह तो सर्व संसाराविज्ञ शारीर मानस होता है अर्थात् सभी संसार के द्वारा उसका शरीर और मन अविज्ञ ही रहता ।८४।
ज्ञानाच्चतुर्दशो बुद्धः प्रकृतिस्थो निवर्त्तते । प्रकृतिं सत्यमित्याहुर्विकारोऽनृतमुच्यते ॥८५ असद्भावोऽनृतं ज्ञेयं सद्भावः सत्यमुच्यते । अनामरूपं क्षेत्रज्ञनामरूपं प्रचक्षते ॥८६ यस्मात्क्षेत्रं विजानाति तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते । क्षेत्रं प्रत्ययते यस्मात्क्षेत्रज्ञः शुभ उच्यते ॥८७ क्षेत्रज्ञः स्मर्यते तस्मात्क्षेत्रं तज्ज्ञैर्विभाष्यते । क्षेत्रं त्वत्प्रत्ययं दृष्टं क्षेत्रज्ञः प्रत्ययः सदा ॥८८ क्षपणात्कारणाच्चैव क्षतत्राणात्तथैव च । भोज्यत्वविषयत्वाच्च क्षेत्रं क्षेत्रविदो विदुः ॥८६ महदाद्यं विशेषांतं सणैरूप्यं विलक्षणम् । विकारलक्षणं तद्वं सोऽक्षरः क्षरमेति च ॥६० तमेवानुविकारं तु यस्माद्वं क्षरते पुनः । तस्माच्च कारणाच्चैव क्षरमित्यभिधीयते ॥६१
ज्ञान से चार प्रकार की दशा से बद्ध प्रकृति में स्थित निवृत्त हो जाता है । यह प्रकृति तो सत्य ही कही जाती है इस से जो भी विकार होता है वही मिथ्या बताया जाया करता है ।८५। जो असद्भाव वाला है वही अनृत समझना चाहिए और जो सद्भाव होता है वह सत्य कहा जाता है । यह क्षेत्रज्ञ नाम और रूप से रहित होता है । यह तो क्षेत्रज्ञ इसी नाम से बोला जाया करता है ।८६। क्षेत्रज्ञ इसका नाम इसीलिए होता है कि यह क्षेत्र को जानता है । जिस कारण से यह क्षेत्र को विश्वस्त मानता है इसी से क्षेत्रज्ञ परम शुभ कहा जाता है ।८७। क्षेत्रज्ञ का स्मरण किया जाता है इसी कारण से उसके ज्ञाताओं के द्वारा विभाश्यमान होता है । क्षेत्र तो त्वत्प्रत्यय वाला देखा गया है और सदा ही क्षेत्रज्ञ प्रत्यय होता है ।८८। अब यह बताते हैं कि क्षेत्र यह नाम इसका क्यों हुआ है—इसका शयन होता है