संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पश्यंत्येवं विधाः सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा ।
खादतश्चान्नपानानि योनीः प्रविशतस्तथा ॥७८
तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्च धावतोऽपि यथाक्रमम् ।
जीवः प्राणस्तथा लिंगं करणं च चतुष्टयम् ॥७६
पर्यायवाचकैः शब्दैरेकार्थैः सोऽभिलप्यते ।
व्यक्ताव्यक्तप्रमाणोऽयं स वै भुंक्ते तु कृत्स्नशः ॥८०
अव्यक्तानुग्रहांतं च क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं च यत् ।
एवं ज्ञात्वा शुचिर्भूत्वा ज्ञानाद्धै वि मुच्यते ॥८१
नष्टं चैव यथातत्वं तत्त्वानां तत्त्वदर्शने ।
यथेष्टं परिनिर्याति भिन्ने देहे सुनिर्वृते ॥८२
भिद्यते करणं चापि ह्यव्यक्तज्ञानिनस्ततः ।
मुक्तो गुणशरीरेण प्राणाद्येन तु सर्वशः ॥८३
नान्यच्छरीरमादत्ते दग्धे बीजे यथांकुरः ।
ज्ञानी च सर्वसंसारार्विज्ञशारीरमानसः ॥८४
इसी प्रकार के सिद्ध पुरुष जीव को दिव्य चक्षुके द्वारा देखा करते हैं तथा उनको जो अन्न को खाते हैं और पान किया करते हैं तथा योनियों में प्रवेश किया करते हैं ।७८। ऊपर-नीचे और तिरछा दौड़ता हुआ भी जो क्रम के ही अनुरूप उसका धावन होता है उस दशा में भी उसके जीव-प्राण-लिङ्ग ओर करण—ये चार वस्तुएं विद्यमान हैं ।७६। ये चारों पर्याय वाचक अर्थात समानार्थक हैं तो भी एकार्थ वाले शब्दों से वह अभिलषित होता है । व्यक्त और अव्यक्त प्रमाण वाला यह है और वह पूर्णतया भोगता है ।८०। अव्यक्त के अनुग्रह के अन्त वाला है और जो क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित है । इस प्रकार से ज्ञान प्राप्त करके शुचि होकर ज्ञान से ही निश्चित रूप से विमुक्ति को प्राप्त हुआ करता है ।८१। तत्वों के दर्शन में तत्व जैसे ही नष्ट होता है फिर भिन्न सुनिर्वृत्त देह में जैसा भी इष्ट हो वह परिनिर्वाण किया करता है ।८२। फिर अव्यक्त ज्ञानी का करण भी विद्यमान होता है । वह प्राणादि गुण शरीर से सब प्रकार से मुक्त ही हो जाता है ।८३। फिर वह अन्य शरीर को ग्रहण नहीं किया करता है क्योंकि जैसे जब बीज ही दग्ध हो जाता है