संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तृष्णाक्षयस्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षलक्षणम् ।
शब्दाद्ये विषये दोषद्दष्टिर्वै पञ्चलक्षणे ॥७१
अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः प्रीतित्यापविवर्जनम् ।
वैराग्यकारणं ह्येते प्रकृतीनां लयस्य च ॥७२
अष्टौ प्रकृतयो ज्ञेयाः पूर्वोक्ता वै यथाक्रमम् ।
अव्यक्ताद्यास्तु विज्ञेया भूतांताः प्रकृतेर्भवाः ॥७३
वर्णाश्रमाचारयुक्तः शिष्टः शास्त्राविरोधनः ।
वर्णाश्रमाणां धर्मोऽयं देवस्थानेषु कारणम् ॥७४
ब्रह्मादीनि पिशाचांतान्यष्टौ स्थानानि देवताः ।
ऐश्वर्यमणिमाद्यं हि कारणं ह्यष्टलक्षणम् ॥७५
निमित्तमप्रतीघाते दृष्टे शब्दादिलक्षणे ।
अष्टावेतानि रूपाणि प्राकृतानि यथाक्रमम् ॥७६
क्षेत्रज्ञेष्वनुसज्जंते गुणमात्रात्मकानि तु ।
प्रावृट्काले पृथग्मेघं पश्यंतीव सचक्षुषः ॥७७
तीसरा तृष्णा का क्षय है जो कि मोक्ष का लक्षण व्याख्यान किया गया है। शब्दादि पञ्च लक्षण विषय में दोष दृष्टि होती है ।७४। अप्रद्वेष-अभिष्वङ्ग-प्रीति ताप का विवर्जन ये ही प्रकृतियों का और लय का वैराग्य का कारण हैं ।७२। आठ पूर्व में वर्णित क्रमानुसार प्रकृतियाँ जाननी चाहिए। अव्यक्तादि और भूतान्त प्रकृति से उद्भूत समझने चाहिए ।७३। वर्णों ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र और आश्रमों (ब्रह्मचर्य-गार्हस्थ्य-वाणप्रस्थ-संन्यास) से समन्वित-शिष्ट और शास्त्रों का विरोध न करने वाला यह वर्णाश्रमों का देवों के स्थानों में कारण होता है ।७४। ब्रह्मा से आदि लेकर पिशाचों के अन्त पर्यन्त ये आठ स्थान ही देवता हैं। ऐश्वर्य और अणिमादि आठ लक्षण ही कारण हैं ।७५। शब्दादि के लक्षण वाले अप्रतिघात के दृष्ट होने पर निमित्त हैं। ये क्रमानुसार आठ प्राकृत रूप हैं ।७६। ये गुण मात्रात्मक क्षेत्रज्ञों में अनुसज्जित होते हैं। जिस तरह से नेत्रों वाले मनुष्य वर्षा काल में मेघ को पृथक् देखा करते हैं ।७७।