संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११७
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि रागं भूतापहारिणम् ।
अभिष्वंग्राय योगः स्याद्विषयेष्ववशात्मनः ॥४६
अनिष्टमिष्टमप्रीतिप्रीतितापविषादनम् ।
दुःखलाभे न तापश्च सुखानुस्मरणं तथा ॥४७
इत्येष वैषयो रागः संभूत्याः कारणं स्मृतः ।
ब्रह्मादौ स्थावरांते वै संसारे ह्याधिभौतिके ॥४८
अज्ञानपूर्वकं तस्मादज्ञानं तु विवर्जयेत् ।
यस्य चार्षं न प्रमाणं शिष्टाचारं तथैव च ॥४९
बाल तृष्णा के सहित होता है और अपने ही द्वारा किये हुए कर्मों के फलों से तेल पीड़क की भाँति उसी में परिवर्त्तित हुआ करता है अर्थात् जैसे तेल निकालने की घानी में कोई फिरता है उसी तरह से इस संसार के चक्र में जीव घूमा करता है ।४३। इस कारण से अनर्थों का मूल अज्ञान ही बताया जाया करता है । उसी एक अज्ञान को अपना शत्रु मानकर ज्ञान के प्राप्त करने में ही पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए ।४४। मन से सब कुछ का त्याग किया जाता है और त्याग जब होता है तो उस त्याग से बुद्धि में वैराग्य हो जाया करता है अर्थात् फिर संसार की सभी वस्तु सार हीन और हेय प्रतीत हुआ करती हैं । वैराग्य से शुद्धि हो जाया करती है तथा शुद्ध सत्व से युक्त हो जाता है ।४५। अब इसके आगे हम उस राग के विषय में बतलायेंगे जो भूतों का अपहरण करने वाला होता है, विषयों में अवश आत्मा वाले का अभिष्वङ्ग के लिए योग हुआ करता है ।४६। अनिष्ट-इष्ट-अप्रीति-प्रीति-ताप-विषाद-दुःखों के लाभ में ताप होता है और सुखों का अनुस्मरण नहीं हुआ करता है ।४७। इतना यही विषयों में रहने वाला राग है और संभूति कारण यही राग बताया गया है । जो ब्रह्मा से आदि लेकर स्थावर पर्यन्त इस आधिभौतिक संसार में होता है ।४८। यह सब अज्ञान पूर्वक अर्थात् अज्ञान से ही होता है । इस कारण से अज्ञान को परिवर्जित कर देना चाहिए । जिसका आर्षग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं है और जो शिष्ट पुरुषों का आचरण भी नहीं है ।४९।
वर्णाश्रमविरुद्धो यः शिष्टशास्त्रविरोधकः ।
एष मार्गो हि निरये तिर्यग्योनौ च कारणम् ॥५०