भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 527

११६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ये तीन ही गतियां होती हैं जो शुभ और पापात्मिक कही गयी हैं। तमोगुण से अभिभूत होकर यह जीवात्मा यथार्थता को प्राप्त नहीं हुआ करता है। ३६। तत्व के दर्शन न करने से ही वह जीवात्मा यहाँ पर अनेक प्रकार से बद्ध हो जाया करता है। वह बन्धन तत्व वैकारिक और प्राकृत है। ३७। तृतीय दक्षिणों में बद्ध हुआ यह अत्यन्त ही विवर्त्तित हो जाता है। ये ही तीन इस जीवात्मा के बन्धन होते हैं जो केवल अज्ञान के ही कारण से हुआ करते हैं। ३८। यह जीवात्मा जो वस्तु अनित्य है उनमें नित्य होने का ज्ञान रखता है जो कि सर्वथा गलत है। जो दुःखमय है उसमें ही सुख का दर्शन किया करता है। जो वस्तुतः अपना नहीं है उसको ही अपना समझता है और जो वास्तव में अशुचि अर्थात् अपवित्र है उसको पवित्र जानता है। ३६। ज्ञान की विपरीतता होने ही से ये सब दोष समुत्पन्न हुआ करते हैं और जिनमें ये होते हैं वे सब उनके मन के ही दोष हैं। जिसके मन में सांसारिक वस्तुओं के प्रति राग द्वेष की निवृत्ति होती है, उसी का नाम ज्ञान कहा गया है, किन्तु वास्तविक रूप से ऐसा होता नहीं है, दिखाने और कहने को भले ही कोई कुछ भी किया करे। ४०। यह अज्ञान जो होता है उसका मूल तमोगुण की ही अधिकता है। ज्ञान का होना और अज्ञान का जमा रहना ये दोनों ही रजोगुण का परिणाम हैं। सभी जानते हैं कि कुछ भी साथ नहीं जाता है फिर भी सांसारिक वस्तुओं में प्रबल मोह नहीं छूटता है। यह देह तो कर्मों ही से प्राप्त होता है और फिर भी वही अज्ञान इसमें भरा ही रहता है तो यह महान् दुःख का भागी होता है। ४१। विषयों के प्रति बड़ी भारी तृषा बनी रहती है। यही तृषा पुनः संसार में फँसाये रखने वाली होती है जो कर्मों के कारण दुःख से होती है। कानों में समुत्पन्न—नेत्रों से सम्भूत-त्वचा, रसना और नासिका से उत्पन्न यह विषयों के आस्वादन की पिपासा हुआ करती है। ४२।

सतृष्णोऽभिहितो बालः स्वकृतैः कर्मणः फलैः ।
तैंलपीडकवज्जीवस्तत्रैव परिवर्त्तते ॥४३
तस्मान्मूलमनर्थानामज्ञानमुपदिश्यते ।
तं शत्रुमवधार्यैकं ज्ञाने यत्नं समाचरेत् ॥४४
ज्ञानाद्धि त्यजते सर्व त्यागाद्बुद्धिर्विरज्यते ।
वैराग्याच्छुध्यते चापि शुद्धः सत्त्वेन मुच्यते ॥४५