भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११५

उस अवस्था में स्थित हो वे ही सब पाप और पुण्य जन्तुओं को पुनः परत्व से उसी प्रकार से देहों के साथ योजित किया करते हैं अर्थात् उन्हीं पुण्य पापों के अनुसार जीव देहों को प्राप्त किया करते हैं ।२६। जीवों के धर्म और अधर्म दोनों ही गुण मात्रों के स्वरूप वाले होते हैं । जन्तुओं के द्वारा अपने ही कारणों से कार्य के रूप में परिणत होकर बढ़ जाया करते हैं ।३०। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) में अधिष्ठित गुण चेतन के सहित धलीन होते हैं । इस संसार में सर्ग में सब जन्तु होते हैं ।३१। राजसी तामसी और सात्त्विकी वृत्तियाँ संयुक्त होती हैं—वियुक्त होती हैं और कारणों के द्वारा सञ्चरण किया करती हैं ।३२। पुरुषों में अधिष्ठित केवल गुण ही प्रवृत्त हुआ करते हैं और तीन प्रकार से होते हैं । ऊर्ध्व दशात्मक सत्त्व है—और अधोभागात्मक तम है ।३३। इन दोनों का मध्य प्रवर्त्तक रजोगुण चेत इसी रीति से यहाँ पर है और ये तीनों परिवर्तित हुआ करते हैं ।३४। लोकों में समस्त भूतों के कार्य को जानने वाले को वह नहीं करना चाहिए । मानवों के द्वारा अविद्या के विश्वास से ही सभी का आरम्भ किया जाया करता है । तात्पर्य यही है कि सबका आरम्भ अविद्या के ही विश्वास से हुआ करता है ।३५।

एतास्तु गतयस्तिस्रः शुभात्पापात्मिकाः स्मृताः ।
तमसोऽभिभवाज्जंतुर्यथातथ्यं न विदति ॥३६

अतत्त्वदर्शनात्सोऽथ विविधं बध्यते ततः ।
प्राकृतेन च बन्धेन तथावैकारिकेण च ॥३७

दक्षिणाभिस्तृतीयेन बद्धोऽत्यंतं विवर्त्तते ।
इत्येते वै त्रयः प्रोक्ता बंधा ह्यज्ञानहेतुकाः ॥३८

अनित्ये नित्यसंज्ञा च दुःखे च सुखदर्शनम् ।
अस्वे स्वमिति च ज्ञानमशुचौ शुचिनिश्चयः ॥३९

येषामेते मनोदोषा ज्ञानदोषा विपर्ययात् ।
रागद्वेषनिवृत्तिश्च तज्ज्ञानं समुदाहृतम् ॥४०

अज्ञानं तमसो मूलं कर्मद्वयफलं रजः ।
कर्मजस्तु पुनर्देहो महादुःखं प्रवर्त्तते ॥४१

श्रोत्रजा नेत्रजा चैव त्वग्जिह्वाघ्राणजा तथा ।
पुनर्भवकरी दुःखात्कर्मणा जायते तृषा ॥४२