भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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११४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जो तत्वों का चिन्तन करने वाले महा मनीषी हैं वे उसको बुद्धि-मन-लिङ्ग-महान् और अक्षर-इन पर्याय वाचक शब्दों के द्वारा कहा करते हैं ।२२। जब ये सब भूतादिक भली भांति से प्रलीन हो जाया करते हैं तब गुणों की (सत्त्व-रज-तम) समता हो जाती है और उस में वह गुणों का साम्य लीन हो जाता है तथा अपने ही स्वरूप में अवस्थित रहा करता है ।२३। समस्त भूतों के कारण प्रसङ्ग में लीन हो जाया करते हैं। यही तत्त्वों का कारणों के साथ संयम होता है ।२४। हे द्विजो ! यह तत्त्वों का प्रसंयम आवर्त्तक कहा गया है। धर्म और अधर्म, शुभ ज्ञान, सत्य और मिथ्या-ऊर्ध्वभाव और अधोभाव-सुख और दुःख-प्रिय और अप्रिय-यह सभी कुछ प्रपञ्च में स्थित गुणमात्र के स्वरूप वाला कहा गया है ।२५-२६। बिना इन्द्रियों वाले ज्ञानियों का उस समय में जो भी शुभ और अशुभ कर्म है वह सब पुण्य और पाप प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२७। और यही अवस्था होती है जो देह धारियों की कही जाया करती है और जन्तुओं का जो भी कुछ पुण्य और पाप है वह प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२८।

अवस्थास्थानि तान्येव पुण्यपापानि जंतवः ।
योजयंति पुनर्देहान्परत्वेन तथैव च ॥२६
धर्माधर्मै तु जंतूनां गुणमात्रात्मकावुभौ ।
कारणैः स्वैः प्रचीयेते कार्यत्वेन जंतुभिः ॥३०
सचेतनाः प्रलीयंत क्षेत्रज्ञाधिष्ठिता गुणाः ।
सर्गे च प्रतिसर्गे च संसारे चैव जंतवः ॥३१
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते कारणैः संचरंति च ।
राजसी तामसी चैव सात्विकी चैव वृत्तयः ॥३२
गुणमात्राः प्रवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठितास्त्रिधा ।
उद्ध्वंदेशात्मकं सत्त्वमधोभागात्मकं तमः ॥३३
तयोः प्रवर्त्तकं मध्ये इहैवावर्त्तकं रजः ।
इत्येवं परिवर्तन्ते त्रयश्चेतोगुणात्मकाः ॥३४
लोकेषु सर्वभूतानां तन्न कार्यं विजानता ।
अविद्याप्रत्ययारंभा आरभ्यन्ते हि मानवैः ॥३५