संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आकाश ग्रस लिया करता है ।१६। उस समय में वायु भी अस्तित्व खोकर प्रशान्त हो जाता है और केवल आकाश ही अनावृत होकर स्थित रहा करता है । न तो इसके रूप है और न रस-स्पर्श-गन्ध तथा मूर्त्ति हैं । ऐसा आकाश रहा करता है ।१७। आकाश का विशेष गुण शब्द है । वह इसी से सबको पूरित करके बहुत विशाल दिखाई देता है । तात्पर्य यही है कि इसी का अस्तित्व होता है । वायु में भी लीन होने पर केवल अवशिष्ट आकाश ही होता है जिसका लक्षण ही शब्द होता है ।१८। उस समय में केवल शब्द ही जिसमें शेष रह गया था ऐसा आकाश सबको ढककर स्थित था । वहाँ पर जो उसका गुण शब्द था उसको भूतादि ग्रस लेते हैं ।१९। भूतेन्द्रियों में एक साथ भूतादि के संस्थित होने पर यह अभिमान के ही स्वरूप वाला भूतादि तमस कहा गया है ।२०। बुद्धि के लक्षण वाला यह महान् भूतादि का ग्रसन कर लेता है, महान् के स्वरूप वाला यह व्यवसाय करने वाला सङ्कल्प ही समझ लेना चाहिए ।२१।
बुद्धिर्मनश्च लिंगं च महानक्षर एव च । पर्यायवाचकैः शब्दैस्तमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥२२ संप्रलीनेषु भूतेषु गुणसाम्ये ततो महान् । लीयते गुणसाम्यं तु स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥२३ लीयन्ते सर्वभूतानां कारणानि प्रसंगमे । इत्येष संयमश्चैव तत्त्वानां कारणैः सह ॥२४ तत्त्वप्रसंयमो ह्येष स्मृतो ह्यावर्तको द्विजाः । धर्माधर्मौ तपो ज्ञानं शुभं सत्यानृते तथा ॥२५ ऊर्ध्वभावो ह्यधोभावः सुखदुःखे प्रियाप्रिये । सर्वमेतत्प्रपंचस्थं गुणमात्रात्मकं स्मृतम् ॥२६ निरिन्द्रियाणां च तदा ज्ञानिनां तच्छुभाशुभम् । प्रकृत्यां चैव तत्सर्वं पुण्यं पापं प्रतिष्ठति ॥२७ यात्यवस्था तु स चैव देहिनां तु निरुच्यते । जंतूना पापपुण्यं तु प्रकृतौ यत्प्रतिष्ठितम् ॥२८