भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चार सौ करोड़ मानवों के वर्ष तथा बत्तीस करोड़ द्विजों के द्वारा संख्या से संख्यात हैं ।२२६। उसी भाँति एक सौ सहस्र और फिर उन्यासी अस्सी सहस्र यह उस महान् प्लव का काल होता है ।२३०। यह आभूत संप्लव का काल मानुष नामक संख्या से गिनकर बताया गया है । जिसमें समस्त प्राणियों का संक्षय होकर सर्वत्र जल ही जल हो जाता है उसी को आभूत संप्लव कहा जाया करता है । सात सूर्यों के द्वारा उस समय में उन लोकों के प्रदग्ध होने पर चारों प्रकार की सम्पूर्ण प्रजा महाभूतों में लीन हो जाया करती है । जरायुज—स्वेदज—अण्डज और उद्भिज—ये प्रजा के चार प्रकार होते हैं ।२३१।

सलिलेनाप्लुते लोके नष्टे स्थावरजंगमे ॥२३२
विनिवृत्ते च संहारे उपशान्ते प्रजापतौ ।
निरालोके प्रदग्धे तु नैशेन तमसा वृते ॥२३३
ईश्वराधिष्ठिते त्वस्मिंस्तदा ह्येकार्णवे किल ।
तावदेकार्णवे ज्ञेयं यावदासीदहः प्रभोः ॥२३४
रात्रिस्तु सलिलावस्था निवृतौ वाप्यहः स्मृतम् ।
अहोरात्रस्तथैवास्य क्रमेण परिवर्तते ॥२३५
आभूतसंप्लवो ह्येष अहोरात्रः स्मृतः प्रभोः ।
त्रैलोक्ये यानि सत्वानि गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२३६
आभूतेभ्यः प्रलीयन्ते तस्मादाभूतसंप्लवः ।
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताः प्रजाः ॥२३७
दिव्यसंख्या प्रसंख्याता अपरार्धगुणीकृताः ।
परार्द्धं द्विगुणं चापि परमायुः प्रकीर्तितम् ॥२३८

उस समय में सम्पूर्ण लोक जल से समाप्लुत होकर नष्ट हो जाया करता है और सभी स्थावर तथा जङ्गम विनष्ट हो जाया करते हैं ।२३२। समग्र संहार के समीप हो जाने पर और प्रजापति के उपशान्त होने पर तथा सर्वत्र प्रकाश से रहित एवं दग्ध तथा रात्रि के अन्धकार से आवृत होने पर ।२३३। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर के द्वारा ही अधिष्ठित था और सर्वत्र एक ही अर्णव था । यह तब तक एकार्णव का स्वरूप था जब

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