भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रसिद्ध था । समस्त कन्याओं में बहुत श्रेष्ठ ज्येष्ठा थी जो वैरिणी का सुता थी ।३९। पिता उस कन्या को लेकर ब्रह्माजी के समीप में गया था । ब्रह्मा- जी वैराज मे समवस्थित थे और धर्म तथा मन के द्वारा उपासीन थे ।४०। जब दक्ष भव और धर्म के समीप में स्थित थे तब उनसे ब्रह्माजी ने कहा था--हे दक्ष ! आपकी यह सुव्रत कन्य चार मनुओं को जन्म देगी जो इसके पुत्र चारों वर्णों के करने वाले परम शुभ होंगे । ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर दक्ष-धर्म ओर भव उस समय मे यह किया था ।४१-४२।

तां कन्यां मनसा जग्मुस्त्रयस्ते ब्रह्मणा सह । सत्याभिध्यायिनां तेषां सद्यः कन्या व्यजायत ॥४३ सदृशानूपतस्तेषां चतुरो वै कुमारकान् । संसिद्धाः कार्यकरणे संभूतास्ते श्रियान्विताः ॥४४ उपभोगासमर्थैश्च सद्योजातैः शरीरकैः । ते दृष्ट्वा तान्स्वयंभूतान्ब्रह्मव्याहारिणस्तदा ॥४५ संरब्धा वै व्यकर्षंत मम पुत्रो ममेत्युत । अभिध्यायात्मनोत्पन्नानूचुर्वे ते परस्परम् ॥४६ यो अस्य वपुषा तुल्यो भजतां सततं सुतम् । यस्य यः सदृशश्चापि रूपे वीर्ये च मानतः ॥४७ तं गृह्णातु स भद्रं वो वर्णतो यस्य यः समः । ध्रुवं रूपं पितुः पुत्रः सोऽनुरुध्यति सर्वदा ॥४८ तस्मादात्मसमः पुत्रः पितुर्मातुश्च वीर्यतः । एवं ते समयं कृत्वा सर्वेषां जगृहुः सुतान् ॥४९

उस समय ब्रह्माजी के साथ ही मन से उन तीनों ने उस कन्या को गमन किया था । सत्याभि धायी उनकी कन्या के तुरन्त ही समुत्पन्न किया था । अर्थात् रूप से उन्हीं के सदृश चार कुमारों को जन्म दिया था वे कार्यों के करने में संसिद्ध थे तथा श्री से समन्वित हुए थे ।४५। उनके तुरन्त ही समुत्पन्न शरीर सभी उपभोगों के लिए समर्थ थे । स्वयं ही समुत्पन्न उन कुमारों को देखकर वे जो उस समय ब्रह्म के व्यापारी थे आपस में बहुत ही संरम्भ वाले होकर खींचातानी करने लगे कि यह मेरा पुत्र है—