संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ ७६
तो वे सब जाकर महर्लोक में समाश्रय वाले हो जाते हैं ।३३। उनमें जो आठ थे वे व्यतीत हो चुके थे और छै दूसरे थे। पूर्व में होने वालों में यह वर्त्तमान में होने वाला यह वैवस्वत प्रभु शासन कर रहे हैं ।३४। जो भी शिष्ट रहे हैं उनको देव-ऋषि और दानवों के ही साथ अब बतलाऊँगा । हे द्विज ! सम्पूर्ण प्रजा की सृष्टि के साथ ही उन सभी अनागतों को बतलाया जायगा अर्थात् आगे होने वाले हैं उनको कहेंगे ।३५।
वैवस्वत निसर्गेण तेषां ज्ञेयस्तु विस्तरः ।
अनूना नातिरिक्तास्ते यस्मात्सर्वे विवस्वतः ॥३६
पुनरुक्तबहुत्वात्तु न वक्ष्ये तेषु विस्तरम् ।
मन्वन्तरेषु भव्येषु भूतेष्वपि तथैव च ॥३७
कुले कुले निसर्गास्तु तस्माज्ज्ञेया विभागशः ।
तेषामेव हि सिद्धयर्थं विस्तरेणक्रमेण च ॥३८
दक्षस्य कन्या धर्मिष्ठा सुव्रता नाम विश्रुता ।
सर्वकन्यावरिष्ठा तु ज्येष्ठा या वीरिणीसुता ॥३६
गृहीत्वा ता पिता कन्यां जगाम ब्रह्मणोऽन्तिके ।
वैराजस्थमुपासीनं धर्मेण च भवेन च ॥४०
भवधर्मसमीपस्थं दक्षं ब्रह्माऽभ्यभाषत ।
दक्ष कन्या तवेयं वै जनयिष्यति सुव्रता ॥४१
चतुरो वै मनून्पुत्रांश्चातुर्वर्ण्यकराञ्छुभान् ।
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा दक्षो धर्मो भवस्तदा ॥४२
वैवस्वत मनु के विसर्ग से उनका भी विस्तार जान लेना चाहिए । कारण यह है कि वे सब वैवस्वत मनुसेन तो अन्यून हैं और न उससे अति-रिक्त ही हैं ।३६। वे बहुत हैं इसलिए और उनका दूसरी बार कथन होने से उनके विषय में विस्तार नहीं कहूँगा । जो भी पहिले हो गये हैं तथा जो भविष्य में होने वाले हैं उन सभी के विषय में अधिक विस्तार नहीं कहा जायगा ।३७। इस कारण से कुल-कुल में विभाग से ही निसर्ग समझ लेने चाहिए । उन्हीं की सिद्धि के लिए विस्तार से और क्रम से कहता हूँ ।३८। प्रजापति दक्ष की कन्या बड़ी ही धम्मिष्ठा थी तथा उसका नाम सुव्रता