भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मन्वन्तर था । वे सब मनु भविष्य अनागत अन्तर में समुत्पन्न हुए थे ।२६। जो मनुगण प्राचेतस दक्ष के दौहित्र थे । ये नाम से पाँच तो सावर्णे थे और चार परमर्षि से समुत्पन्न हुए थे ।२७। संज्ञा का पुत्र एक सावर्णि तथा वैव- स्वत था । सबसे बड़ा संज्ञा का पुत्र प्रभु वैवस्वत मनु था ।२८।

वैवस्वतेंऽतरे प्राप्ते समुत्पत्तिस्तयोः शुभा ।
चतुर्दशैते मनवः कीर्तिताः कीर्तिवर्द्धनाः ।।२६
वेदे स्मृतौ पुराणे च सर्वे ते प्रभविष्णवः ।
प्रजानां पतयः सर्वे भूतानां पतयः स्थिताः ।।३०
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।
पूर्णं युगसहस्रं वै परिपाल्या नरेश्वरैः ।।३१
प्रजाभिस्तपसा चैव विस्तरस्तेषु वक्ष्यते ।
चतुर्दशैते विज्ञेयाः सर्गाः स्वायंभुवादयः ।।३२
मन्वंतराधिकारेषु वर्त्तन्तेऽत्र सकृत्सकृत् ।
विनिवृत्ताधिकारास्ते महर्लोकं समाश्रिताः ।।३३
समतीतास्तु ये तेषामष्टौ षट् च तथाऽपरे ।
पूर्वेषु सांप्रतश्चायं शास्ति वैवस्वतः प्रभुः ।।३४
ये शिष्टास्तान्प्रवक्ष्यामि सह देवर्षिदानवैः ।
सह प्रजानिसर्गेण सर्वांस्तेऽनागतान्द्विजः ।।३५

वैवस्वत मनु के अन्तर प्राप्त हो जाने पर उन दोनों की समुत्पत्ति परम शुभ हुई थी । हमने ये चौदह मनुओं का वर्णन कर दिया है जो कि परमाधिक कीर्ति का वर्धन करने वाले हुए हैं ।२६। वेद में—स्मृति में और पुराण में वे सभी बहुत ही होनहार बताये गये हैं । ये सभी प्रजाओं के तथा प्राणियों के स्वामी हुए हैं ।३०। उन्हीं नरेश्वरों के द्वारा पूरे सहस्र युगों तक यह सम्पूर्ण पृथिवी सातों द्वीपों से समन्वित और बड़े-बड़े विशाल नगरों से युक्त परिपालन करने के योग्य है ।३१। प्रजाओं के द्वारा तथा तप से जो उनका विस्तार है वह सब भी बताया जा रहा है । ये चौदह सर्ग स्वायम्भुव आदि के हैं सभा जान लेने के योग्य हैं ।३२। यहाँ पर मन्वन्तरों के अधिकारों में एक-एक बार यह होता है । जब अधिकार विनिवृत्त हो जाता है