संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५७
तज्जटामंडले शुभ्रे विलिल्ये साऽतिगह्वरे ।
चुलकोदकवच्छंभोर्विलीनां शिरसि प्रभोः ॥४२
फिर तो राजा भगीरथ को उस विशाल अपने राज्य में—बन्धु-बान्धवों में तथा सुखोपभोगों में परम वैराग्य उत्पन्न हो गया था अर्थात् उसे कुछ भी नहीं सुहाता था और सबको उसने निस्सार ही समझ लिया था। उसने फिर अपने एक परमश्रेष्ठ मन्त्री को राज्य शासन का भार सौंप दिया था और तप करने के लिए वन में चला गया था। ३६। उसकी उत्कट इच्छा यही थी कि वह श्रेष्ठ नृप अपने पितरों को नरक की घोर यातना से मुक्त कर स्वर्ग वासी बना देवे। सर्वप्रथम उसने महान तप के द्वारा आयु के द्वारा आयु के लिए ब्रह्माजी की समाराधना की थी। ३७। उनकी आराधना से भगीरथ ने अपनी अभीष्ट आयु प्राप्त करली थी। फिर हे महाराज ! गङ्गा की आराधना की थी और गङ्गा को अपने ऊपर प्रसन्न कर लिया था। ३८। भगीरथने स्वर्ग से गङ्गा का भूमि पर समागमन करने का वरदान प्राप्त किया था। फिर उस स्वर्ग से समापतन करने वाली गंगा की विशाल धारा को अपने शिर पर धारण करने की कृपा करें—इसलिए शिव की आराधना तप द्वारा की थी। क्योंकि अन्य किसी की भी ऐसी शक्ति नहीं थी जो गंगा के वेग को सह सके। ३९। शिव भी भक्तों पर कृपा करने वाले हैं। उन्होंने भी यह वरदान दे दिया था। मेरु पर्वत की शिखर से समापतन करती हुई गंगा देवी को अपने शिर पर जगतों के स्वामी ने ग्रहण किया था जिसमें बड़े-बड़े ग्रह-नक्र और मकर आदि सभी जल के जीव विद्यमान थे। वह गंगा उनके शिर पर सम्प्राप्त हुई थी जिसमें महान् प्रवाह का वेग विद्यमान था। ४०-४१। किन्तु वह गंगा अति गहन परम शुभ शिव के जटा-जूटों का मण्डल था उसमें ही विलीन हो गयी थी। प्रभु शम्भु के शिर में वह ऐसे ही विलीन हो गयी थी जैसे एक चुल्लू जल विहीन हो जाया करता है। ४२।
विलोक्य तत्प्रमोक्षाय पुनराराधयद्धरम् ।
स तां शर्वप्रसादेन लब्ध्वा तु भुवमागताम् ॥४३
आनिन्ये सागरा दग्धा यत्र तां वै दिशं प्रति ।
सऽनुव्रजंती राजानं राजर्षेर्यजतः पथि ॥
तद्यज्ञवाटमखिलं प्लावयामास सर्वतः ।