भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया था।२९। समस्त सांसारिक भोगों के उपभोग करने वाले अंशुमान नृप ने राज्यासन पर उस अपने पुत्र को अभिषिक्त करा दिया था और मेधा सम्पन्न वह तपश्चर्या करने का संकल्प मन में करके वन में चला गया था।३०। फिर श्री सम्पन्न राजा दिलीप ने समस्त शत्रुओं को परास्त करके इस सम्पूर्ण भूमि का परिपालन धर्म पूर्वक किया था।३१। इस दिलीप का पुत्र भगीरथ हुआ था। जो लोक में परम प्रख्यात था सभी धर्म-अर्थ में महाकुशल और श्रीमान् अपरिमित बल-विक्रम से समन्वित था।३२। वह दिलीप भी अवसर आने पर राज्यासन पर भगीरथ का अभिषेक कराकर वन में गमन कर गया था। उस भागीरथ ने भी भूमि का परिपालन अच्छी तरह से किया था और उसने भूमि के सभी कण्टकों को हत कर दिया था।३३। स्वर्गलोक में देवाधीश्वर की ही भाँति नाना प्रकार भोगों का उपभोग करके परम प्रसन्न हुआ था। उस राजा ने पहिले अपने पूर्वजों की जो दशा हुई थी उसका पूरा वृत्तान्त सुन लिया था।३४। विप्र के कोप से महान घोर नरक में पूर्वजों का पतन हुआ है और उसके सभी पितृगण ब्रह्मदण्ड से मारे गये हैं—यह सब सुनकर उसको बहुत अधिक दुःख हुआ था।३५।

राज्ये बंधुषु भोगे वा निर्वेदं परमं ययौ ।
स मंत्रि वरे राज्यं विन्यस्य तपसे वनम् ॥३६

प्रययौ स्वपितॄन्नाकं निनीषुर्नृपसत्तमः ।
तपसा महता पूर्वमायुषे कमलोद्भवम् ॥३७

आराध्य तस्माल्लेभे च यावदायूर्निजेप्सितम् ।
ततो गंगां महाराज समाराध्य प्रसाद्य च ॥३८

वरमागमनं वव्रे दिवस्तस्वा महीं प्रति ।
ततस्तां शिरसा धत्तुं तपसाऽऽराध्यच्छिवम् ॥३९

स चापि तद्वरं तस्मै प्रददौ भक्तवत्सलः ।
मेरोर्मूर्ध्नस्ततो गंगां पतंती शिरसात्मनः ॥४०

सग्राहनक्रमकरां जग्राह जगतां पतिः ।
सा तच्छिरः समासाद्य महावेगप्रवाहिनी ॥४१