भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 581

मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७१

तुलसीं च समुत्पन्नां परार्ध्यामैक्यजां हरेः ।
पद्ममालां ददौ तस्यै मूर्तिमान्क्षीरसागरः ॥८०
भूषणानि च दिव्यानि विश्वकर्मा समर्पयत् ।
दिव्यमाल्यांबरधरा दिव्यभूषणभूषिता ।
ययौ वक्षःस्थलं विष्णोः सर्वेषां पश्यतां रमा ॥८१
तुलसी तु धृता तेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।
पश्यति स्म च सा देवी विष्णुवक्षःस्थलालया ।
देवान्दयार्दया दृष्ट्या सर्वलोकमहेश्वरी ॥८२

आठ जो दिग्गज हैं अर्थात् आठों दिशाओं को बाँध कर रोकने वाले आठ दन्ती हैं। वे सत्र पवित्र पात्रों में जल भरकर उस पद्मों में निवास करने वाली श्री स्नपन करा रहे थे ।७९। मूर्त्तिमान् क्षीर सागर ने हरि के साथ श्रेय को प्राप्त हुई समुत्पन्न तुलसी को तथा पद्म की माला उस देवी के लिये अर्पित की थी।८०। विश्वकर्मा ने परमाद्भुत एवं दिव्य भूषण उसकेलिए समर्पित किये थे । परम उत्तम माला और वस्त्रों के धारण करने वाली एवं दिव्य भूषणों से विभूषिता वह श्री देवी सबके देखते-देखते भगवान् विष्णु के वक्षःस्थल में चली गयी थी ।८१। प्रभविष्णु श्री विष्णु ने तुलसी को तो धारण कर लिया था। भगवान् के वक्षःस्थल में आलय वाली वह देवी देखती थी। सब लोकों की महेश्वरी देवी को दया से आर्द्र दृष्टि से देखा था ।८२।

—x—

॥ मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ॥

हयग्रीव उवाच–

अथ देवा महेन्द्राद्या विष्णुना प्रभविष्णुना ।
अङ्गीकृता महाधीराः प्रमोदं परमः ययुः ॥१
मलकाद्यास्तु ते सर्वे दैत्या विष्णुपराङ्मुखाः ।
संत्यक्ताश्च श्रिया देव्या भृशमुद्वेगमागताः ॥२
ततो जगृहिरे दैत्या धन्वन्तरिकरस्थितम् ।