भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परमामृतसाराढ्यं कलशं कनकोद्भवम् । अथासुराणां देवानामन्योन्यं कलहोऽभवत् ॥३ एतस्मिन्नंतरे विष्णुः सर्वलोकैकरक्षकः । सम्यगाराधयामास ललिता स्वैक्यरूपिणीम् ॥४ सुराणामसुराणां चरणं वीक्ष्य सुदारुणम् । ब्रह्मा निजपदं प्राप शम्भुः कैलासमास्थितः ॥५ मलकं योधयामास दैत्यानामधिपं वृषा । असुरंश्च सुराः सर्वें सांपरायमकुर्वंत ॥६ भगवानपि योगीन्द्रः समाराध्य महेश्वरीम् । तदेकध्यानयोगेन तद्रूपः समजायत ॥७

श्री हयग्रीव ने कहा—इसके अनन्तर महेन्द्र आदि देवों को भगवान् प्रभविष्णु विष्णु ने जग अंगाकार कर लिया था तो महाधीर वे परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए थे ।१। मलक आदि वे सब दैत्य भगवान् विष्णु के पराङ्मुख हो गये थे । जब श्री देवी के द्वारा वे संत्यक्त हो गये थे तो वे अत्यन्त अधिक उद्विग्न होगये थे ।२। इसके उपरान्त उन दैत्यों ने धन्वन्तरि भगवान् के कर में स्थित सुवर्ण निर्मित परमामृत के सार से युक्त कलश को ले लिया था अर्थात् हरण कर लिया था । इसके अनन्तर देवों का और असुरों का परस्पर में कलह उत्पन्न हो गया था ।३। इसी बीच में समस्त लोकों के एक ही रक्षा करने वाले विष्णु भगवान् ने अपने साथ एक रूप वाली ललिता की भली भाँति आराधना की थी ।४। सुरों और असुरों का परम दारुण युद्ध देखकर ब्रह्माजी अपने स्थान पर चले गये थे और शम्भु कैलास पर्वतपर समास्थित होगये थे।५।इन्द्र ने दैत्यों के अधिप मलक से युद्ध किया था । समस्त सुरों ने असुरों के साथ युद्ध किया था ।६। योगीन्द्र भगवान् ने भी महेश्वरी की समाराधना की थी । उन्होंने महेश्वरी का ध्यान योग से द्वारा करके एकता के साथ उसी रूप को प्राप्त हो गये थे ।७।

सर्वसंमोहिनी सा तु साक्षाच्छृङ्गारनायिका । सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वाभरणभूषिता ॥८