भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७३

सुराणामसुराणां च निवार्य रणमुल्बणम् । मंदस्मितेन दैत्यान्मोहयंती जगाद ह ॥९ अलं युद्धेन किं शस्त्रैर्मर्मस्थानविभेदिभिः । निष्ठुरैः किं वृथालापैः कंठशोषणहेतुभिः ॥१० अहमेवात्र मध्यस्था युष्माकं च दिवौकसाम् । यूयं तथामी नितरामत्र हि क्लेशभागिनः ॥११ सर्वेषां सममेवाद्य दास्याम्यमृतमद्भुतम् । मम हस्ते प्रदातव्यं सुधापात्रमनुत्तमम् ॥१२ इति तस्या वचः श्रुत्वा दैत्यास्तद्वाक्यमोहिताः । पीयूषकलशं तस्यै ददुस्ते मुग्धचेतसः ॥१३ सा तत्पात्रं समादाय जगन्मोहनरूपिणी । सुराणामसुराणां च पृथक्पंक्ति चकार ह ॥१४

वह देवी तो सबका संमोहन करने वाली थी और वह साक्षात् श्रृंगार की नायिका थी । वह सम्पूर्ण श्रृंगार के वेषवाली थी और असुरों का जो अतीव उल्बण युद्ध था । उसका निवारण करके अपने मन्दस्मित के द्वारा दैत्यों की मोहित करती हुई वह बोली ।८-९। अब यह युद्ध समाप्त करो, मर्म स्थानों के विभेदन करने वाले शास्त्रों से क्या लाभ होगा । और परम निष्ठुर व्यर्थ के इन अलापों से भी क्या लाभ है जो कि केवल कण्ठों के शोषण करने के कारण स्वरूप ही है ।१०। मैं ही आपके और देवों के मध्य में स्थित हूँ इसमें जैसा कि इस समय में आप लोग कर रहे हैं आप लोग तथा ये देवगण अत्यन्त ही क्लेश के भागी होंगे ।११। मैं आप सभी के लिए आज इस अद्भुत अमृत को बराबर-बराबर दे दूँगी । अब आप लोग इस उत्तम सुधा के पात्र को मेरे हाथ में दे दीजिए ।१२। इस उस महादेवी के वचन का श्रवण करके दैत्य विमोहित हो गये थे क्योंकि उसका वाक्य ही इस प्रकार था । मुग्ध चित्त वाले उन्होंने वह अमृत का कलश उस देवी को दे दिया था ।१३। सम्पूर्ण इस जगत् के मोहन करने वाली उस देवी ने उस अमृत के कलश को ले लिया था और फिर उसने सुरों की तथा असुरों की पृथक्-पृथक् पंक्ति बिठा दी थी ।१४।