संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्वयोः पंक्त्योश्च मध्यस्थास्तानुवाच सुरासुरान् । तूष्णीं भवन्तु सर्वेऽपि क्रमशो दीयते मया ॥ १५ ॥ तद्वाक्यमुररीचक्रुस्ते सर्वे समवायिनः । सा तु संमोहिताशेषलोका दातुं प्रचक्रमे ॥ १६ ॥ क्वणत्कनकदर्वीका क्वणन्मंगलकंकणा । कमनीयविभूषाढ्या कला सा परमा बभौ ॥ १७ ॥ वामे वामे करांभोजे सुधाकलशमुज्ज्वलम् । सुधां तां देवतापंक्तौ पूर्वं दर्व्या तदादिशत् ॥ १८ ॥ दिशंती क्रमशस्तत्र चन्द्रभास्करसूचितम् । दर्वीकरेण चिच्छेद सैंहिकेयं तु मध्यगम् । पीतामृतशिरोमात्रं तस्य व्योम जगाम च ॥ १९ ॥ तं दृष्ट्वाऽप्यसुरास्तत्र तूष्णीमासन्विमोहिताः । एवं क्रमेण तत्सर्वं विबुधेभ्यो वितीर्य सा । असुराणां पुरः पात्रं सा निनाय तिरोदधे ॥ २० ॥ रिक्तपात्रं तु तं दृष्ट्वा सर्वे दैतेयदानवाः । उद्वेलं केवलं क्रोधं प्राप्ता युद्धचिकीर्षया ॥ २१ ॥
उन दोनों पंक्तियों के मध्य में स्थित होकर उन समस्त सुरों और असुरों से उसने कहा था। आप सब लोग बिल्कुल चुपचाप रहें—मेरे द्वारा आप सबको क्रम से ही यह अमृत दिया जाता है ।१५। उन सभी ने जो समवायी थे उस देवी के उस वाक्य को स्वीकृत कर लिया था । वह तो सभी लोकों को संमोहित करने वाली थी। फिर उस देवी ने देने का उपक्रम किया था ।१६। उस समय में उसके सुवर्ण की करधनी क्वणित हो रही थी तथा उसके करों के कङ्कण भी क्वणित हो रहे थे जो परम मंगल स्वरूप थे । वह परम कमनीय भूषा से समन्वित थी । उस समय में वह परमाधिक मधुर मूर्त्ति सुशोभित हो रही थी ।१७। परम सुन्दर वाम कर कमल में तो वह उज्ज्वल सुधा का कलश था, उस सुधा को उसने दर्वी से प्रथम देवों की पंक्ति में ही देना आरम्भ किया था ।१८। वह वहाँ पर क्रम से देती हुई