भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 585

मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७५

देखती जा रही थी । उस समय में मध्य में सैंहिकेय स्थित था जिसकी सूचना संकेत द्वारा चन्द्र और सूर्य ने उसको दे दी थी । अतः दर्वी के कर से उसका उस देवी ने छेदन कर दिया था । वह अमृत का पान कर चुका था अतएव उसका केवल शिर आकाशमें चला गया था।१९।उसको देखकर वहाँ पर जो असुर थे वे विमोहित हुए चुप थे । इसी प्रकार से क्रमसे उस देवी ने वह सम्पूर्ण अमृत देवों के लिए वितीर्ण कर दिया था और असुरों के आगे उस खाली पात्र को रखकर वह तिरोहित हो गयी थी ।२०। उन सब दैत्य दानवों ने उस खाली पात्र को देखा था और युद्ध करने की इच्छा से उन्होंने केवल असीम क्रोध किया था ।२१।

इन्द्रादयः सुराः सर्वे सुधापानाद्बलोत्तराः ।
दुर्बलैरसुरैः सार्धं समयुद्ध्यन्त सायुधाः ॥२२
ते विध्यमानाः शतशो दानवेंद्राः सुरोत्तमैः ।
दिगंतान्कतिचिज्जग्मुः पातालं कतिचिद्ययुः ॥२३
दैत्यं मलकनामानं विजित्य विबुधेश्वरः ।
आत्मीयां श्रियमाजह्रे श्रीकटाक्षसमीक्षितः ॥२४
पुनः सिंहासनं प्राप्य महेन्द्रः सुरसेवितः ।
त्रैलोक्यं पालयामास पूर्ववत्पूर्वदेवजित् ॥२५
निर्भया निखिला देवास्त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यथाकामं चरन्ति स्म सर्वदा हृष्टचेतसः ॥२६
तदा तदखिलं दृष्ट्वा मोहिनीचरितं मुनिः ।
विस्मितः कामचारी तु कैलासं नारदो गतः ॥२७
नन्दिना च कृतानुज्ञः प्रणम्य परमेश्वरम् ।
तेन संभाव्यमानोऽसौ तुष्टो विष्टरमास्त सः ॥२८

इन्द्र आदि समस्त सुरगण सुधा के पान से विशेष बलवान् होकर दुर्बल असुरों के साथ आयुधों को लेकर भली भांति लड़े थे ।२२। उन उत्तम सुरों के द्वारा वे दानवेन्द्र सैकड़ों बार विध्यमान हुए थे उनमें से कुछ तो अन्य दिशाओं में चले गये थे और कुछ पाताल लोक में चले गये थे ।२३। श्री देवी के कटाक्षों से सम्प्रेरित होकर देवों के स्वामी इन्द्र देव ने मलक नाम वाले दैत्य को जीत लिया था और