संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उसने अपनी श्री का आहरण कर लिया था ।२४। सुरगणों के द्वारा सेवित महेन्द्र देव ने फिर अपने सिंहासन को प्राप्त कर लिया था और पूर्व की ही भाँति पूर्व देव जित् ने त्रैलोक्य का परिपालन किया था ।२५। फिर समस्त देवगण निर्भय होकर इस चराचर त्रिलोकी में सर्वदा प्रसन्न चित्त होते हुए अपनी इच्छा के अनुसार सञ्चरण किया करते थे ।२६। उस समय सम्पूर्ण मोहिनी के चरित को देखकर मुनि नारद बहुत ही आश्चर्य्यान्वित होकर स्वेच्छा से चरण करने वाले कैलास गिरि पर चले गये थे ।२७। वहाँ पर नन्दी से आज्ञा पाकर उन्होंने परमेश्वर को प्रणाम किया था। शिव प्रभु के द्वारा भली भाँति आदर प्राप्त करके परम तुष्ट हुए थे और आसन पर समवस्थित हो गये थे ।२८।
आसनस्थं महादेवो मुनिं स्वेच्छाविहारिणम् ।
पप्रच्छ पार्वतीजानिः स्वच्छस्फटिकसन्निभः ॥२६
भगवन्सर्ववृत्तज्ञ पवित्रीकृतविष्टर ।
कलहप्रिय देवर्षे किं वृत्तं तत्र नाकिनाम् ॥३०
सुराणामसुराणां वा विजयः समजायत ।
किं वाच्यमृतवृत्तांतं विष्णुना वापि किं कृतम् ॥३१
इति पृष्टो महेशेन नारदो मुनिसत्तमः ।
उवाच विस्मयाविष्टः प्रसन्नवदनेक्षणः ॥३२
सर्वं जानासि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतस्ततः ।
तथापि परिपृष्टेन मया तद्वक्ष्यतेऽधुना ॥३३
तादृशे समरे घोरे सति दैत्यदिवौकसाम् ।
आदिनारायणः श्रीमान्मोहिनीरूपमादधे ॥३४
तामुदारविभूषाढ्यां मूर्ती शृङ्गारदेवताम् ।
सुरासुराः समालोक्य विरताः समरोद्यमात् ॥३५
परम स्वच्छ स्फटिक मणि के सदृश स्वरूप वाले पार्वती के स्वामी श्री महादेवजी ने आसन पर विराजमान नारदजीजी से जो कि अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले थे पूछा था ।२६। हे भगवान् ! आपने इस