संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उसने अपनी श्री का आहरण कर लिया था ।२४। सुरगणों के द्वारा सेवित महेन्द्र देव ने फिर अपने सिंहासन को प्राप्त कर लिया था और पूर्व की ही भाँति पूर्व देव जित् ने त्रैलोक्य का परिपालन किया था ।२५। फिर समस्त देवगण निर्भय होकर इस चराचर त्रिलोकी में सर्वदा प्रसन्न चित्त होते हुए अपनी इच्छा के अनुसार सञ्चरण किया करते थे ।२६। उस समय सम्पूर्ण मोहिनी के चरित को देखकर मुनि नारद बहुत ही आश्चर्य्यान्वित होकर स्वेच्छा से चरण करने वाले कैलास गिरि पर चले गये थे ।२७। वहाँ पर नन्दी से आज्ञा पाकर उन्होंने परमेश्वर को प्रणाम किया था। शिव प्रभु के द्वारा भली भाँति आदर प्राप्त करके परम तुष्ट हुए थे और आसन पर समवस्थित हो गये थे ।२८।
आसनस्थं महादेवो मुनिं स्वेच्छाविहारिणम् ।
पप्रच्छ पार्वतीजानिः स्वच्छस्फटिकसन्निभः ॥२६
भगवन्सर्ववृत्तज्ञ पवित्रीकृतविष्टर ।
कलहप्रिय देवर्षे किं वृत्तं तत्र नाकिनाम् ॥३०
सुराणामसुराणां वा विजयः समजायत ।
किं वाच्यमृतवृत्तांतं विष्णुना वापि किं कृतम् ॥३१
इति पृष्टो महेशेन नारदो मुनिसत्तमः ।
उवाच विस्मयाविष्टः प्रसन्नवदनेक्षणः ॥३२
सर्वं जानासि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतस्ततः ।
तथापि परिपृष्टेन मया तद्वक्ष्यतेऽधुना ॥३३
तादृशे समरे घोरे सति दैत्यदिवौकसाम् ।
आदिनारायणः श्रीमान्मोहिनीरूपमादधे ॥३४
तामुदारविभूषाढ्यां मूर्ती शृङ्गारदेवताम् ।
सुरासुराः समालोक्य विरताः समरोद्यमात् ॥३५
परम स्वच्छ स्फटिक मणि के सदृश स्वरूप वाले पार्वती के स्वामी श्री महादेवजी ने आसन पर विराजमान नारदजीजी से जो कि अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले थे पूछा था ।२६। हे भगवान् ! आपने इस
करने वाला है। अब यह बतलाइये कि उन स्वर्गवासी देवगणों का क्या हाल है ? ।३०। सुरों का अथवा असुरों का विजय हुआ है ? अथवा उस अमृत का क्या हुआ— यह भी वृत्तान्त बतलाइए तथा भगवान विष्णु ने उसमें क्या किया था ? ।३१। इस तरह से महेश प्रभु के द्वारा पूछे गये मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने परम विस्मय से आविष्ट होकर प्रसन्न मुख और नेत्रों वाले नारदजी ने कहा था ।३२। हे भगवन् ! आप तो सभी कुछ जानते हैं क्योंकि आप स्वयं सर्वज्ञ हैं। तो भी क्योंकि आपने मुझसे पूछा है अतः मैं अब वह सब बतलाता हूँ ।३३। उस प्रकार का महान् घोर जब दैत्यों और देवों का युद्ध शुरू हो गया था तो उस समय में आदि नारायण ने जो परम श्री सम्पन्न हैं मोहिनी का स्वरूप धारण कर लिया था ।३४। उस मोहिनी का विलोकन करते ही जो परमोज्ज्वल विभूषा से सुसम्पन्न थीं और मूर्तिमती शृङ्गार की देवता थी सभी सुर और असुर युद्ध के उद्यम से विरत हो गये थे ।३५।
तन्मायामोहिता दैत्याः सुधापात्रं च याचिताः ।
कृत्वा तामेव मध्यस्थामर्पयामासुरंजसा ॥३६
तदा देवी तदादाय मंदस्मितमनोहरा ।
देवेभ्य एव पीयूषमशेषं विततार सा ॥३७
तिरोहितामदृष्ट्वा तां दृष्ट्वा शून्यं च पात्रकम् ।
ज्वलन्मन्युमुखा दैत्या युद्धाय पुनरुत्थिताः ॥३८
अमरैरमृतास्वादादत्युल्बणपराक्रमैः ।
पराजिता महादैत्या नष्टाः पातालमभ्ययुः ॥३९
इमं वृत्तांतमाकर्ण्य भवानीपतिरव्ययः ।
नारदं ऽऽपयित्वाशु तदुक्तं सततं स्मरन् ॥४०
अज्ञातः प्रमथैः सर्वैः स्कन्दनंदिविनायकैः ।
पार्वतीसहितो विष्णुमाजगाम सविस्मयः ॥४१
क्षीरोदतीरगं दृष्ट्वा सस्त्रीकं वृषवाहनम् ।
भोगिभोगासनाद्विष्णुः समुत्थाय समागतः ॥४२
१७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस मोहिनी की माया से मोहित होते हुए दैत्यों से जब सुधा का पात्र मांगा गया था तो उन्होंने उसी मोहिनी को मध्यस्थ बनाकर तुरन्त ही वह पात्र उसको दे दिया था ।३६। मन्द मुस्कान से परम मनोहर उस देवी ने उसी समय में उस पात्र को ले लिया था। उसने इस सम्पूर्ण सुधा को देवों के ही लिए बाँटकर खाली कर दिया था ।३७। जब उन्होंने देखा था कि वह मोहिनी तो तिरोहित हो गयी है और वह सुधा का पात्र खाली है तो क्रोध से उन सबका मुख लाल हो गया था और वे दैत्य फिर युद्ध करने के लिए समुद्यत हो गये थे ।३८। अमृत के खाने से वे देवगण तो अमर हो गये थे और उनका पराक्रम भी बहुत ही उल्बण हो गया था। उन्होंने उस युद्ध में दैत्यों को पराजित कर दिया था फिर वे महादैत्य नष्ट होते हुए पाताल लोक में चले गये थे ।३९। अविनाशी भवानी के स्वामी ने इस वृत्तान्त का श्रवण करके नारदजी को तो विदा कर दिया था और उसी वृत्तान्त का निरन्तर स्मरण करने लगे थे ।४०। स्कन्द-नन्दी और विनायक इन समस्त गणों के द्वारा अज्ञात होते हुए बड़े ही आश्चर्य से समन्वित होकर केवल पार्वती को साथ में लेकर भगवान् विष्णु के समीप में आ गये थे ।४१। क्षीर सागर के तट पर अपनी प्रिया के साथ भगवान् शम्भु का दर्शन करके शेष की शय्या से समुत्थित होकर भगवान् विष्णु तुरन्त ही वहाँ पर समागत हो गये थे ।४२।
वाहनादवरुह्येशः पार्वत्या सहितः स्थितम् ।
तं दृष्ट्वा शीघ्रमागत्य संपूज्यार्घ्यादितो मुदा ॥४३
सस्नेहं गाढमालिग्य भवानीपतिमच्युतः ।
तदागमनकार्यं च पृष्टवान्विष्टरश्रवाः ॥४४
तमुवाच महादेवो भगवन्पुरुषोत्तम ।
महायोगेश्वर श्रीमन्सर्वसौभाग्यसुन्दरम् ॥४५
सर्वसंमोहनकमवाङ्मनसगोचरम् ।
यद्रूपं भवतोपातं तन्मह्यं संप्रदर्शय ॥४६
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपं शृंगारस्याधिदैवतम् ।
अवश्यं दर्शनीयं मे त्वं हि प्रार्थितकामधुक् ॥४७
इति संप्रार्थितः शश्वन्महादेवेन तेन सः।
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७६
यद्ध्यानवैभवाल्लब्धं रूपमद्वैतमद्भुतम् ॥४८ तदेवानन्यमनसा ध्यात्वा किंचिद्विहस्य सः । तथास्त्विति तिरोऽधत्त महायोगेश्वरो हरिः ॥४६
भगवान् शिव वाहन से उतर कर पार्वती के सहित विष्णु भगवान के समीप में पहुँचे और संस्थित भगवान की बड़े आनन्द से पूजा की और अर्घ्य अर्पित किया था ।४३। भगवान अच्युत ने भवानी के पति का स्नेह के साथ गाढालिंगन किया था । विष्णु भगवान ने उनके समागमन का कारण पूछा था ।४४। महादेवजी ने भगवान से कहा—आप तो उत्तम पुरुष है और महान योगेश्वर हैं । आपने श्री सम्पन्न—सभी प्रकार के सौभाग्य से परम सुन्दर तथा सबको संमोह का पैदा करने वाला जो वाणी और मन से कभी गोचर नहीं हो सकता है कैसा स्वरूप आपने धारण किया था । उस स्वरूप का प्रदर्शन मुझे भी कृपाकर कराइए ।४५-४६। मैं आपके—उस स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ जो कि शृंगार का अधिष्ठात्री देवता है । मुझे वह अवश्य दिखाना चाहिए । आप तो प्रार्थित पदार्थों के प्रदान करने वाले कामधेनु ही हैं ।४७। इस प्रकार से महादेवजी के द्वारा बराबर भगवान विष्णु की प्रार्थना की गयी थी । जिनके ध्यान के वैभव से अद्वैत और अद्भुत रूप प्राप्त किया था ।४८। उसी का अनन्यमन से ध्यान करके और कुछ हँसकर उन्होंने कहा—ऐसा ही होगा—और फिर महोयोगेश्वर हरि तिरोहित हो गये थे ।४६।
सर्वोऽपि सर्वतश्चक्षुर्मुहुर्व्यापारयन्क्वचित् । अदृष्टपूर्वमाराममभिरामं व्यलोकयत् ॥५० विकसत्कुसुमश्रेणीविनोदिमधुपालिकम् । चंपकस्तबकामोदसुरभीकृतदिक्तटम् ॥५१ माकन्दवृन्दमाध्वीकमाद्यदुल्लोलकोकिलम् । अशोकमण्डलीकांडसतांडवशिखण्डिकम् ॥५२ भृङ्गालिनवझंकारजितवल्लकिनिस्वनम् । पाटलोदारसौरभ्यपाटलीकुसुमोज्ज्वलम् ॥५३ तमालतालहिंतालकृतमालाविलासितम् । पर्यन्तदीर्घिकादीर्घपङ्कजश्रीपरिष्कृतम् ॥५४
१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वातपातचलच्चारुपल्लवोत्फुल्लपुष्पकम् ।
सन्तानप्रसवमोदसन्तानाधिकवासितम् ॥५५
तत्र सर्वत्र पुष्पाढ्ये सर्वलोकमनोहरे ।
पारिजाततरोर्मूले कान्ता काचिददृश्यत ॥५६
भगवान् शिव ने भी सभी ओर अपनी दृष्टि डालते हुए देखा था तो एक पहिले जो कभी भी नहीं देखा था ऐसा परम सुन्दर उद्यान देखा था ।५०। जो ऐसा था कि प्रसून खिले हुए थे और उन पुष्पों पर मधुपों की श्रेणियां गुञ्जार करती हुई आनन्द ले रही थीं। चम्पा के पुष्पों के स्तवनों की परम रमणीय गन्ध से सभी दिशाएं सुगन्धित हो रही थीं ।५१। माकन्दों के वृन्द और माध्वीक पर मदमस्त कोकिलें उल्लसित हो रही थीं । अशोक वृक्षों के समुदायों में मयूरगण अपना अद्भुत ताण्डव नृत्य कर रहे थे ।५२। भ्रमरों की पंक्तियों की गूँज की झङ्कार से वल्लभियों की ध्वनि भी वहाँ पर पराजित हो गयी थी । पाटलों की उदार सुगन्ध से पाटली कुसुमों की उज्ज्वलता वहाँ पर भरी हुई थी ।५३। ताल की सुखद मालाओं से वह शोभित था उस उद्यान के किनारों पर बड़े-बड़े सरोवर बने हुए थे जिनमें बड़ी विशाल कमलों की शोभा से वह आराम समलंकृत था ।५४। वायु के मन्द झोंके से द्रुमों के पत्र हिल रहे थे और उन पत्रों के मध्य में विकसित पुष्पों की अपूर्व छटा विद्यमान थी । प्रसून और फलों के आमोद के विस्तार से वह अभिराम उद्यान अधिक सुवासित हो रहा था । वहाँ पर सभी जगह विकसित पुष्पों की भरमार थी और वह सभी लोगों के लिए परम मनोहर था । वहाँ पर एक पारिजात के वृक्ष के नीचे कोई एक परमाधिक सुन्दरी दिखलाई दी थी ।५५-५६।
बालार्कपाटलाकारा नवयौवनदर्पिता ।
आकृष्टपद्मरागाभा चरणाब्जनखच्छदा ॥५७
यावकश्रीविनिक्षेपपादलौहित्यवाहिनी ।
कलनिः स्वनमञ्जीरपादपद्ममनोहरा ॥५८
अनंगवीरतूणीरदर्पोन्मदनजंघिका ।
करिशुण्डाकदलिकाकान्तितुल्योरुशालिनी ॥५६
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८१
अरुणेन दुकूलेन सुस्पर्शेन तनीयसा । अलंकृतनितंबाढ्या जघनाभोगभासुरा ॥६० नवमाणिक्यसन्नद्धहेमकांचीविराजिता । नतनाभिमहावर्त्तत्रिवल्यूर्मिप्रभाझरा ॥६१ स्तनकुङ्मलहिंदोलमुक्तादामशतावृता । अतिपीवरवक्षोजभारभंगुरमध्यभूः ॥६२ शिरीषकोमलभुजा कंकणांगदशालिनी । सौर्मिकांगुलिमन्मृष्टशंखसुन्दरकंधरा ॥६३
वह बाल सूर्य के समान पाटल की आकृति वाली थी और नूतन यौवन के दर्प से समन्वित थी । उसके चरण कमलोपम कोमल और नखछद आकृष्ट पद्मराग की आभा वाले थे ।५७। यावक की श्री के विनिक्षेप से उसके चरणों में लालिमा थी जिसको वह वहन कर रही थी । उसके चरणों में परम मनोहर ध्वनि संयुक्त मञ्जीर थे ।५८। उसके जघन कामदेव वीर के तूणीर को उन्मादित करने वाले थे । उसके ऊरुस्थल करिशुण्ड-कदली की कान्ति को भी शमन करने वाले थे ।५९। यह अरुण वर्ण का बहुत ही बारीक और सुख स्पर्श वाला वस्त्र पहिने हुई थी जिसस उसके नितम्ब समलंकृत थे और वह जघनों के आभोग से परम भासुर थी ।६०। नवीन माणिक्य से बँधी हुई सुवर्ण की करधनी से विभूषित थी । उसकी नाभि नत महावर्त्त के समान थी उसके ऊपर त्रिवली की ऊर्मियों की प्रभा झलक रही थी ।६१। कलियों के आकार वाले स्तनों के हिण्डोलों पर सैकड़ों मोतियों के हार पहिने हुई थी । उसके उरोज अत्यधिक स्थूल थे और उनके भार से उसका कटिभाग झुका हुआ था ।६२। उसकी भुजाएं शिरीष के सदृश अतीव कोमल थीं जिनमें कङ्कण और अंगद धारण किये हुई थीं । उसकी अंगुलियां ऊर्मियों के समान प्रतीत हो रही थीं जो अत्यधिक पतली और कोमल थीं तथा उसकी ग्रीवा सुन्दर शंख के समान नतोन्नत थी ।६३।
मुखदर्पणवृत्ताभचुबुकापाटलाधरा । शुचिभिः पक्तिभिः शुद्धैर्विद्यद्रूपैर्विभास्वरैः ॥६४ कुन्दकुङ्मलसच्छायैर्दन्तैर्दर्शितचन्द्रिका ।
१८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स्थूलमौक्तिकसन्नद्धनासाभरणभासुरा ॥६५ केतकांतर्दलद्रोणिदीर्घदीर्घविलोचना । अर्धेन्दुतुलिताफाले सम्यक्कॢप्ताऽलकच्छटा ॥६६ पालीवतंसमाणिक्यकुण्डलामडितश्रुतिः । नवकर्पूरकस्तूरीसामोदितवीटिका ॥६७ शरच्चारुनिशानाथमंडलीमधुरानना । स्फुरत्कस्तूरितिलका नीलकुन्तलसंहतिः ॥६८ सीमंतरेखाविन्यस्तसिंदूरश्रेणिभासुरा ॥६६ स्फुरच्चन्द्रकलोत्तंसमदलोलविलोचना । सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वाभरणमंडिता ॥७०
उसका मुख दर्पण के सदृश वर्तुल आभा से युक्त था तथा चुबुक और अधर पाटल थे । उसकी दांतों की पंक्ति परम शुचि-शुद्ध-विद्या स्वरूप भास्वर थीं । उनकी कान्ति कुन्द की कलियों के समान थी जिनसे चन्द्रिका सी दिखलायी दे रही थी । का आभरण स्थूल मोती से खचित नासिका था । इससे यह परमाधिक भासुर प्रतीत हो रही थी ।६४-६५। केतक के अन्तर दल के सदृश शोभित बड़े-बड़े उसके नेत्र थे । अर्ध चन्द्र की तुलना वाले मुख पर बिखरी हुई अलकों की छटा थी ।६६। पालीवतंस माणिक्य के कुण्डलों से उसके दोनों कर्ण विभूषित हो रहे थे । उसके मुख में ताम्बूल की वीटिका थी जो नव कर्पूर और कस्तूरी के रस से आमोदित थी ।६७। शरत्कालीन चन्द्रमा के मण्डल के समान उसका परम मधुरमुख था । उसके भाल पर स्फुरित कस्तूरी का तिलक था और ऊपर शिर पर नीलाभ केशों का जूड़ा था ।६८। वह सीमान्त रेखा से विन्यस्त सिन्दूर की श्रेणी से परम भासुर भी अर्थात् मध्य में सीधी केशों में सिन्दूर की रेखा विराजमान थी ।६६। स्फुरित चन्द्र की कला के उत्तंस मद से चञ्चल नेत्रों वाली थी । वह सम्पूर्ण शृंगार के वेष से समन्वित तथा अंगों के समस्त आभरणों से समलंकृत थी ।७०।
तामिमां कंदुकक्रीडालोलामालोलभूषणम् । दृष्ट्वा क्षिप्रमुमां त्यक्त्वा सोऽन्वधावदयेश्वरः ॥७१
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८३
उमापि तं समावेक्ष्य धावंतं चात्मशः प्रियम् । स्वात्मानं स्वात्मसौन्दर्यं निंदंती चातिविस्मिता । तस्थावाङ्मुखी तूष्णीं लज्जासूयासमन्विता ॥७२ गृहीत्वा कथमप्येनामालिंलिंग मुहुर्मुहुः । उद्धूयोद्धूय साप्येवं धावति स्म सुदूरतः ॥७३ पुनर्गृहीत्वा तामीशः कामं कामवशीकृतः । आश्लिष्टं चातिवेगेन तद्वीर्यं प्रच्युतं तदा ॥७४ ततः समुत्थितो देवो महाशास्ता महाबलः । अनेककोटिदंत्येंद्रगर्वनिर्वापणक्षमः ॥७५ तद्वीर्यंबिंदुसंस्पर्शात्सा भूमिस्तत्र तत्र च । रजतस्वर्णवर्णभूल्लक्षणाद्विष्यमर्दन ॥७६ तथैवांतर्दधे सापि देवता विश्वमोहिनी । निवृत्तः स गिरीशोऽपि गिरि गौरीसखो ययौ ॥७७
वह एक कन्दुक से क्रीड़ा कर रही थी अर्थात् बार-बार गेंद को उछाल रही थी जिससे उसके सर्वाङ्ग भूषण भी समालोलित हो रहे थे । ऐसी उस रूप लावण्य एवं मादक यौवन से सुसम्पन्ना सुन्दरी को अवलोकित करके शिव ने पार्वती का त्याग कर दिया था और शीघ्र ही उस सुन्दरी को पकड़ कर आलिङ्गन करने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़े थे । यद्यपि शिव अखिलेश्वर थे तो भी उसके सौन्दर्य को निरख कर विमोहित हो गये थे ।७१। उमा देवी ने जब अपने प्रिय पति को उसके पीछे दौड़ते हुए देखा था तो वह अपने आपको और अपनी सुन्दरता को भी हेय समझते हुए वह बहुत ही विस्मित हो गयी थी । विस्मय यही था कि परम ज्ञानी योगेश्वर को यह क्या कामदेव का अद्भुत विकार उत्पन्न हो गया है जब कि मैं सुन्दरी पत्नी भी समीप में विद्यमान हूँ । उस समय में उमा देवी लज्जा और असूया से युक्त होकर चुपचाप नीचे की ओर मुख करके स्थित हो गयी थीं ।७२। शिवजी ने किसी भी प्रकार से इसको पकड़ लिया था और बार-बार आलिङ्गन किया था किन्तु वह अपने आपको छुड़ा-छुड़ाकर बहुत दूर भागती चली जा रही थी ।७३। काम के वश में पड़े हुए शिव ने फिर उसको अच्छी तरह से पकड़ लिया था । उन्होंने बहुत ही वेग से आश्लेषण किया था और
१८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उसी समय में उनका वीर्य स्खलित हो गया था ॥७४। इसके अनन्तर महान बलवान और महान शासक देव उठकर खड़े हुए थे, जो कि बहुत से करोड़ों दैत्येन्द्रों के निर्वापण करने में समर्थ थे ॥७५। शिवजी के वीर्य के संस्पर्श से वहाँ-वहाँ पर जो बिन्दुओं का पात हुआ था उससे हे विन्ध्य मर्दन ! वह भूमि रजत और सुवर्ण के वर्ण वाली हो गयी थी ॥७६। उसी समय में वहीं पर वह विश्व मोहिनी देवता तिरोहित हो गयी थी । फिर निवृत्त हुए गिरीश भी अपनी गौरी के साथ कैलास पर चले गये थे ॥७७।
अथाद्भुतमिदं वक्ष्ये लोपामुद्रापते श्रृणु ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं ममैव हृदये स्थितम् ॥७८
पुरा भंडासुरो नाम सर्वदैत्यशिखामणिः ।
पूर्वं देवान्बहुविधान्यः शास्ता स्वेच्छया पटुः ॥७९
विशुक्रं नाम दैतेयं वर्गसंरक्षणक्षमम् ।
शुक्रतुल्यं विचारज्ञं दक्षांशेन ससर्ज सः ॥८०
वामांसेन विषांगं च सृष्टवान्दुष्टशेखरम् ।
धूमिनिनामधेयां च भगिनीं भंडदानवः ॥८१
भ्रातृभ्यामुग्रवीर्याभ्यां सहितो निहताहितः ।
ब्रह्मांडं खंडयामास शौर्यवीर्यसमुच्छितः ॥८२
ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च तं दृष्ट्वा दीप्ततेजसम् ।
पलायनपराः सद्यः स्वे स्वे धाम्नि सदा वसन् ॥८३
तदानीमेव तद्बाहुसंमर्द्दनविमूर्च्छिताः ।
श्वसितुं चापि पटवो नाभवन्नाकिनां गणाः ॥८४
इसके अनन्तर हे लोपा मुद्रापते ! मैं एक अति अद्भुत बात बतलाऊँगा । उसका आप श्रवण कीजिए । जिसको मैंने किसी को भी अब तक नहीं कहा था और यह मेरे हृदय में ही स्थित है ॥७८। बहुत पुराने समय में भण्डासुर नामक दैत्य था जो समस्त दैत्यों का शिरोमणि था । वह इतना कुशल था कि उसने पहिले अपनी ही इच्छा से बहुत से देवों का शास्ता हुआ था ॥७९। उसने विशुक्र नाम वाले दैतेय को जो सबके संरक्षण में समर्थ था । वह शुक्र के ही समान विचारज्ञ था उसको दक्ष के अंश से उसने सृजन किया
मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८५
था ।८०। उसने वामांश से दुष्ट शिरोमणि विशाङ्ग को सृजित किया था। भण्ड दानव ने धूमिनी नाम वाली घेया भगिनी का भी सृजन किया था। ।८१। उग्रवीर्य वाले भाइयों के साथ अपने अहित को निहित करने वाला था। शौर्य और वीर्य से समुच्छ्रित उसने पूर्ण ब्रह्माण्ड को खण्डित कर दिया था ।८२। ब्रह्मा, विष्णु और महेश दीप्त तेज वाले उसको देखकर ही भागने में तत्पर हो गये थे और तुरन्त ही अपने-अपने धाम में ही उसकी भुजा के द्वारा संमर्दन से बेहोश हुए देवों के गण श्वास लेने में भी कुशल नहीं हुए थे। अर्थात् श्वास भी न ले सके थे ।८३-८४।
केचित्पातालगर्भेषु केचिदंबुधिवारिषु ।
केचिद्दिगंतकोणेषु केचित्कुञ्जेषु भूभृताम् ॥८५
विलीना भृशवित्रस्तास्त्यक्तदारसुतस्त्रियः ।
भ्रष्टाधिकारा ऋभवो विचेरुश्छन्नवेषकाः ॥८६
यक्षान्महोरगान्त्सिद्धान्साध्यान्समरदुर्मदान् ।
ब्रह्माणं पद्मनाभं च रुद्रं वज्रिणमेव च ।
मत्वा तृणायितान्सर्वाल्लोकान्भंडः शशास ह ॥८७
अथ भंडासुरं हंतुं त्रैलोक्यं चापि रक्षितुम् ।
तृतीयमुदभूद्रूपं महायागानलान्मुने ॥८८
यद्रूपशालिनीमाहुर्ललितां परदेवताम् ।
पाशांकुशधनुर्बाणपरिष्कृतचतुर्भुजाम् ॥८९
सा देवी परमा शक्तिः परब्रह्मस्वरूपिणी ।
जघान भंडदैत्येन्द्रं युद्धे युद्धविशारदा ॥९०
जब स्वर्ग लोक में देवों में भगदड़ मची थी तो उनमें से कुछ तो पाताल लोक में भागकर जा छिपे थे—कुछ महासागर के जल में चले गये थे—कुछ दूर दिशाओं के छोर में चले गये थे और कुछ पर्वतों की कुञ्जों में चले गये थे ।८५। वे सब बहुत ही भयभीत होते हुए अपने सुत दारा और स्त्रियों को वहीं पर ही छोड़ कर परम समर्थ भी अधिकारों से भ्रष्ट होकर छिपे हुए वेष में इधर-उधर विचरण करने लगे थे ।८६। यक्ष-महोरग-सिद्ध-साध्य सबको जो समर के बड़े दुर्मद थे तथा ब्रह्मा-रुद्र और विष्णु को भी, समस्त लोकों को तिनके के समान समाचरण वाले समझकर वह भण्ड ही
१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सब पर शासन करने लगा था ।८७। हे मुने ! इसके अनन्तर उस महान बली भण्डासुर का हनन करने के लिए तथा तीनों लोकों की संरक्षा करने के वास्ते महायाग की अग्नि से एक तीसरा ही स्वरूप समुद्भूत हुआ था ।८८। जिस स्वरूप के धारण करने वाली को ललिता नाम से लोग कहा करते थे जो पर देवता थी । उसके चारों करों में पाश—अंकुश—धनुष और बाण ये आयुध थे ।८६। वह देवी परमाधिक शक्ति वाली थी और वह साक्षात् पर-ब्रह्म के स्वरूप वाली थी । युद्ध करने में महा विशारद उसने उस भण्ड दैत्येन्द्र को युद्ध में मार गिराया था ।६०।
भण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन
अगस्त्य उवाच-
कथं भंडासुरो जातः कथं वा त्रिपुरांबिका ।
कथं बभंज तं संख्ये तत्सर्वं वद विस्तरात् ॥१
हयग्रीव उवाच
पुरा दाक्षायणीं त्यक्त्वा पितुर्यज्ञविनाशनम् ॥२
आत्मानमात्मना पश्यञ्ज्ञानानन्दसात्मकः ।
उपास्यमानो मुनिभिरद्वन्द्वगुणलक्षणः ॥३
गङ्गाकूले हिमवतः पर्यन्ते प्रविवेश ह ।
सापि शङ्करमाराध्य चिरकालं मनस्विनी ॥४
योगेन स्वां तनुं त्यक्त्वा सुतासीद्धिमभूभृतः ॥५
स शैलो नारदाच्छ्रुत्वा रुद्राणीति स्वकन्यकाम् ।
तस्य शुश्रूषणार्थाय स्थापयामास चांतिके ॥६
एतस्मिन्नन्तरे देवास्तारकेण हि पीडिताः ।
ब्रह्मणोक्ताः समाहूय मदनं चेदमब्रुवन् ॥७
अगस्त्य मुनि ने कहा—यह भण्डासुर कैसे समुत्पन्न हुआ था अथवा यह त्रिपुराम्बिका देवी कैसे प्रादुर्भूत हुई थी । उसने समरांगण में उस महा-दैत्य को कैसे मारा था—यह सम्पूर्ण वृत्त मेरे सामने विस्तार के साथ वर्णन
भण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८७
कीजिए। १। हयग्रीव जी ने कहा-पहिले दाक्षायणी का त्याग करके पिता के यज्ञ का विध्वंस हुआ था ।२। अपनी आत्मा से आत्मा को देखते हुए ज्ञान और आनन्द के रस के स्वरूप वाले जो कि अद्वन्द्व गुण के लक्षण वाले थे- मुनिगणों के द्वारा उपास्यमान थे।३। वे प्रभु उस समय में हिमवान् पर्वत के अन्दर एक भीतरी भाग में प्रवेश कर गये थे। उस मनस्विनी ने भी बहुत लम्बे समय तक भगवान् शंकर की समाराधना की थी।४। उस जगदम्बा ने भी योग के द्वारा अपने कलेवर का त्याग कर दिया था और फिर वह हिमवान् गिरिराज की पुत्री होकर प्रादुर्भूत हुई थी।५। उस शैल राज ने देवर्षि नारद जी से यह सुना था कि उसकी कन्या साक्षात् रुद्राणी होगी। अतएव उस हिमवान् ने उस अपनी कन्या को समीप में ही भगवान् शिवकी शुश्रूषा करने के लिए स्थापित कर दिया था। अर्थात् शिव की आराधना करने की आज्ञा दे दी थी।६। इसी बीच में तारक नामक महा दैत्य के द्वारा देवों को उत्पीड़ित किया गया था। ब्रह्माजी से जब देवों ने प्रार्थनाकी थी तो उन्होंने कामदेव को बुलाया था और उससे यह कहा था।७।
सर्गादौ भगवान्ब्रह्मा सृजमानोऽखिलाः प्रजाः ।
न निर्वृतिरभूतस्य कदाचिदपि मानसे ।
तपश्चचार सुचिरं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥८
ततः प्रसन्नो भगवान्सलक्ष्मीको जनार्दनः ।
वरेण च्छंदयामास वरदः सर्वदेहिनाम् ॥९
ब्रह्मोवाच-
यदि तुष्टोऽसि भगवन्ननायासेन वै जगत् ।
चराचरयुतं चैतत्सृजामि त्वत्प्रसादतः ॥१०
एवमुक्तो विधात्रा तु महालक्ष्मीमुदैक्षत ।
तदा प्रादुरभूस्त्वं हि जगन्मोहनरूपधृक् ॥११
तवायुधार्थं दत्तं च पुष्पवाणेषुकार्मुकम् ।
विजयत्वमजेयत्वं प्रादात्प्रमुदितो हरिः ॥१२
असौ सृजति भूतानि कारणेन स्वकर्मणा ।
साक्षिभूतः स्वजनतो भवान्भजतु निर्वृतिम् ॥१३
१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एष दत्तवरो ब्रह्मा त्वयि विन्यस्य तद्भरम् । मनसो निवृत्तिं प्राप्य वर्ततेऽद्यापि मन्मथ ॥१४॥
जब इस जगत् का सृजन आरम्भ किया था उसके आदि काल में भगवान् ब्रह्माजी ने समस्त प्रजाका सृजन करना चाहा था किन्तु उनके मन में किसी भी समय में सन्तोष नहीं हुआ था । तब उन्होंने बहुत समय पर्यन्त मन-वाणी और शरीर से तपश्चर्या की थी ।८। तब भगवान् उन पर परम प्रसन्न हुए थे जो कि जनार्दन प्रभु अपनी प्रिया लक्ष्मी के ही साथ में आकर प्रसन्न हो गये थे । समस्त देहधारियों को वर देने वाले प्रभु ने उनको भी वरदान देकर सन्तुष्ट किया था ।६। ब्रह्माजी ने प्रार्थना की थी—हे भगवन् ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वरदान दीजिए कि मैं बिना ही किसी आयास के इस चराचर जगत् का आपकी कृपा से सृजन कर दूँ ।१०। जब इस रीति से ब्रह्माजी ने प्रार्थना की थी तो उन्होंने महालक्ष्मी की ओर देखा था । उसी समय में आप प्रादुर्भूत हुए थे जो कि इस जगत् को मोहित करने वाले स्वरूप को धारण करने वाले थे ।११। आपके आयुध के लिये उन्होंने आपको इक्षु का धनुष और पुष्पों का वाण प्रदान किया था । परम प्रसन्न हरि ने विजयी होना भी प्रदान किया था ।१२। यही कामदेव भूतों का सृजन अपने ही कर्म के कारण के द्वारा किया करेगा । आप अपने जन से साक्षिभूत होकर निवृत्ति का समाश्रय ग्रहण करें। कामदेव ही आपके सृजन का कार्य करता रहेगा ।१३। ब्रह्माजी को यह वरदान जब दिया गया था तो उन्होंने सृजन का सब भार तुम पर छोड़कर हे मन्मथ ! ब्रह्माजी सन्तुष्ट होकर आज भी स्थित हैं ।१४।
अमोघं बलवीर्यं ते न ते मोघः पराक्रमः ॥१५॥ सुकुमाराण्यमोघानि कुसुमास्त्राणि ते सदा । ब्रह्मदत्तवरोऽयं हि तारको नाम दानवः ॥१६॥ बाधते सकलाँल्लोकानस्मानपि विशेषतः । शिवपुत्रादृतेऽन्यत्र न भयं तस्य विद्यते ॥१७॥ त्वां विनास्मिन्महाकार्ये न कश्चित्प्रवदेदपि । स्वकराच्च भवेत्कार्यं भवतो नान्यतः क्वचित् ॥१८॥ आत्मैक्यध्याननिरतः शिवो गौर्या समन्वितः ।
भण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन ] | १८६
हिमाचलतले रम्ये वर्तते मुनिभिर्वृतः ॥१६ तं नियोजय गौर्यां तु जनिष्यति च तत्सुतः । ईषत्कार्यमिदं कृत्वा त्रायस्वास्मान्महाबल ॥२० एवमभ्यर्थितो देवैः स्तूयमानो मुहुर्मुहुः । जगामात्मविनाशाय यतो हिमवतस्तटम् ॥२१
आपका बलवीर्य तो अमोघ है और आपका पराक्रम भी मोघ नहीं है ।१५। आपके अस्त्र भी कुसुम परम सुकुमार है तथा वे सदा ही अमोघ हैं। अब यह तारक नाम का दानव ब्रह्माजी के ही द्वारा वरदान प्राप्त कर लेने वाला है ।१६। यह समस्त लोकों को बाधा दे रहा है और हमको तो विशेष रूप से सता रहा है। इसको भगवान् शिव के पुत्र के विना अन्य किसी से भी कुछ भय नहीं है अर्थात् इसका वध शिव का ही पुत्र कर सकता है ।१७। यह एक महान् कार्य है। आपके बिना कोई भी अन्य इसको नहीं कर सकता है चाहे किसी से भी कहा जावे। यह तो आपके ही अपने कर से होगा और अन्य किसी से भी कभी नहीं हो सकता है ।१८। आत्मा की एकता के ध्यान में निरत भगवान् शिव इस समय में है और गौरी भी वहाँ पर विद्यमान हैं ये परम रम्य हिमाचल के तल में है और मुनिगण से घिरे हैं ।१६। हे महान् बलवाले ! आप उन शिव को गौरी में नियोजित कर दो। उस का सुत जन्म धारण करेगा। यह एक छोटा सा हमारा कार्य है। इस को आप करके हमारी सुरक्षा कीजिए ।२०। इस तरह से देवों के द्वारा कामदेव से बार-बार प्रार्थना की गयी थी और बहुत स्तवन भी उसका किया गया था। तब वह अपनी आत्मा के विनाश के लिए वहाँ से कामदेव हिमवान् के तट पर गया था ।२१।
किमप्याराधयंतं तु ध्यानसंमीलितेक्षणम् । ददर्शेशानमासीनं कुसुमेषुरुदायुधः ॥२२ एतस्मिन्नन्तरे तत्र हिमवत्तनया शिवम् । आरिराधयिषुश्चागाद्विभ्राणा रूपमद्भुतम् ॥२३ समेत्य शम्भुं गिरिजां गंधपुष्पोपहारकैः । शुश्रूषणपरां तत्र ददर्शातिबलः स्मरः ॥२४
१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अदृश्यः सर्वभूतानान्नातिदूरेऽस्य संस्थितः । सुमनोमार्गणेरग्र्यै स्स विव्याध महेश्वरम् ॥२५
विस्मृत्य स हि कार्याणि वाणविद्धोऽन्तिके स्थिताम् । गौरीं विलोकयामास मन्मथाविष्टचेतनः ॥२६
धृतिमालंब्य तु पुनः किमेतदिति चिंतयन् । ददर्शाग्रे तु सन्नद्धं मन्मथं कुसुमायुधम् ॥२७
तं दृष्ट्वा कुपितः शूली त्रैलोक्यदहनक्षमः । तार्तीयं चक्षुरुन्मील्य ददाह मकरध्वजम् ॥२८
कुसुमों के वाणों वाले आयुध लिये हुए कामदेव ने वहाँ पर भगवान् शिव को देखा था जो कुछ काल समाराधना करके ध्यान में नेत्रों को बन्द किये हुए समाधिस्थ संस्थित थे ।२२। इसी बीच में यह भी उसने देखा था कि हिमवान् की पुत्री पार्वती भी भगवान् शिव की आराधना की इच्छा वाली वहाँ पर आ गयी थी जो अत्यद्भुत स्वरूप से सुसम्पन्न थी ।२३। अति बलवान् मदन ने वहाँ देखा था कि यह पार्वती शम्भु के समीप में पहुँच कर गन्ध-पुष्प और उपहारों के द्वारा शिव की शुश्रूषा में संलग्न थी ।२४। वह मदन समस्त प्राणियों के द्वारा अदृश्य था और उनके समीप में ही संस्थित होकर उसने अत्युत्तम पुष्पों के वाणों से महेश्वर के हृदय को बेधा था ।२५। मन्मथ के द्वारा आविष्ट चेतना वाले उस भगवान् शिव ने समस्त ध्यान करने के कार्यों को भुलाकर काम के बाणों से विद्ध होकर समीप में स्थित गौरी की ओर देखा था ।२६। फिर उन्होंने धैर्य का समाश्रय ग्रहण किया था और मन में चिन्तन कर रहे थे कि यह विकार क्यों और कैसे हो रहा है । उसी समय में उन्होंने देखा था कि कामदेव कुसुमों के आयुध वाला आगे सन्नद्ध है ।२७। उसको देखकर त्रिशूली प्रभु बहुत ही क्रुद्ध हो गये थे जो कि तीनों लोकों को दग्ध कर देने में समर्थ थे । उन्होंने अपना मस्तक में स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया था और उसी क्षण में मकरध्वज को भस्मसात् कर दिया था ।२८।
शिवेनेवमवज्ञाता दुःखिता शैलकन्यका । अनुज्ञया ततः पित्रोस्तपः कर्तुं मगाद्वनम् ॥२९
तद्भस्मना तु पुरुषं चित्राकारं चकार सः ॥३० तं विचित्रतनुं रुद्रो ददर्शाग्रे तु पूरुषम् । तत्क्षणाज्जात जीवोऽभून्मूर्तिमानिव मन्मथः । महाबलोऽतितेजस्वी मध्याह्नार्कसमप्रभः ॥३१ तं चित्रकर्मा बाहुभ्यां समालिङ्ग्य मुदान्वितः । स्तुहि बाल महादेवं स तु सर्वार्थसिद्धिदः ॥३२ इत्युक्त्वा शतरुद्रीयमुपादिशदमेयधीः । ननाम शतशो रुद्रं शतरुद्रियमजपन् ॥३३ ततः प्रसन्नो भगवान्महादेवो वृषध्वजः । वरेण च्छंदयामास वरं वव्रे स बालकः ॥३४ प्रतिद्वन्द्विबलाथं तु मद्बलेनोपयोक्ष्यति । तदस्त्रमुख्यानि वृथा कुर्वन्तु नो मम ॥३५
शिव के द्वारा अवज्ञात हुई शैल कन्या बहुत ही दुःखित हुई थी । फिर माता-पिता की आज्ञा से वह तपश्चर्या करने के लिए वन में चली गयी थी । इसके उपरान्त उस कामदेव की भस्म को देखकर गणेश्वर चित्रकर्मा उस भस्म से चित्र के आकार वाला पुरुष कर दिया था ।३०। भगवान् रुद्र ने विचित्र शरीर वाले पुरुष को अपने आगे देखा था । उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था । वह उसी क्षण में समुत्पन्न जीव वाला होगया था और ऐसा सुन्दर था मूर्तिमान् साक्षात् मन्मथ ही होंगे । वह महान् बलवाला और अत्यन्त मध्याह्न के सूर्य की सी प्रभा वाला तेजस्वी था ।३१। चित्रकर्मा ने उसका अपनी बाहुओं से आलिङ्गन किया था और बहुत प्रसन्न हुआ था । चित्रकर्मा ने उससे कहा था हे बाल ! भगवान् शिव की स्तुति करो क्योंकि वे समस्त अर्थों की सिद्धि के दाता है ।३२। यह कहकर उस अमेय बुद्धि वाले ने उसको शत रुद्रीय का उपदेश दे दिया था उसने शतरुद्रिय का जाप करते हुए सौ बार भगवान् रुद्र को प्रणाम किया था ।३३। इसके अनन्तर वृषध्वज महादेव जी परम प्रसन्न हुए थे । उन्होंने वरमाँगने की आज्ञा दी थी और उस बालक ने यह वरदान माँगा
१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
था। ३४। मेरे प्रतिद्वन्द्वी के बल के लिए मेरे बल से योजित करेंगे और उस मेरे प्रतिद्वन्द्वी के जो भी अस्त्र-शस्त्र होंगे वे व्यर्थ हो जायेंगे और मेरे नहीं होंगे। ३५।
तथेति तत्प्रतिश्रुत्य विचार्य किमपि प्रभुः । षष्टिवर्षसहस्राणि राज्यमस्मै ददौ पुनः ॥३६ एतद्दृष्ट्वा तु चरितं धाता भंडिति भंडिति । यदुवाच ततो नाम्ना भंडो लोकेषु कथ्यते ॥३७ इति दत्त्वा वरं सर्वैर्मुनिगणैर्वृतः । दत्त्वाऽस्त्राणि च शस्त्राणि तत्रैवांतरधाच्च सः ॥३८
ऐसा ही सब होगा—यह कहकर फिर प्रभु ने कुछ विचार करके साठ सहस्र वर्ष तक इसको राज्य भी दे दिया था। ३६। इस चरित को देखकर धाता ने भण्डिति-भण्डिति—यह कहा था इसीलिये वह लोक में भण्ड—इस नाम से ही कहा जाया करता है। ३७। यह वरदान उस को देकर मुनिगणों से समावृत वह अस्त्र देकर वहाँ पर ही तिरोहित हो गये थे। ३८।
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन
रुद्रकोपानलाज्जातो यतो भण्डो महाबलः । तस्माद्रौद्रस्वभावो हि दानवश्चाभवत्ततः ॥१ अथागच्छन्महातेजाः शुक्रो दैत्यपुरोहितः । समायाताश्च शतशो दैतेयाः सुमहाबलाः ॥२ अथाहूय मयं भंडो दैत्यवंश्यादिशिल्पिनम् । नियुक्तो भृगुपुत्रेण निजगादार्थं वद्वचः ॥३ यत्र स्थित्वा तु दैत्येन्द्रैस्त्रैलोक्यं शासितं पुरा । तद्गत्वा शोणितपुरं कुरुष्व त्वं यथापुरम् ॥४ तच्छ्रुत्वा वचनं शिल्पी स गत्वाथ पुरं महत् । चक्रेऽमरपुरप्रख्यं मनसैवेक्षणेन तु ॥५ अथाभिषिक्तः शुक्रेण दैतेयैश्च महाबलैः । शुशुभे परया लक्ष्म्या तेजसा च समन्वितः ॥६
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६३
हिरण्याय तु यद्दत्तं किरीटं ब्रह्मणा पुरा ।
सजीवमविनाश्यं च दैत्येन्द्रै रपि भूषितम् ।
दधौ भृगुसुतोत्सृष्टं भंडो बालार्कसन्निभम् ॥७
क्योंकि भण्ड भगवान् रुद्र की कोपाग्नि से समुत्पन्न हुआ था अत एव वह महा बलवान् था और उसका स्वभाव भी परम रौद्र हुआ था । ऐसा ही यह दानव था ।१। इसके पश्चात् महा तेजस्वी दैत्यों के पुरोहित शुक्राचार्य वहाँ पर आये थे और सैकड़ों महाबली दैतेय भी समागत हुए थे ।२। इसके उपरान्त भण्ड ने दैत्यों के वंश में होने वाले आदि शिल्पी मय को बुलाया था । भृगु के पुत्र के द्वारा नियुक्त होते हुए उसने उस शिल्पी से अर्थ युक्त वचन कहा था ।३। जहाँ पर स्थित होकर पहिले दैत्यों के स्वामी ने त्रैलोक्य का शासन किया था वहाँ पर जाकर जैसा भी पुर होता है वैसा शोणित पुर का निर्माण करो ।४। यह वचन श्रवण करके उस शिल्पी ने जाकर एक महान पुर की रचना की थी । वह पुर मन से ही ईक्षण के द्वारा अमरपुर के समान था ।५। इसके अनन्तर शुक्राचार्य के द्वारा तथा महाबली दैत्यों के साथ अभिषेक किया गया था । वह परोत्कृष्ट लक्ष्मी से शोभित हुआ था तथा तेज से भी समन्वित था ।६। पहिले हिरण्य के लिए जो किरीट ब्रह्माजी ने प्रदान किया था वह सजीव और विनाशन होने के योग्य था तथा दैत्येन्द्रों के भी द्वारा भूषित था । उसको भृगु सुत के द्वारा उत्सृष्ट जो था भण्ड ने धारण किया था । यह किरीट बाल सूर्य के ही सदृश था । इसके उपरान्त वह सिंहासन पर समासीन हुआ था और सभी आभरणों से विभूषित हुआ था ।७।
चामरे चन्द्रसंकाशे सजीवे ब्रह्मनिर्मिते ।
न रोगो न च दुःखानि संदधौ यन्निषेवणात् ॥८
तस्यातपत्रं प्रददौ ब्रह्मणैव पुरा कृतम् ।
यस्य च्छायानिषण्णास्तु बाध्यंते नास्त्रकोटिभिः ॥६
धनुश्च विजयं नाम शंखं च रिपुघातिनम् ।
अन्याम्यपि महार्हाणि भूषणानि प्रदत्तवान् ॥१०
तस्य सिंहासनं प्रादादक्षयं सूर्यसन्निभम् ।
ततः सिंहासनासीनः सर्वाभरणभूषितः ।
बभूवातीव तेजस्वी रत्नमुत्तेजितं यथा ॥११
१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
बभूवुरथ दैतेयास्तयाष्टौ तु महाबलाः । इन्द्रशत्रु रमित्रघ्नो विद्युन्माली विभीषणः । उग्रकर्माग्रधन्वा च विजयश्रुतिपारगः ॥१२ सुमोहिनी कुमुदिनी चित्रांगी सुन्दरी तथा । चतस्रो वनितास्तस्य बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥१३ तमसेवंत कालज्ञा देवाः सर्वे सवासवाः । स्यंदनास्तुरगा नागाः पादाताश्च सहस्रशः ॥१४
दो चमर भी चन्द्रमा के समान थे जो सजीव थे और ब्रह्माजी के ही द्वारा निर्मित हुए थे । इसके निषेवण करने का यह प्रभाव था कि सेवन करने वाले कोई भी रोग और दुःख नहीं हुआ करता था । उनको भी इसने धारण किया था ।८। उसका जो आतपत्र (छत्र) भी पहिले ही निर्मित किया हुआ ब्रह्माजी ने ही प्रदान किया था जिसकी छाया में जो भी उपविष्ट होते हैं उनको करोड़ों अस्त्र भी कुछ बाधा नहीं दिया करते हैं ।६। विजय नामक धनुष और रिपुओं का घात करने वाला शंख था । उनके अतिरिक्त अन्य-अन्य भी बहुत कीमती भूषण प्रदान किये थे ।१०। उसको जो सिंहासन प्रदान किया था वह अक्षय था और सूर्य के समान था उस पर वह बैठकर उत्तेजित रत्न के ही सदृश अतीव तेजस्वी हो गया था ।११। उसके आठ दैतेय महा बलवान हुए थे—उनके नाम ये थे—इन्द्र शत्रु—अमित्रघ्न—विद्युन्माली—विभीषण—उग्र कर्मा—उग्रधन्वा—विजय—श्रुतिपारग ।१२। उसकी चार प्रिय दर्शन वाली पत्नियां थी जिनके नाम ये हैं—सुमोहिनी—कुमुदिनी—चित्रांगी और सुन्दरी ।१३। काल के ज्ञान रखने वाले इन्द्र के सहित सभी देवगणों ने उसकी सेवा की थी । उसके पास सहस्रों ही रथ—अश्व—गज और पदाति सैनिक थे ।१४।
संबभूवुर्महाकाया महांतो जितकाशिनः । बभूबुर्दानवाः सर्वे भृगुपुत्रमतानुगाः ॥१५ अर्चयंतो महादेवमास्थिताः शिवशासने । बभूवुर्दानवास्तत्र पुत्रपौत्रधनान्विताः । गृहे गृहे च यज्ञाश्च संबभूवुः समंततः ॥१६
ललिता प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १६५
ऋचो यजूंषि सामानि मीमांसान्यायकादयः ।
प्रवर्तन्ते स्म दैत्यानां भूयः प्रतिगृहं तदा ॥१७
यथाश्रमेषु मुख्येषु मुनीनां च द्विजन्मनाम् ।
तथा यज्ञेषु दैत्यानां बुभुजुर्हव्यभोजिनः ॥१८
एवं कृतवतोऽप्यस्य भंडस्य जितकाशिनः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि व्यतीतानि क्षणार्धवत् ॥१९
वर्धमानमथो दैत्यं तपसा च बलेन च ।
हीयमानबलं चेन्द्रं संप्रेक्ष्य कमलापतिः ॥२०
ससर्ज गहसा कांचिन्मायां लोकविमोहिनीम् ।
तामुवाच ततो मायां देवदेवो जनार्दनः ॥२१
उसके सभी दानव भृगुपुत्र के मत का अनुगमन करने वाले थे और इन सबके कलेवर बहुत विशाल थे और ये जितकाशी थे ।१५। ये सबके सब महादेवजी का अर्चन किया करते थे और सर्वदा शिव के ही शासन में समास्थित रहते थे। वहाँ पर जो भी दानव गण थे वे सब पुत्रों-पौत्रों और धन से सम्पन्न थे और घर-घर में चारों ओर यज्ञ हुआ करते थे ।१६। ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद-मीमांसा और न्याय शास्त्र आदि समस्त वेद और शास्त्र उस समय में प्रत्येक घर में पुनः प्रवृत्त हो गये थे ।१७। मुनियों के और द्विजों के मुख्य आश्रमों में तथा यज्ञों में जो कि दैत्यों के थे हव्य के भोजन करने वाले भोजन किया करते थे ।१८। इस रीति से करने वाले जित काशी भंड के सहस्र वर्ष आधे क्षण के ही समान व्यतीत हो गये थे ।१९। तप से और बल के द्वारा बढ़ते हुए इस भण्ड दैत्य को और क्षीण होने वाले बल से मुक्त इन्द्र को देखकर कमलापति ने माया के रचना करने का विचार किया था ।२०। और तुरन्त ही लोकों का विमोहन करने वाली कोई एक माया का सृजन किया था । फिर देवों के भी देव जनार्दन प्रभु ने उस माया से कहा था ।२१।
त्वं हि सर्वाणि भूतानी मोहयंती निजौजसा ।
विचरस्व यथाकामं त्वां न ज्ञास्यति कश्चन ॥२२
त्वं तु शीघ्रमितो गत्वा भंडं दैत्यनायकम् ।