भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उसी समय में उनका वीर्य स्खलित हो गया था ॥७४। इसके अनन्तर महान बलवान और महान शासक देव उठकर खड़े हुए थे, जो कि बहुत से करोड़ों दैत्येन्द्रों के निर्वापण करने में समर्थ थे ॥७५। शिवजी के वीर्य के संस्पर्श से वहाँ-वहाँ पर जो बिन्दुओं का पात हुआ था उससे हे विन्ध्य मर्दन ! वह भूमि रजत और सुवर्ण के वर्ण वाली हो गयी थी ॥७६। उसी समय में वहीं पर वह विश्व मोहिनी देवता तिरोहित हो गयी थी । फिर निवृत्त हुए गिरीश भी अपनी गौरी के साथ कैलास पर चले गये थे ॥७७।

अथाद्भुतमिदं वक्ष्ये लोपामुद्रापते श्रृणु ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं ममैव हृदये स्थितम् ॥७८
पुरा भंडासुरो नाम सर्वदैत्यशिखामणिः ।
पूर्वं देवान्बहुविधान्यः शास्ता स्वेच्छया पटुः ॥७९
विशुक्रं नाम दैतेयं वर्गसंरक्षणक्षमम् ।
शुक्रतुल्यं विचारज्ञं दक्षांशेन ससर्ज सः ॥८०
वामांसेन विषांगं च सृष्टवान्दुष्टशेखरम् ।
धूमिनिनामधेयां च भगिनीं भंडदानवः ॥८१
भ्रातृभ्यामुग्रवीर्याभ्यां सहितो निहताहितः ।
ब्रह्मांडं खंडयामास शौर्यवीर्यसमुच्छितः ॥८२
ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च तं दृष्ट्वा दीप्ततेजसम् ।
पलायनपराः सद्यः स्वे स्वे धाम्नि सदा वसन् ॥८३
तदानीमेव तद्बाहुसंमर्द्दनविमूर्च्छिताः ।
श्वसितुं चापि पटवो नाभवन्नाकिनां गणाः ॥८४

इसके अनन्तर हे लोपा मुद्रापते ! मैं एक अति अद्भुत बात बतलाऊँगा । उसका आप श्रवण कीजिए । जिसको मैंने किसी को भी अब तक नहीं कहा था और यह मेरे हृदय में ही स्थित है ॥७८। बहुत पुराने समय में भण्डासुर नामक दैत्य था जो समस्त दैत्यों का शिरोमणि था । वह इतना कुशल था कि उसने पहिले अपनी ही इच्छा से बहुत से देवों का शास्ता हुआ था ॥७९। उसने विशुक्र नाम वाले दैतेय को जो सबके संरक्षण में समर्थ था । वह शुक्र के ही समान विचारज्ञ था उसको दक्ष के अंश से उसने सृजन किया