भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 593

मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८३

उमापि तं समावेक्ष्य धावंतं चात्मशः प्रियम् । स्वात्मानं स्वात्मसौन्दर्यं निंदंती चातिविस्मिता । तस्थावाङ्मुखी तूष्णीं लज्जासूयासमन्विता ॥७२ गृहीत्वा कथमप्येनामालिंलिंग मुहुर्मुहुः । उद्धूयोद्धूय साप्येवं धावति स्म सुदूरतः ॥७३ पुनर्गृहीत्वा तामीशः कामं कामवशीकृतः । आश्लिष्टं चातिवेगेन तद्वीर्यं प्रच्युतं तदा ॥७४ ततः समुत्थितो देवो महाशास्ता महाबलः । अनेककोटिदंत्येंद्रगर्वनिर्वापणक्षमः ॥७५ तद्वीर्यंबिंदुसंस्पर्शात्सा भूमिस्तत्र तत्र च । रजतस्वर्णवर्णभूल्लक्षणाद्विष्यमर्दन ॥७६ तथैवांतर्दधे सापि देवता विश्वमोहिनी । निवृत्तः स गिरीशोऽपि गिरि गौरीसखो ययौ ॥७७

वह एक कन्दुक से क्रीड़ा कर रही थी अर्थात् बार-बार गेंद को उछाल रही थी जिससे उसके सर्वाङ्ग भूषण भी समालोलित हो रहे थे । ऐसी उस रूप लावण्य एवं मादक यौवन से सुसम्पन्ना सुन्दरी को अवलोकित करके शिव ने पार्वती का त्याग कर दिया था और शीघ्र ही उस सुन्दरी को पकड़ कर आलिङ्गन करने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़े थे । यद्यपि शिव अखिलेश्वर थे तो भी उसके सौन्दर्य को निरख कर विमोहित हो गये थे ।७१। उमा देवी ने जब अपने प्रिय पति को उसके पीछे दौड़ते हुए देखा था तो वह अपने आपको और अपनी सुन्दरता को भी हेय समझते हुए वह बहुत ही विस्मित हो गयी थी । विस्मय यही था कि परम ज्ञानी योगेश्वर को यह क्या कामदेव का अद्भुत विकार उत्पन्न हो गया है जब कि मैं सुन्दरी पत्नी भी समीप में विद्यमान हूँ । उस समय में उमा देवी लज्जा और असूया से युक्त होकर चुपचाप नीचे की ओर मुख करके स्थित हो गयी थीं ।७२। शिवजी ने किसी भी प्रकार से इसको पकड़ लिया था और बार-बार आलिङ्गन किया था किन्तु वह अपने आपको छुड़ा-छुड़ाकर बहुत दूर भागती चली जा रही थी ।७३। काम के वश में पड़े हुए शिव ने फिर उसको अच्छी तरह से पकड़ लिया था । उन्होंने बहुत ही वेग से आश्लेषण किया था और