संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स्थूलमौक्तिकसन्नद्धनासाभरणभासुरा ॥६५ केतकांतर्दलद्रोणिदीर्घदीर्घविलोचना । अर्धेन्दुतुलिताफाले सम्यक्कॢप्ताऽलकच्छटा ॥६६ पालीवतंसमाणिक्यकुण्डलामडितश्रुतिः । नवकर्पूरकस्तूरीसामोदितवीटिका ॥६७ शरच्चारुनिशानाथमंडलीमधुरानना । स्फुरत्कस्तूरितिलका नीलकुन्तलसंहतिः ॥६८ सीमंतरेखाविन्यस्तसिंदूरश्रेणिभासुरा ॥६६ स्फुरच्चन्द्रकलोत्तंसमदलोलविलोचना । सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वाभरणमंडिता ॥७०
उसका मुख दर्पण के सदृश वर्तुल आभा से युक्त था तथा चुबुक और अधर पाटल थे । उसकी दांतों की पंक्ति परम शुचि-शुद्ध-विद्या स्वरूप भास्वर थीं । उनकी कान्ति कुन्द की कलियों के समान थी जिनसे चन्द्रिका सी दिखलायी दे रही थी । का आभरण स्थूल मोती से खचित नासिका था । इससे यह परमाधिक भासुर प्रतीत हो रही थी ।६४-६५। केतक के अन्तर दल के सदृश शोभित बड़े-बड़े उसके नेत्र थे । अर्ध चन्द्र की तुलना वाले मुख पर बिखरी हुई अलकों की छटा थी ।६६। पालीवतंस माणिक्य के कुण्डलों से उसके दोनों कर्ण विभूषित हो रहे थे । उसके मुख में ताम्बूल की वीटिका थी जो नव कर्पूर और कस्तूरी के रस से आमोदित थी ।६७। शरत्कालीन चन्द्रमा के मण्डल के समान उसका परम मधुरमुख था । उसके भाल पर स्फुरित कस्तूरी का तिलक था और ऊपर शिर पर नीलाभ केशों का जूड़ा था ।६८। वह सीमान्त रेखा से विन्यस्त सिन्दूर की श्रेणी से परम भासुर भी अर्थात् मध्य में सीधी केशों में सिन्दूर की रेखा विराजमान थी ।६६। स्फुरित चन्द्र की कला के उत्तंस मद से चञ्चल नेत्रों वाली थी । वह सम्पूर्ण शृंगार के वेष से समन्वित तथा अंगों के समस्त आभरणों से समलंकृत थी ।७०।
तामिमां कंदुकक्रीडालोलामालोलभूषणम् । दृष्ट्वा क्षिप्रमुमां त्यक्त्वा सोऽन्वधावदयेश्वरः ॥७१