भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८१

अरुणेन दुकूलेन सुस्पर्शेन तनीयसा । अलंकृतनितंबाढ्या जघनाभोगभासुरा ॥६० नवमाणिक्यसन्नद्धहेमकांचीविराजिता । नतनाभिमहावर्त्तत्रिवल्यूर्मिप्रभाझरा ॥६१ स्तनकुङ्मलहिंदोलमुक्तादामशतावृता । अतिपीवरवक्षोजभारभंगुरमध्यभूः ॥६२ शिरीषकोमलभुजा कंकणांगदशालिनी । सौर्मिकांगुलिमन्मृष्टशंखसुन्दरकंधरा ॥६३

वह बाल सूर्य के समान पाटल की आकृति वाली थी और नूतन यौवन के दर्प से समन्वित थी । उसके चरण कमलोपम कोमल और नखछद आकृष्ट पद्मराग की आभा वाले थे ।५७। यावक की श्री के विनिक्षेप से उसके चरणों में लालिमा थी जिसको वह वहन कर रही थी । उसके चरणों में परम मनोहर ध्वनि संयुक्त मञ्जीर थे ।५८। उसके जघन कामदेव वीर के तूणीर को उन्मादित करने वाले थे । उसके ऊरुस्थल करिशुण्ड-कदली की कान्ति को भी शमन करने वाले थे ।५९। यह अरुण वर्ण का बहुत ही बारीक और सुख स्पर्श वाला वस्त्र पहिने हुई थी जिसस उसके नितम्ब समलंकृत थे और वह जघनों के आभोग से परम भासुर थी ।६०। नवीन माणिक्य से बँधी हुई सुवर्ण की करधनी से विभूषित थी । उसकी नाभि नत महावर्त्त के समान थी उसके ऊपर त्रिवली की ऊर्मियों की प्रभा झलक रही थी ।६१। कलियों के आकार वाले स्तनों के हिण्डोलों पर सैकड़ों मोतियों के हार पहिने हुई थी । उसके उरोज अत्यधिक स्थूल थे और उनके भार से उसका कटिभाग झुका हुआ था ।६२। उसकी भुजाएं शिरीष के सदृश अतीव कोमल थीं जिनमें कङ्कण और अंगद धारण किये हुई थीं । उसकी अंगुलियां ऊर्मियों के समान प्रतीत हो रही थीं जो अत्यधिक पतली और कोमल थीं तथा उसकी ग्रीवा सुन्दर शंख के समान नतोन्नत थी ।६३।

मुखदर्पणवृत्ताभचुबुकापाटलाधरा । शुचिभिः पक्तिभिः शुद्धैर्विद्यद्रूपैर्विभास्वरैः ॥६४ कुन्दकुङ्मलसच्छायैर्दन्तैर्दर्शितचन्द्रिका ।