संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वातपातचलच्चारुपल्लवोत्फुल्लपुष्पकम् ।
सन्तानप्रसवमोदसन्तानाधिकवासितम् ॥५५
तत्र सर्वत्र पुष्पाढ्ये सर्वलोकमनोहरे ।
पारिजाततरोर्मूले कान्ता काचिददृश्यत ॥५६
भगवान् शिव ने भी सभी ओर अपनी दृष्टि डालते हुए देखा था तो एक पहिले जो कभी भी नहीं देखा था ऐसा परम सुन्दर उद्यान देखा था ।५०। जो ऐसा था कि प्रसून खिले हुए थे और उन पुष्पों पर मधुपों की श्रेणियां गुञ्जार करती हुई आनन्द ले रही थीं। चम्पा के पुष्पों के स्तवनों की परम रमणीय गन्ध से सभी दिशाएं सुगन्धित हो रही थीं ।५१। माकन्दों के वृन्द और माध्वीक पर मदमस्त कोकिलें उल्लसित हो रही थीं । अशोक वृक्षों के समुदायों में मयूरगण अपना अद्भुत ताण्डव नृत्य कर रहे थे ।५२। भ्रमरों की पंक्तियों की गूँज की झङ्कार से वल्लभियों की ध्वनि भी वहाँ पर पराजित हो गयी थी । पाटलों की उदार सुगन्ध से पाटली कुसुमों की उज्ज्वलता वहाँ पर भरी हुई थी ।५३। ताल की सुखद मालाओं से वह शोभित था उस उद्यान के किनारों पर बड़े-बड़े सरोवर बने हुए थे जिनमें बड़ी विशाल कमलों की शोभा से वह आराम समलंकृत था ।५४। वायु के मन्द झोंके से द्रुमों के पत्र हिल रहे थे और उन पत्रों के मध्य में विकसित पुष्पों की अपूर्व छटा विद्यमान थी । प्रसून और फलों के आमोद के विस्तार से वह अभिराम उद्यान अधिक सुवासित हो रहा था । वहाँ पर सभी जगह विकसित पुष्पों की भरमार थी और वह सभी लोगों के लिए परम मनोहर था । वहाँ पर एक पारिजात के वृक्ष के नीचे कोई एक परमाधिक सुन्दरी दिखलाई दी थी ।५५-५६।
बालार्कपाटलाकारा नवयौवनदर्पिता ।
आकृष्टपद्मरागाभा चरणाब्जनखच्छदा ॥५७
यावकश्रीविनिक्षेपपादलौहित्यवाहिनी ।
कलनिः स्वनमञ्जीरपादपद्ममनोहरा ॥५८
अनंगवीरतूणीरदर्पोन्मदनजंघिका ।
करिशुण्डाकदलिकाकान्तितुल्योरुशालिनी ॥५६