संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १७६
यद्ध्यानवैभवाल्लब्धं रूपमद्वैतमद्भुतम् ॥४८ तदेवानन्यमनसा ध्यात्वा किंचिद्विहस्य सः । तथास्त्विति तिरोऽधत्त महायोगेश्वरो हरिः ॥४६
भगवान् शिव वाहन से उतर कर पार्वती के सहित विष्णु भगवान के समीप में पहुँचे और संस्थित भगवान की बड़े आनन्द से पूजा की और अर्घ्य अर्पित किया था ।४३। भगवान अच्युत ने भवानी के पति का स्नेह के साथ गाढालिंगन किया था । विष्णु भगवान ने उनके समागमन का कारण पूछा था ।४४। महादेवजी ने भगवान से कहा—आप तो उत्तम पुरुष है और महान योगेश्वर हैं । आपने श्री सम्पन्न—सभी प्रकार के सौभाग्य से परम सुन्दर तथा सबको संमोह का पैदा करने वाला जो वाणी और मन से कभी गोचर नहीं हो सकता है कैसा स्वरूप आपने धारण किया था । उस स्वरूप का प्रदर्शन मुझे भी कृपाकर कराइए ।४५-४६। मैं आपके—उस स्वरूप का दर्शन करना चाहता हूँ जो कि शृंगार का अधिष्ठात्री देवता है । मुझे वह अवश्य दिखाना चाहिए । आप तो प्रार्थित पदार्थों के प्रदान करने वाले कामधेनु ही हैं ।४७। इस प्रकार से महादेवजी के द्वारा बराबर भगवान विष्णु की प्रार्थना की गयी थी । जिनके ध्यान के वैभव से अद्वैत और अद्भुत रूप प्राप्त किया था ।४८। उसी का अनन्यमन से ध्यान करके और कुछ हँसकर उन्होंने कहा—ऐसा ही होगा—और फिर महोयोगेश्वर हरि तिरोहित हो गये थे ।४६।
सर्वोऽपि सर्वतश्चक्षुर्मुहुर्व्यापारयन्क्वचित् । अदृष्टपूर्वमाराममभिरामं व्यलोकयत् ॥५० विकसत्कुसुमश्रेणीविनोदिमधुपालिकम् । चंपकस्तबकामोदसुरभीकृतदिक्तटम् ॥५१ माकन्दवृन्दमाध्वीकमाद्यदुल्लोलकोकिलम् । अशोकमण्डलीकांडसतांडवशिखण्डिकम् ॥५२ भृङ्गालिनवझंकारजितवल्लकिनिस्वनम् । पाटलोदारसौरभ्यपाटलीकुसुमोज्ज्वलम् ॥५३ तमालतालहिंतालकृतमालाविलासितम् । पर्यन्तदीर्घिकादीर्घपङ्कजश्रीपरिष्कृतम् ॥५४