भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मोहिनी प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८५

था ।८०। उसने वामांश से दुष्ट शिरोमणि विशाङ्ग को सृजित किया था। भण्ड दानव ने धूमिनी नाम वाली घेया भगिनी का भी सृजन किया था। ।८१। उग्रवीर्य वाले भाइयों के साथ अपने अहित को निहित करने वाला था। शौर्य और वीर्य से समुच्छ्रित उसने पूर्ण ब्रह्माण्ड को खण्डित कर दिया था ।८२। ब्रह्मा, विष्णु और महेश दीप्त तेज वाले उसको देखकर ही भागने में तत्पर हो गये थे और तुरन्त ही अपने-अपने धाम में ही उसकी भुजा के द्वारा संमर्दन से बेहोश हुए देवों के गण श्वास लेने में भी कुशल नहीं हुए थे। अर्थात् श्वास भी न ले सके थे ।८३-८४।

केचित्पातालगर्भेषु केचिदंबुधिवारिषु ।
केचिद्दिगंतकोणेषु केचित्कुञ्जेषु भूभृताम् ॥८५
विलीना भृशवित्रस्तास्त्यक्तदारसुतस्त्रियः ।
भ्रष्टाधिकारा ऋभवो विचेरुश्छन्नवेषकाः ॥८६
यक्षान्महोरगान्त्सिद्धान्साध्यान्समरदुर्मदान् ।
ब्रह्माणं पद्मनाभं च रुद्रं वज्रिणमेव च ।
मत्वा तृणायितान्सर्वाल्लोकान्भंडः शशास ह ॥८७
अथ भंडासुरं हंतुं त्रैलोक्यं चापि रक्षितुम् ।
तृतीयमुदभूद्रूपं महायागानलान्मुने ॥८८
यद्रूपशालिनीमाहुर्ललितां परदेवताम् ।
पाशांकुशधनुर्बाणपरिष्कृतचतुर्भुजाम् ॥८९
सा देवी परमा शक्तिः परब्रह्मस्वरूपिणी ।
जघान भंडदैत्येन्द्रं युद्धे युद्धविशारदा ॥९०

जब स्वर्ग लोक में देवों में भगदड़ मची थी तो उनमें से कुछ तो पाताल लोक में भागकर जा छिपे थे—कुछ महासागर के जल में चले गये थे—कुछ दूर दिशाओं के छोर में चले गये थे और कुछ पर्वतों की कुञ्जों में चले गये थे ।८५। वे सब बहुत ही भयभीत होते हुए अपने सुत दारा और स्त्रियों को वहीं पर ही छोड़ कर परम समर्थ भी अधिकारों से भ्रष्ट होकर छिपे हुए वेष में इधर-उधर विचरण करने लगे थे ।८६। यक्ष-महोरग-सिद्ध-साध्य सबको जो समर के बड़े दुर्मद थे तथा ब्रह्मा-रुद्र और विष्णु को भी, समस्त लोकों को तिनके के समान समाचरण वाले समझकर वह भण्ड ही