भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 597

भण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन ] [ १८७

कीजिए। १। हयग्रीव जी ने कहा-पहिले दाक्षायणी का त्याग करके पिता के यज्ञ का विध्वंस हुआ था ।२। अपनी आत्मा से आत्मा को देखते हुए ज्ञान और आनन्द के रस के स्वरूप वाले जो कि अद्वन्द्व गुण के लक्षण वाले थे- मुनिगणों के द्वारा उपास्यमान थे।३। वे प्रभु उस समय में हिमवान् पर्वत के अन्दर एक भीतरी भाग में प्रवेश कर गये थे। उस मनस्विनी ने भी बहुत लम्बे समय तक भगवान् शंकर की समाराधना की थी।४। उस जगदम्बा ने भी योग के द्वारा अपने कलेवर का त्याग कर दिया था और फिर वह हिमवान् गिरिराज की पुत्री होकर प्रादुर्भूत हुई थी।५। उस शैल राज ने देवर्षि नारद जी से यह सुना था कि उसकी कन्या साक्षात् रुद्राणी होगी। अतएव उस हिमवान् ने उस अपनी कन्या को समीप में ही भगवान् शिवकी शुश्रूषा करने के लिए स्थापित कर दिया था। अर्थात् शिव की आराधना करने की आज्ञा दे दी थी।६। इसी बीच में तारक नामक महा दैत्य के द्वारा देवों को उत्पीड़ित किया गया था। ब्रह्माजी से जब देवों ने प्रार्थनाकी थी तो उन्होंने कामदेव को बुलाया था और उससे यह कहा था।७।

सर्गादौ भगवान्ब्रह्मा सृजमानोऽखिलाः प्रजाः ।
न निर्वृतिरभूतस्य कदाचिदपि मानसे ।
तपश्चचार सुचिरं मनोवाक्कायकर्मभिः ॥८
ततः प्रसन्नो भगवान्सलक्ष्मीको जनार्दनः ।
वरेण च्छंदयामास वरदः सर्वदेहिनाम् ॥९
ब्रह्मोवाच-
यदि तुष्टोऽसि भगवन्ननायासेन वै जगत् ।
चराचरयुतं चैतत्सृजामि त्वत्प्रसादतः ॥१०
एवमुक्तो विधात्रा तु महालक्ष्मीमुदैक्षत ।
तदा प्रादुरभूस्त्वं हि जगन्मोहनरूपधृक् ॥११
तवायुधार्थं दत्तं च पुष्पवाणेषुकार्मुकम् ।
विजयत्वमजेयत्वं प्रादात्प्रमुदितो हरिः ॥१२
असौ सृजति भूतानि कारणेन स्वकर्मणा ।
साक्षिभूतः स्वजनतो भवान्भजतु निर्वृतिम् ॥१३

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