भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एष दत्तवरो ब्रह्मा त्वयि विन्यस्य तद्भरम् । मनसो निवृत्तिं प्राप्य वर्ततेऽद्यापि मन्मथ ॥१४॥

जब इस जगत् का सृजन आरम्भ किया था उसके आदि काल में भगवान् ब्रह्माजी ने समस्त प्रजाका सृजन करना चाहा था किन्तु उनके मन में किसी भी समय में सन्तोष नहीं हुआ था । तब उन्होंने बहुत समय पर्यन्त मन-वाणी और शरीर से तपश्चर्या की थी ।८। तब भगवान् उन पर परम प्रसन्न हुए थे जो कि जनार्दन प्रभु अपनी प्रिया लक्ष्मी के ही साथ में आकर प्रसन्न हो गये थे । समस्त देहधारियों को वर देने वाले प्रभु ने उनको भी वरदान देकर सन्तुष्ट किया था ।६। ब्रह्माजी ने प्रार्थना की थी—हे भगवन् ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यही वरदान दीजिए कि मैं बिना ही किसी आयास के इस चराचर जगत् का आपकी कृपा से सृजन कर दूँ ।१०। जब इस रीति से ब्रह्माजी ने प्रार्थना की थी तो उन्होंने महालक्ष्मी की ओर देखा था । उसी समय में आप प्रादुर्भूत हुए थे जो कि इस जगत् को मोहित करने वाले स्वरूप को धारण करने वाले थे ।११। आपके आयुध के लिये उन्होंने आपको इक्षु का धनुष और पुष्पों का वाण प्रदान किया था । परम प्रसन्न हरि ने विजयी होना भी प्रदान किया था ।१२। यही कामदेव भूतों का सृजन अपने ही कर्म के कारण के द्वारा किया करेगा । आप अपने जन से साक्षिभूत होकर निवृत्ति का समाश्रय ग्रहण करें। कामदेव ही आपके सृजन का कार्य करता रहेगा ।१३। ब्रह्माजी को यह वरदान जब दिया गया था तो उन्होंने सृजन का सब भार तुम पर छोड़कर हे मन्मथ ! ब्रह्माजी सन्तुष्ट होकर आज भी स्थित हैं ।१४।

अमोघं बलवीर्यं ते न ते मोघः पराक्रमः ॥१५॥ सुकुमाराण्यमोघानि कुसुमास्त्राणि ते सदा । ब्रह्मदत्तवरोऽयं हि तारको नाम दानवः ॥१६॥ बाधते सकलाँल्लोकानस्मानपि विशेषतः । शिवपुत्रादृतेऽन्यत्र न भयं तस्य विद्यते ॥१७॥ त्वां विनास्मिन्महाकार्ये न कश्चित्प्रवदेदपि । स्वकराच्च भवेत्कार्यं भवतो नान्यतः क्वचित् ॥१८॥ आत्मैक्यध्याननिरतः शिवो गौर्या समन्वितः ।