संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डासुर प्रादुर्भाव वर्णन ] | १८६
हिमाचलतले रम्ये वर्तते मुनिभिर्वृतः ॥१६ तं नियोजय गौर्यां तु जनिष्यति च तत्सुतः । ईषत्कार्यमिदं कृत्वा त्रायस्वास्मान्महाबल ॥२० एवमभ्यर्थितो देवैः स्तूयमानो मुहुर्मुहुः । जगामात्मविनाशाय यतो हिमवतस्तटम् ॥२१
आपका बलवीर्य तो अमोघ है और आपका पराक्रम भी मोघ नहीं है ।१५। आपके अस्त्र भी कुसुम परम सुकुमार है तथा वे सदा ही अमोघ हैं। अब यह तारक नाम का दानव ब्रह्माजी के ही द्वारा वरदान प्राप्त कर लेने वाला है ।१६। यह समस्त लोकों को बाधा दे रहा है और हमको तो विशेष रूप से सता रहा है। इसको भगवान् शिव के पुत्र के विना अन्य किसी से भी कुछ भय नहीं है अर्थात् इसका वध शिव का ही पुत्र कर सकता है ।१७। यह एक महान् कार्य है। आपके बिना कोई भी अन्य इसको नहीं कर सकता है चाहे किसी से भी कहा जावे। यह तो आपके ही अपने कर से होगा और अन्य किसी से भी कभी नहीं हो सकता है ।१८। आत्मा की एकता के ध्यान में निरत भगवान् शिव इस समय में है और गौरी भी वहाँ पर विद्यमान हैं ये परम रम्य हिमाचल के तल में है और मुनिगण से घिरे हैं ।१६। हे महान् बलवाले ! आप उन शिव को गौरी में नियोजित कर दो। उस का सुत जन्म धारण करेगा। यह एक छोटा सा हमारा कार्य है। इस को आप करके हमारी सुरक्षा कीजिए ।२०। इस तरह से देवों के द्वारा कामदेव से बार-बार प्रार्थना की गयी थी और बहुत स्तवन भी उसका किया गया था। तब वह अपनी आत्मा के विनाश के लिए वहाँ से कामदेव हिमवान् के तट पर गया था ।२१।
किमप्याराधयंतं तु ध्यानसंमीलितेक्षणम् । ददर्शेशानमासीनं कुसुमेषुरुदायुधः ॥२२ एतस्मिन्नन्तरे तत्र हिमवत्तनया शिवम् । आरिराधयिषुश्चागाद्विभ्राणा रूपमद्भुतम् ॥२३ समेत्य शम्भुं गिरिजां गंधपुष्पोपहारकैः । शुश्रूषणपरां तत्र ददर्शातिबलः स्मरः ॥२४