भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 600

१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अदृश्यः सर्वभूतानान्नातिदूरेऽस्य संस्थितः । सुमनोमार्गणेरग्र्यै स्स विव्याध महेश्वरम् ॥२५

विस्मृत्य स हि कार्याणि वाणविद्धोऽन्तिके स्थिताम् । गौरीं विलोकयामास मन्मथाविष्टचेतनः ॥२६

धृतिमालंब्य तु पुनः किमेतदिति चिंतयन् । ददर्शाग्रे तु सन्नद्धं मन्मथं कुसुमायुधम् ॥२७

तं दृष्ट्वा कुपितः शूली त्रैलोक्यदहनक्षमः । तार्तीयं चक्षुरुन्मील्य ददाह मकरध्वजम् ॥२८

कुसुमों के वाणों वाले आयुध लिये हुए कामदेव ने वहाँ पर भगवान् शिव को देखा था जो कुछ काल समाराधना करके ध्यान में नेत्रों को बन्द किये हुए समाधिस्थ संस्थित थे ।२२। इसी बीच में यह भी उसने देखा था कि हिमवान् की पुत्री पार्वती भी भगवान् शिव की आराधना की इच्छा वाली वहाँ पर आ गयी थी जो अत्यद्भुत स्वरूप से सुसम्पन्न थी ।२३। अति बलवान् मदन ने वहाँ देखा था कि यह पार्वती शम्भु के समीप में पहुँच कर गन्ध-पुष्प और उपहारों के द्वारा शिव की शुश्रूषा में संलग्न थी ।२४। वह मदन समस्त प्राणियों के द्वारा अदृश्य था और उनके समीप में ही संस्थित होकर उसने अत्युत्तम पुष्पों के वाणों से महेश्वर के हृदय को बेधा था ।२५। मन्मथ के द्वारा आविष्ट चेतना वाले उस भगवान् शिव ने समस्त ध्यान करने के कार्यों को भुलाकर काम के बाणों से विद्ध होकर समीप में स्थित गौरी की ओर देखा था ।२६। फिर उन्होंने धैर्य का समाश्रय ग्रहण किया था और मन में चिन्तन कर रहे थे कि यह विकार क्यों और कैसे हो रहा है । उसी समय में उन्होंने देखा था कि कामदेव कुसुमों के आयुध वाला आगे सन्नद्ध है ।२७। उसको देखकर त्रिशूली प्रभु बहुत ही क्रुद्ध हो गये थे जो कि तीनों लोकों को दग्ध कर देने में समर्थ थे । उन्होंने अपना मस्तक में स्थित तीसरा नेत्र खोल दिया था और उसी क्षण में मकरध्वज को भस्मसात् कर दिया था ।२८।

शिवेनेवमवज्ञाता दुःखिता शैलकन्यका । अनुज्ञया ततः पित्रोस्तपः कर्तुं मगाद्वनम् ॥२९